डब्लूसीसी में डॉ. सुनीता जाजोदिया का प्रथम काव्य संग्रह: ‘ज़िन्दगी का कोलाज’ का लोकार्पण
डॉ. सुनीता जाजोदिया“जीवन के विविध विषयों का समुचित चित्र है ‘ज़िन्दगी का कोलाज’, डॉ. सुनीता जाजोदिया की प्रथम पुस्तक में, और ऐसा कोई भी विषय नहीं है जो अछूता रहा हो। सर्जनात्मक जुनून लेखक का स्वभाव होता है जो कि सुनीता जी में दिखाई देता है। मनोभावों की कलात्मक प्रस्तुति है कविता और यह पुस्तक सहज भाव-प्रवणता के कारण गहरे प्रभावित करती है। नारी के आगे बढ़ने में परिवार की प्रेरणा अहम् होती है। प्राक्रतिक रूप से अबला यानी दुर्बल होते हुए अपने सबला स्वरूप को पाना नारी सशक्तिकरण की प्रक्रिया है जो इन कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होती है। सामाजिक न्याय भी इनमें बड़ी शिद्दत से देखने को मिलता है।”
विमेंस क्रिश्चियन कॉलेज में आयोजित डॉ. सुनीता जाजोदिया के प्रथम काव्य संग्रह ‘ज़िन्दगी का कोलाज’ के लोकार्पण के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रोफ़ेसर डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा ने अपने उद्गार में यह कहा। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित मद्रास विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चिट्टि अन्नपूर्णा ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि स्वांतः सुखाय के लिए लिखते हुए परांतः सुखाय हो जाना ही काव्य का प्रयोजन होता है। सुनीता की कविताएँ आज के तनाव ग्रस्त जीवन में सुकून देने वाली कविता है जिसे पाठक बार-बार पढ़ने को लालायित होते हैं। नवीन बिंब प्रयोग अनूठा है।
गुरु नानक कॉलेज की भाषा डीन एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. स्वाति पालीवाल ने पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि लेखिका ने जीवन के विशद अनुभवों को बड़ी संवेदनशीलता से अपनी रचनाओं में उकेरा है। भावों की गहराई के साथ साथ दार्शनिकता भी इनमें झलकती है। जीवन के अनेक रंग ‘ज़िन्दगी का कोलाज’ में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं जिससे पाठक तादात्म्य स्थापित कर लेता है। छायावादी तत्व ओस, भीगी भोर और मेघा आदि कविताओं में मिलते हैं। कोमल शब्दों का भी प्रयोग है। रिश्तों को सहेज कर रखने की जद्दोजेहद इन रचनाओं में देखने को मिलती है। नारी सम्मान और सुरक्षा के ज्वलंत सामयिक मुद्दे पर भी लेखनी की धार देखने को मिलती है। क्षणिकाओं में बेहद गहराई है। सामाजिक विडंबनाओं और मूल्य ह्रास से उत्पन्न टूटन के बावजूद कविता का सकारात्मक स्वर हालात से संघर्ष करने में सक्षम है।
हिंदी विभाग की छात्रा खुशी कृष्णवेनी ने अपनी प्राध्यापक डॉ. सुनीता जाजोदिया की पुस्तक की समीक्षा में कहा कि यह पुस्तक हमें जीवन को एक नवीन नज़रिए से देखने की प्रेरणा देती है। इस पुस्तक को छोटे-बड़े सभी पढ़ सकते हैं। इसमें कवयित्री के जीवन अनुभवों और संवेदनाओं का बिंब है। ‘ज़िन्दगी का कोलाज’ पुस्तक घोर निराशा में भी आशावान बनाए रखती है जैसे कि ‘सूरज आज कुछ ख़ास है’ और ‘इस बार वसंत तुम ऐसे आना’ आदि कविताएँ।
श्रीपदा ने कहा कि ‘रास्ते’ कविता में शब्द-युग्म का प्रयोग देखने को मिलता है। इस कविता से हमें यह सीख मिलती है कि रास्ते जिस तरह हर बदलते मौसम के साथ अपने आपको ढाल लेते हैं उसी प्रकार हमें भी अपने परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना चाहिए।
इस अवसर पर कॉलेज के सूचना संसाधन केंद्र की ग्रंथपाल डॉ. लिसा शीबा रानी ने अपने संबोधन में प्रकट किया कि डब्लूसीसी के इतिहास में हिंदी की पहली पुस्तक का लोकार्पण हुआ है। कॉलेज लेखकों और उनकी पुस्तक के लोकार्पण को प्रोत्साहन देता है। प्रिंसिपल डॉ. लिलियन आई. जैस्पर ने अतिथियों का सम्मान किया और अपने उद्बोधन में भाषाओं के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि कॉलेज भाषाओं को आगे बढ़ाने में तत्पर रहता है व भाषा विभाग द्वारा अनेक अंतर्विभागीय कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। आपने एसोसिएट प्रोफ़ेसर एवं भाषा विभागाध्यक्ष, शिफ़्ट 2 डॉ. सुनीता जाजोदिया को पुस्तक-लोकार्पण की बधाई प्रेषित करते हुए सतत लेखन की शुभकामनाएँ दी।
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा चेन्नई के कुलपति प्रोफ़ेसर डॉ. प्रदीप शर्मा के कर कमलों से ‘ज़िन्दगी का कोलाज’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। माता श्रीमती प्रमिला देवी और पिताश्री रमेश गुप्त नीरद को यह पुस्तक समर्पित की गई थी और लेखिका ने उन्हें पुस्तक की प्रथम प्रति भेंट की।
भाषा विभाग की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर श्रीमती नंदिनी धनपाल ने अतिथियों का स्वागत किया एवं हिंदी साहित्य एवं वाद-विवाद क्लब की सचिव दिव्या ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस आयोजन में डब्लूसीसी के प्राध्यापकों एवं छात्रों के अलावा शैक्षिक, साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।
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