डॉ. शैलजा सक्सेना

डॉ.  शैलजा सक्सेना

डॉ. शैलजा सक्सेना

जन्म : मथुरा (उ.प्र.)
शिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से पी. एच.डी. (शोधकार्य - "स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी काव्य में युद्ध की भूमिका") , एम. फिल. (शोधकार्य - "कामायनी की आलोचनाओं की समीक्षा"), एम.ए. तथा बी.ए. (ऑनर्स) में दिल्ली विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान तथा स्वर्ण पदक
संप्रति : जानकी देवी कॉलेज, (दिल्ली विश्विद्यालय) में 1989 से 1998 तक अध्यापन करने के पश्चात विदेश प्रवास किया। आजकल टोरोंटो (कनाडा) में निवास और यहाँ के हिन्दी साहित्य समाज में पूर्ण रूप से व्यस्त।
टोरोंटो में मानव संसाधन प्रबंधक के पद पर कार्यरत।   
प्रकाशन :

  • "क्या तुमको भी ऐसा लगा? (काव्य-संग्रह - २०१४) प्रकाशक : हिन्दी राइटर्स गिल्ड (कैनेडा), अयन प्रकाशन (भारत)
  • सारिका, पाँचजन्य, समाज कल्याण, तुलसी, वामा, आदि अनेक पत्रिकाओं में कहानी, कविताएँ तथा लेखों का प्रकाशन।
  • "अष्ठाक्षर" नाम के संग्रह में अन्य सात कवियों के साथ आठ कविताओं का संकलन।
  • श्विद्यालय की कई पत्रिकाओं में लेख तथा संपादन कार्य। एक कविता संकलन, कहानी संग्रह शीघ्र ही प्रकाश्य।

पुरस्कार :  सरस्वती पुरस्कार तथा मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार
विशेष : अमेरिका में "हिन्दी, भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म तथा भाषा" पर कार्यशाला का संचालन किया तथा हिन्दी और भारतीय संस्कृति के अनेक कार्यों में भाग लिया।  "हिन्दी साहित्य सभा, कनाडा" की भूतपूर्व उपाध्यक्ष।
"साहित्य कुंज" में साहित्यिक परामर्श सहयोग। 
"हिन्दी राइटर्स गिल्ड" की संस्थापक निदेशिका।
सम्पर्क : shailjasaksena@gmail.com

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समीक्ष्य पुस्तक : सड़क की लय
लेखक : सुषम बेदी
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन    प्रकाशित 
संस्करण वर्ष : 2017
पृष्ठ संख्या :168
मूल्य: ₹300
मुखपृष्ठ : सजिल्द
आईएसबीएन :9789384344689

