तुम मुझ को दिल से विसराकर
सुशीला श्रीवास्तव
बहर: बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसम्मन मुज़ाफ़
अरकान: फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
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तुम मुझ को दिल से विसराकर, क्या तन्हा रह पाओगे
याद सतायेगी जब मेरी, तब तुम भी पछताओगे
मैं नादाँ हूँ इस कारण ही, तुम को भूल नहीं पाती
लिखती रहती हूँ ख़त तुझ को, आख़िर कब तक आओगे
रंज बहुत है इस उल्फ़त में, मन व्याकुल हो जाता है
मेरी शाम बुझी है कब से, कितना और सताओगे
मेरे पास अगर रहते तो, मैं भी कुछ ख़ुश हो जाती
आस लगाए बैठी हूँ, कब सुख का दीप जलाओगे
नैनन नीर बहे अब साजन, घर भी सूना-सूना है
तुम बिन है शृंगार अधूरा, कब अरमान सजाओगे
पल-पल बीते जीवन मेरा, ख़ामोशी की चादर में
मुझ को है विश्वास अभी तक, इक दिन तुम आ जाओगे
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