निष्ठुर समय

15-07-2026

निष्ठुर समय

जयचन्द प्रजापति ‘जय’ (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

भरी दुपहरी में
यौवन से भरपूर
एक युवती
दुधमुँहे बच्चे को
लटकाये हुए
 
फटी साड़ी में लिपटी
प्रत्येक कार के पास पहुँचती
 
हाथ फैलाकर
कुछ खाने की इशारा करती
 
गर्मी की तपती लौ में
बच्चा और माँ
पसीने से भीगे थे
एक भयंकर उदासी
सुबह से शाम तक
 
कोई डपट देता
कोई उसको देखता तक नहीं
 
कुछ दयावान महिलायें
कुछ खाने को दे देतीं
कुछ अकड़ू पुरुष
दो के सिक्के थमा देते
 
वह युवती
कुछ देर तक
उलट-पलट कर सिक्के देखती
फिर उस पुरुष का कमीनापन देखती
फिर अपनी क़िस्मत पर
एक टेढ़ी लकीर खींचती
 
फिर आगे
दूसरे ग्राहक की ओर बढ़ जाती

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
बाल साहित्य कविता
चिन्तन
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
बाल साहित्य कहानी
किशोर साहित्य कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
कहानी
लघुकथा
ललित निबन्ध
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में