सुषम बेदी जी से मेरी जान-पहचान पत्राचार के माध्यम से हुई। 1995 में अपनी पीएच.डी. पूरी करके, मैं डी.लिट. के लिए एक अध्ययन करना चाह रही थी, विषय लिया था, ’उत्तरी अमेरिका में हिंदी के अध्ययन और अध्यापन की समस्याएँ’। कोलंबिया, साउथ कैरोलिना, अमरीका में रहते हुए उस समय एक लंबा प्रश्न पत्र सा बनाकर मैंने अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाने वाले सभी प्राध्यापकों को भेजा था। उन प्राध्यापकों के नाम और पते जुटाने में बहुत मेहनत की थी। 1994 में इंटरनेट ने इतनी तरक़्क़ी नहीं की थी कि सारी सूचनाएँ, आज की तरह आसानी से उपलब्ध हो सकती अतः अनेक माध्यमों से अनेक प्राध्यापकों के पतों को जुटाकर मैंने चिट्ठियाँ भेजी थीं। लगभग 25 चिट्ठियों में से केवल एक ही वापस आई थी, और वह थी, सुषम बेदी जी की। मन ख़ुशी और कृतज्ञता से भर गया कि कम से कम किसी ने तो उत्तर भेजा और वह भी इतनी प्रसिद्ध लेखिका ने। उनके उत्तरों से मुझे ज्ञात हुआ था कि वे हिंदी पढ़ाने के लिए कितनी मेहनत और संघर्ष कर रही हैं। बहुत बाद में, उनसे मिलने और उन्हें जानने के बाद मुझे उनकी लगन और कर्मठता के बारे में और अधिक जानने को मिला। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप, नौकरी करते हुए और अन्य व्यस्तताओं के बाद भी इतना सब कैसे लिख लेती हैं? उन्होंने बताया कि ’मैंने अपने को बाक़ी और सब तरफ से समेटकर लेखन में ही लगा दिया है और तुम्हें भी यही करना चाहिए’। परिवार की वरिष्ठ सदस्या की भाँति उन्होंने मुझे जो कुछ समझाया उससे मन भर आया था। मुझे उनकी किताबों को प्राप्त न कर पाने का दुख था। वे मुझे न्यूयार्क आने को कहतीं या किसी आते-जाते के हाथ भिजवाने की बात कहतीं पर दोनों ही बातों में से कुछ नहीं हो पा रहा था। आख़िरकार हमने रास्ता निकाला और उन्होंने अपनी दो नई किताबें, “सड़क की लय और अन्य कहानियाँ” तथा “पानी केरा बुदबुदा” का पी.डी. एफ़. भेज दिया और कहा कि पढ़ कर प्रतिक्रिया लिखो! मेरा वह काम किन्हीं कारणों से अधूरा रह गया और उनके सामने न हो पाया। मैंने अपने टी.वी. कार्यक्रम “साहित्य के रंग-शैलजा के संग” के लिए स्काइप के माध्यम से, श्री अनूप भार्गव जी की मदद से उनका इंटरव्यू लेने की भी कोशिश की पर कुछ तकनीकी और समय के मेल न खाने पर वह कार्य भी हो नहीं सका। व्यक्ति के चले जाने के बाद बहुत सारी बातें, बहुत सारे छूटे हुए काम याद आने लगते हैं। जिस समय को हम अनंत समझकर के जीते चले जाते हैं, वह अचानक से ख़त्म हो जाता है और तमाम अधूरे क़िस्से यादों में रिस कर ग्लानि उत्पन्न करते हैं। उनकी किताबों पर लिखने का काम भी एक ऐसी ही ग्लानि की तरह, मेरे मन में रह गया। आज, इस लेख के माध्यम से, मैं उनकी कहानियों पर बात करते हुए उन्हें बार-बार याद कर रही हूँ।

“समय की लय तथा अन्य कहानियाँ” की 12 कहानियाँ प्रवासी जीवन की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियाँ कही जा सकती हैं। यों इन कहानियों का भाव और विचार-संसार किसी एक देश का नहीं है, वह व्यक्ति के मनोभावों और ग्लोबल सामाज की एक जैसी स्थितियों के प्रति सभी पाठकों को एक जैसा जागरूक करता है, उनमें एक जैसी करुणा उपजाता है। ये कहानियाँ ’प्रवासी लेखन’ की सीमाओं को लाँघती हैं और श्रेष्ठ वैश्विक कहानियों में सम्मिलित होने की क्षमता रखती हैं।

इस कहानी-संग्रह की ये कहानियाँ स्थितियों के तनाव और उस तनाव के बीच चलते गहरे उहापोह की कहानियाँ हैं। इन कहानियों के पात्र अपनी आंतरिक उहापोह को नहीं जीते, इन पात्रों के भीतर कोई इस प्रकार की दार्शनिक या रहस्यवादी उहापोह दिखाई भी नहीं देती। ये पात्र जीवन की स्थितियों के बीच, अपनी स्पेस को ढूँढ़ने, बनाने और समझने की जद्दोजेहद से गुज़रते हैं। जीवन को अपने लिए भरा-पूरा बना लेने की कोशिश, उस कोशिश में होती हुई हार और हार जाने का दुख ही इन कहानियों के मुख्य केंद्र हैं। ये पात्र अपने आप में, अपने कर्म को ले कर आश्वस्त हैं। उन्हें अपने ग़लत होने की आशंका लगभग न के बराबर है। उन्हें अपनी स्थिति में कुछ अलग तरह से व्यवहार करने की कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती। वे अपने निर्णयों को लेकर सही-ग़लत के झमेले से बाहर, उस स्थिति को कोसते हैं जिनमें जीवन ने उन्हें डाल दिया है। वे स्थितियों की कठोरता के कारण त्रस्त है। स्थितियाँ अगर इतनी कठोर या त्रासपूर्ण न होतीं तो वे ख़ुश होकर अपना जीवन आसानी से जीते चले जाते। इन स्थितियों को सुषम जी पूरे विस्तार से दिखाती हैं और ये स्थितियाँ इतनी सच्ची और यथार्थ हैं कि हर कोई उन्हें अपने जीवन में या अपने आसपास देख सकता है। इन स्थितियों के बीच छटपटाते हुए ये पात्र इतने जाने पहचाने लगते हैं कि पाठक उनसे अनायास ही गहरे जुड़ जाता है। इस संदर्भ में इस संग्रह की लगभग सभी कहानियों के पात्र मुझे पाठकों से अपनापा बनाए हुए दिखाई दिए। 

