हारे लोग
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
हारे लोग
थके से लगते हैं
जीवन से
आनन्द नहीं मिल रहा है
पसीने से भीगे
अलग हटकर
सोचने वाले
तुम पटरी से
ज़रूर उतर गये हो
एक बार
फिर से खड़े हो
पुनः पटरी पर
आ जाओ
एक रफ़्तार
फिर आयेगी
तब तुम
आत्महत्या नहीं करोगे
एक वीर पुरुष
तुम्हें कहा जायेगा
तुम रणक्षेत्र में
एक योद्धा की तरह
कामयाब होगे
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
- बाल साहित्य कविता
- चिन्तन
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- बाल साहित्य कहानी
- किशोर साहित्य कहानी
- हास्य-व्यंग्य कविता
- कहानी
- लघुकथा
- ललित निबन्ध
- विडियो
-
- ऑडियो
-