ख़ुशफहमियाँ

08-01-2019

ख़ुशफहमियाँ

डॉ. शैलजा सक्सेना

बहुत सी ख़ुशफ़हमियाँ पाली थीं मैंने!

जब कभी भीड़ से गुज़री
स्वयँ को अलग पाया,
मेरी विशिष्टताऒं ने
जैसे मेरे चेहरे को
रंग दे दिया हो कुछ अलग ही!

मेरे संघर्ष,
मेरी उपलब्धियाँ,
मेरी उदासियाँ,
मेरी हँसी
जैसे कुछ अद्वितीय हो,
जैसे मैं कुछ अधिक मनुष्य हूँ
शेष सब से,
अधिक संघर्षशील,
अधिक प्रसन्न,
अधिक गहरे उतरी हुई!

जैसे आकाशगंगा मे
चमकता एक तारा
इतरा उठे
अपनी अनोखी
दिपदिपाहट पर
जैसे कोई फूल
उठे फूल
अपनी अतिरिक्त महक पर,

घास का तिनका
झूम उठे
अपने गहरे हरे रंग पर!

ठीक वैसे..............

पर समय ने आँख खोल
दिखाया,
समाज ने
अनेको उदाहरणों से
समझाया...

कि अद्वितीय है
हर व्यक्ति भीड़ में,
विशिष्ट है
अपनी सामान्यताओं में
पैठा हुआ है
गहरे
अपने मन और तन की अनुभूतियों में!
समझ में बड़ा है,
संघर्ष की दौड़ में
सबके साथ
बराबर से खड़ा है!!

प्रसन्न हूँ,
कि इन अद्वितीयों की
भीड़ का एक हिस्सा हूँ,
और हज़ारों कहानियों के बीच
एक मामूली सा क़िस्सा हूँ॥

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

नज़्म
कविता
साहित्यिक आलेख
कहानी
कविता - हाइकु
पुस्तक समीक्षा
कविता-मुक्तक
लघुकथा
स्मृति लेख
विडियो
ऑडियो