दूसरी विशेषता जो मुझे इन कहानियों में दिखाई दी, वह थी, स्थितियों के तनाव का विस्तार! हर कहानी में पात्र स्थितियों के जिस तनाव को जी रहे हैं, उसे बहुत खोल कर, और कहीं-कहीं, भिन्न-भिन्न शब्दों में दोहरा कर कहा गया है। इस विस्तार के बारे में सोचती हूँ तो स्पष्ट दिखाई देता है कि लेखिका, एक अध्यापिका की तरह से कहानी की समस्या यानी स्थिति को हर कोण से अपने पाठकों के सामने लाने, उसका पूरा बिंब बनाने और उसे समझाने की चेष्टा कर रही है। स्थिति का हर कोण पाठक के सामने पूरी तटस्थता से खुलता है, उसका जोड़, बाक़ी यानी सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष पूरे यथार्थ के साथ सामने आते हैं। यह बहुत बड़ी बात है कि वे किसी प्रकार की भी स्थितियों से उपजी भावुकता और आकुलता में पाठक को बहाती नहीं हैं, तर्कपूर्ण तरीक़े से हर कहानी में स्थिति के, चरित्र के सभी पहलुओं को सामने रख कर, प्रश्न तक पूछती हैं। किसी निर्णय तक पाठक को ले जाने की चेष्टा इन कहानियों में नहीं है। वे चाहती हैं कि पाठक स्थितियों मे घिरे चरित्र की बेबसी देखे, समझे और उस स्थिति की गहराई को जाने, इतना जाने कि वह बेबसी मात्र चरित्र की न रहे, बल्कि पाठक के सीने में भी पैदा हो, कि पाठक भी पात्र के साथ-साथ चले…बस, यहाँ तक आकर उनके कहानीकार का दायित्व समाप्त हो जाता है। किसी सुखांत या किसी निश्चित दुखांत को कहानी के अंत में निर्णय की तरह प्रस्तुत करना या केवल प्रश्न उठा कर, पाठक को किसी बौद्धिक ’जिग-सॉ पज़ल’ में उलझाना भी उनका उद्देश्य नहीं है। बाक़ी पाठक की मर्ज़ी है कि वो कहानी के बारे में क्या अंत देखने की कोशिश करे, उससे सुषम जी का सरोकार नहीं। चरित्र की भावना, पाठक में उतर आई, बस, वहीं उनका उद्देश्य पूरा हो जाता है। अधिकांश कहानियाँ एक छटपटाहट और बेबसी में समाप्त हुई हैं और पाठक उसी बेबसी की तीव्रता को अनुभव करता है और सोचता है कि ’अब क्या?’ कहानियों के चरित्रों की तरह ही एक ठंडी आह उसके मुँह से निकल पड़ती है।

इन मुख्य विशेषताओं को कहने के बाद मैं कहानियों को विस्तार से विवेचित करना चाहूँगी।

