चींटी गुड़ खाती है
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
चींटी रोज़ मेरे घर आती है,
झोले में रखा गुड़ खाती है।
गुड़ खा-खाकर ख़ूब हँसती है,
अपने बच्चों को भी लाती है।
एक दिन चींटी नहीं आयी,
क्यों नहीं आज वह आयी।
पता करने मैं घर पर गया,
वहाँ किसी को नहीं पाया।
पड़ोसी से पूछा, कहाँ गयी है?
वह बोला-दवा लेने गयी है।
गुड़ खाने से हुआ यह हाल,
दवा खाने से सही है अब हाल।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
- बाल साहित्य कविता
- चिन्तन
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- बाल साहित्य कहानी
- किशोर साहित्य कहानी
- हास्य-व्यंग्य कविता
- कहानी
- लघुकथा
- ललित निबन्ध
- विडियो
-
- ऑडियो
-