संग्रह की पहली कहानी ’एक अधूरी कहानी’ अमरीका की अश्वेत लोगों के प्रति पुलिस के व्यवहार की है। कहानी रोचक तरह से शुरू होती है और पढते हुए उत्सुकता निरंतर बनी रहती है। कहानी विशिष्ट शैली में पुलिस के प्रति अश्वेत लोगों का अविश्वास और अश्वेत लोगों को अपराधी मानने की पुलिस की प्रवृति के तहत, एक युवा लड़के को मार डालने की कारुणिक क्षुब्धता उत्पन्न करती है। इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह लगी कि सुषम जी कहानी के भीतर जो कई कहानियाँ बता रही हैं, उनमें समानांतर तौर से आपस में तुलना भी करती आ रही हैं। अमरीकी लोगों का काले लोगों के प्रति व्यवहार उन्हें अमरीका के सामाजिक इतिहास में ले जाता है तो साथ ही मेहतर और भंगी लोगों के प्रति भारत में अपने स्वयं के परिवार और समाज में किया गया भेदभाव भी उन्हें याद आता है। मनुष्य ’साइकी’ में बसे भेद-भाव के सार्वभौमिक सच को वे सहज ही स्पष्ट कर देती हैं। वे मारे गए बच्चे के व्यवहार और मित्रों की संगत के संबंध में भी प्रश्न उठाती हैं कि ’क्या पता वह युवा सच में किसी ग़लत काम में पड़ गया हो, जिसका पता उसके माता-पिता को नहीं पर पुलिस को हो’। वे इस भेदभाव को पाठक की करुणा उद्वेलन का कारण बना सकती थीं और कहानी सफल रहती पर तार्किकता का साथ वे नहीं छोड़तीं और कहानी, इतिहास और वर्तमान, अमरीका और भारत, पुलिस और अश्वेत समाज के संबंध और मारे गए युवा की माँ की क्षमाशीलता और पिता के इस कहानी के माध्यम से इस अन्यायपूर्ण व्यवहार के प्रति जागरूकता पैदा करते हुए, लेखिका के इस सत्यापन पर समाप्त होती है, कि “यह तो इसकी कहानी है, जिसे जारी रखने के लिए इसे कहानी कहनी है। पर मैं क्या छू पाऊँगी इसकी पीड़ा के मर्म को? कैसे लिखी जाएगी यह कहानी? कहाँ और कैसे खत्म करना होगा इस कहानी को?” अंतिम वाक्य जैसे इतिहास को कटघरे में खड़ा करके समाज को दोषी क़रार देता है, जिसमें हम, आप सभी हैं। कहानी पाठक को सोच के गहरे स्तरों पर ले जाते हुए, व्यवहार के उन्नत मानदंडों की माँग करती हुई बेहद सशक्त बन जाती है। कहानी की शैली भी आत्मपरक और मन को छूने वाली है।

संग्रह की दूसरी कहानी,’सड़क की लय’ संग्रह की शीर्षक कहानी है और उतार-चढ़ाव के बाद कहानी एक सकारात्मकता पर समाप्त होती है। यह सड़क की लय, दरसल समय की लय है। इस समय की लय में परंपरा से आधुनिकता और भारतीयता से पाश्चात्य सभ्यता का विरोध है। यह सुषम जी के लेखन की सक्षमता है कि कैसे वे कार चलाना सीखना जैसे आम काम में नेहा के पापा द्वारा सड़क की लय या कहें समय की लय को सुनना, महसूस करना और उसके अनुसार काम करना सिखा जाती हैं। यह प्रवासी परिवारों की एक आम समस्या है कि लड़कियों का विवाह समय पर नहीं हो पाता क्योंकि माता-पिता लड्की को अपने भारतीय तरीके से विवाहित करवाने की जल्दी में होते हैं पर लड़की अपने पाश्चात्य समाज के व्यवहार के अनुसार विवाह करना चाहती है। नेहा अनजाने ही अपने पिता के भारतीय मूल्यों और सुझाव के चलते अपने बॉयफ़्रेन्ड को विवाह करने के बाद ही शारीरिक संबंध बनाने के लिए बाध्य करती है पर उसके कमिट्मेंट न करने से उस से दूर हो जाती है। ऐसी लड़कियाँ दो मूल्यों के बीच उलझती अक्सर या तो कुँवारी रह जाती हैं या भटक जाती हैं। नेहा आत्मविश्वास लाने के लिए कार चलाने की प्रैक्टिस करती हुई, अपने पिता के लाल बत्ती पर सावधानी बरतने की बात सुनती है। पिता एक मेंटोर के रूप में उभरते हैं जो उसे क्या करना चाहिए, यह नहीं बता रहे बल्कि उसे सड़क की, समय की लय सुनना सिखा रहे हैं जिस से नेहा लाल बत्ती पर रुकने या उस पर रुके ही न रह जाने का निर्णय ध्यान से ले। उनकी सीख का अनुसरण करती हुई वो सुनती है ऐसी आवाज़ें जो उसने पहले नहीं सुनीं थीं। कहानी अर्थ के दो स्तरों पर चलती प्रवासी परिवारों की समस्या, उस समस्या के प्रति कम या अधिक बँधे-बँधाए हुए ट्रीटमेंट और उस ट्रीटमेंट के प्रति नई पीढ़ी की चिढ़ को दर्शाते हुए, एक सुखांत घटना में नहीं, बल्कि एक सुखांत ट्रांसफ़ोर्मेशन, एक बदलाव में समाप्त होती है। नई पीढ़ी में यह मानसिक जागरूकता आते हुए दिखाना ही सुषम जी का ध्येय है। कहानी का अंत अगर नेहा के किसी निर्णय में होता तो वह एक छोटे कैनवस की कहानी बनती पर सड़क की आवाज़ें सुनते, सचेत होकर हरी बत्ती पर उसका चल देना, जिस व्यापक संदेश को दिखाता है, वह इसे बहुत बड़े कैनवस की कहानी बना देता है जो देश, काल और स्थिति के ऊपर उठ कर एक समाधान दे रहा है। यहाँ लेखिका सुषम की संवेदनशीलता और शैली में अध्यापिका सुषम का विचार दर्शन आ मिला है। नि:संदेह यह कहानी उन्हें शेष कहानियों से अधिक प्रिय थी तभी उन्होंने इसे शीर्षक रूप में लिया। सत्य ही इस कहानी की सकारात्मकता में इतना दम है कि यह शेष ग्यारह कहानियों के दुख को अपने कंधों पर ढो सके। 

कई कहानियों में हमें वृद्धावस्था का बींधने वाला अकेलापन दिखाई देता है। समाज और समय के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वहाँ अपने माता-पिता को सँभालने के लिए बच्चों के पास समय नहीं है, माता-पिता भी इस बात को मानते हैं और स्वीकार करते हैं पर मन का क्या किया जाए जो परिवार के साथ रहना चाहता है। बनी-बनाई गृहस्थी को वह हुलस कर बहू, बेटियों को सौंपना चाहता है पर उन के लिए पुरानी गृहस्थियों के सामान महज़ एंटीक हैं या कूड़ा-करकट! सालों की मेहनत से बनाए घर को छोड़ना ही पड़ता है क्योंकि एक कमरे के मकान में यह सब सामान तो ले नहीं जाया जा सकता, ऐसे में ’अवशेष’ कहानी की कमला, दिमाग से तो इन निर्णयों को मानती है पर मन से दुखी होती है। कोई और उपाय न होने पर रिटायर्मेंट होम में ही मन लगाने ली चेष्टा करती है, पर है तो अकेली ही। कहानी समाप्ति पर कई प्रश्न छोड़ती है, “यह बर्फ बनती शांत, स्थिर झील, नि:शब्द गिरते पत्ते, अपने जैसे लाचारों और आयुष्मानों के समूह में उम्र को एकसाथ जीना-झेलना…अवश्यंभावी के इंतज़ार में—क्या यही बच जाता है अंत में अपने पास…? क्या शुक्रिया अदा करे इस सब के लिए?…किसका…?” वृद्धावस्था का अकेलापन पाठक को भीतर तक साल जाता है।

’उसकी माँ यानी ग्लोबल नियति’ कहानी भी अमरीका चली आई इलेना की रूस में अकेली रह गईं माँ के अकेलेपन की कहानी है। कहानी प्रस्तुत करने वाली “मैं” की भारत में रह गई माँ भी अकेलापन झेल रही हैं। पूरा जीवन जो समर्थ रहीं थीं, वे ही अब बिना अपने बच्चों के एक गहरे अवसाद से घिरी बेचारगी की स्थिति में हैं। इस कहानी में माँ, बच्चों को अकले रह जाने पर ताना दे रही हैं तो बच्चे भी पछतावे की भावना से भरे दुविधा में हैं कि क्या किया जाए? माता-पिता बच्चों के नए देश में अपने को फ़िट कर नहीं पाते और बच्चे अपनी मातृ भूमि के कम संसाधनों के बीच लौट नहीं पाते, यही ग्लोबल नियति है जिसमें दोनों पीढ़ियाँ फँसी हैं। ’गुनहगार’ कहानी की लंबे समय से विधवा कमला के अकेलेपन को दूर करने के लिए उसके बेटे की विदेशी बहू और उसकी अपनी बहन और जीजा उसे दोबारा शादी करने के लिए प्रेरित करते हैं और वह भी हँसी–हँसी में अख़बार में इश्तहार देने के लिए मान जाती है, समाज का डर और संस्कार की धिक्कार के बीच उतराती, चढ़ती वह पुन: एक साथी पाने की कल्पना भी करती है, अपने सूखे प्रेमजीवन के बारे में सोचते हुए हरियाने भी लगती है पर फोटो आ जाने पर वह उन्हें देखती टूट जाती है। मात्र अकेलापन कम करने के लिए किसी को पति बनाने की इस सारी योजना का छिछला, निम्न स्तर और अकेलेपन की विवशता उसे ऐसा रुलाता है कि उसे लगता है मानो वह आज ही विधवा हुई हो।
ये तीनों कहानियाँ प्रौढ़ से वृद्ध होते समाज की एक बहुत बड़ी समस्या की अलग-अलग झलकियाँ हैं जो अपनी करुणा से मन को मथ देती हैं।
 
प्रवासी कहानीकारों ने पाश्चात्य समाज और भारतीय संस्कारों के संघर्ष को स्वर देने के लिए अनेक कहानियाँ लिखी हैं। यह ऐसी टकराहट है जिसमें स्त्रियों का अपनी ज़मीन बनाने/ ढूँढ़ने का संघर्ष और अधिक बढ़ जाता है। ’बेपंख चिड़िया की एक उड़ान’ की अर्पिता का संघर्ष ऐसा ही है जो भारत और अमरीका में अपनी ज़मीन खोजता फिरता है। पंख काट कर, विवाह के बंधन में बँधी वह अमरीका आती है और वहाँ अनेक वर्ष रह कर घर और बच्चों के प्रति अपने समस्त दायित्वों को पूरा करती हुई भी अपने पति या उस ज़मीन से नहीं जुड़ पाती। अपनी बहन के समझाने पर वह भारत चली आती है, उसे लगता है कि अपने प्रिय भारत और उसकी ज़मीन पर वह अपनी पहचान, अपना एक ठौर बना कर रह सकेगी पर उस ज़मीन पर भी वह एक अकेली स्त्री है जो न काम ढूँढ़ पाती है और न अपने लिए कोई स्वतंत्र जगह, अंतत: वह पुन: अमरीका लौट जाती है यह सोचती हुई कि कम से कम उस देश में वह अपनी पुरानी नौकरी पर लौट सकती है और लोगों के प्रश्नों के तीरों के बिना एक अलग घर लेकर अकेले रह सकती है। अर्पिता जिस घर के सुख को ढूँढ़ रही है, वह दिवा-स्वप्न सा ही है। ’आसमान पर पाँव’ कहानी की हेमा भी अपनी मर्ज़ी से या कहें स्थितियों के चलते जेसन से विवाह करके अमरीका आ जाती है। उसे भी बदले परिवेश और अमरीकी सास-ससुर के साथ रहते हुए संस्कृतियों के इस विरोध से गुज़रना पड़ता है। सुषम जी इस विस्तार से इन विरोधी स्थितियों और संस्कारों का वर्णन करती है जैसे कि अमरीका आने वाली लड़कियों को आगाह कर रही हों, अंतत: हेमा अपने को थोड़ा बहुत बदलते हुए, हिंदी पढ़ाने के क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की ओर बढ़ने में सफल होती है। एक संदेश मिलता है कि कुछ धैर्य और दृढ निश्चय के साथ अगर मेहनत की जाए तो आसमान पर पाँव रखना भी असंभव नहीं है। स्त्री की इस समझौता करने की प्रवृत्ति के विपरीत है उनकी कहानी ’संगीत पार्टी’ की आरती, जो धन और घर के कामों की सुविधा उपलब्ध कराती पत्नी की भूमिका से निकल आती है पर दादी और बुआ के साथ बचपन बिताने वाले बेटे के भारतीय संस्कारों के सामने हार जाती है। उसका बेटा उसे सुविधापरस्त और स्वार्थी समझता है जो हाई ब्लड प्रेशर वाले उसके पिता को छोड़ गई है, यहाँ तक कि वह अपनी शादी में माँ को आने के लिए इस हद तक मना करता है कि अगर वह आयेगी तो वह शादी ही नहीं करेगा क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसकी माँ का साया भी उसकी पत्नी पर पड़े। आरती की ममता चूर-चूर होती है पर वह घर पर ही संगीत पार्टी करके बेटे की शादी की ख़ुशी मनाने की कोशिश करती है। अपने मित्रों के बीच वह गा-बजा रही है पर मुस्कुराहट के साये के पीछे उसका दिल छलनी हुआ पड़ा है जिसे कोई देख नहीं सकता और शायद देखने की इच्छा भी नहीं रखता। मित्रता में भी एक दूरी रख कर चलने वाली संस्कृति का पसारा इस कहानी के वातावरण में है। भारत और अतीत की यादों में डूबती उतराती आरती, अपने लिए स्वयं ही एक प्रश्न चिह्न बना लेती है कि उसने ठीक किया या नहीं! बेटे को खोने का दुख उसको जैसे निचोड़ डालता है। 

कोई अपनी ज़मीन ढूँढ़ रहा है तो कोई उस ज़मीन की क़ीमत चुका रहा है। यहाँ स्त्री की यह समस्या केवल एक प्रवासी स्त्री की समस्या ही नहीं, आज की सचेत स्त्री की समस्या बन जाती है जो अपने को शोषित होते जाने वाले संस्कारों से ऊपर उठ कर नए निर्णय लेती है पर अपनी ही संतानों द्वारा नकारे जाने के गहरे खतरे को मोल लेती है।
’अवसान’ कहानी में विदेशी महिला से विवाह करने वाले और अचानक ही मर जाने वाले दिवाकर की क्रिश्चयन तरीक़ों से की जाने वाली अंत्येष्टि को देख उसका मित्र शंकर बेहद परेशान होता है। हिंदू दिवाकर का ऐसा अंत उसे अपने और अपने जैसे अनेक विदेशी महिलाओं से विवाह करने वाले हिंदुओं की भावी नियति के प्रति बेहद चिंतित करता है और अंत में वह जैसे अपने मित्र को भारत और अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए, माइक पर जा कर गीता पाठ करने लगता है। यह कहानी प्रवासी लोगों के जीवन की नई समस्या और शंकर के विस्तृत मानसिक द्वंद्व की सच्चाई के कारण बहुत प्रसिद्ध भी हुई थी।

’गुरुमाई’ कहानी में पति से सताई, दुखियारी राजी का गुरुमाई के रूप में परिवर्तन पर चित्रा चौंकती है पर मिलने पर वह पाती है कि राजी वाकई यह विश्वास करती है कि उसके पास कुछ विशेष, चमत्कारी शक्तियाँ हैं। कहानी विश्वास और अविश्वास के बीच समाप्त हो जाती है पर एक स्त्री की घरेलू हिंसा के बीच बदली मनोस्थिति के कारण, इस हिंसा से छुटकारा पाने की शांति दे जाती है।’दरबान’ कहानी में प्रतीकात्मकता का सुन्दर प्रयोग करते हुए शक्की और कंट्रोलिंग पति के कारण एक बेहद सुंदर, हँसमुख (परी)स्त्री का जीवन मिट जाता है और पति दरबान बना उस के खाली बिस्तर की रखवाली करता दिखाया जाता है। कहानी करुणा को जगाते हुए ऐसे पतियों की मूर्खता पर खासा व्यंग्य करती है। ’वे दोनो’ कहानी एकदम अलग प्रकार की कहानी है जो रति की मृत्यु पर उसके पति रजत और प्रेमी तारक के बीच की कहानी कहती है। संबंधों के मनोविज्ञान के अनोखे रूप को प्रस्तुत करती यह कहानी उन तीनों के तनाव और फिर मित्रतापूर्ण संबंधों को कहती है। पति और प्रेमी दोनों के प्रति ईमानदार रहती रति को जैसे दोनों ही स्वीकार कर लेते हैं। यह लगभग अविश्वसनीय लगने वाली कहानी होते हुए भी मनुष्य मन की अनेक पर्तों को उधेड़ती, प्रभावपूर्ण कहानी है।

इन सभी कहानियों की भाषा-शैली सरल और मन को बेहद छूने वाली है। संवाद एकदम सधे, बिंब उत्पन्न करने में सक्षम हैं जो अपने पैनेपन के कारण पाठक को जैसे स्थिति की चुभन से चुभोते हैं। सुषम जी भाषा पर किसी दर्शन का वायावी आवरण नहीं डालतीं पर भावों की चूनर, विचारों की हवा से धीरे-धीरे हिलती पाठक को कहानी के लोक में उतार देती है। भाषा की सच्चाई का सूरज, कथ्य के यथार्थ की तरह ही यहाँ चमकता हुआ, मन को स्थितियों से तप्त कर देता है।

ये कहानियाँ अपने सच्चे कहन के कारण हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं और देर तक याद रहने वाली हैं। 

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