है मुहब्बत गर तुम्हें, दिल से निभा सकता हूँ मैं
सुशीला श्रीवास्तव
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
है मुहब्बत गर तुम्हें, दिल से निभा सकता हूँ मैं
चाहतों का सिलसिला दिल में छुपा सकता हूँ मैं
दर्द सीने में छुपाकर मुस्कुराता हूँ मगर
चोट कितनी गहरी है, ये भी बता सकता हूँ मैं
रात की ख़ामोशियों में, तारे गिनता रहता हूँ
ग़म के कितने छाले हैं, गिनकर बता सकता हूँ मैं
दिल की धड़कन में बसा लू़ँ, आज तुम को नाज़नीं
सामने गर तुम खड़ी हो, सर झुका सकता हूँ मैं
चाहता हूँ इक बसेरा, पर बना पाया नहीं
साथ मेरे तुम चलो तो घर बना सकता हूँ मैं
सूनी आँखों में, तुम्हारी जूस्तजू है मान लो
तुम कहो तो, फूल क़दमों में बिछा सकता हूँ मैं
तुम मुसाफ़िर, मैं मुसाफ़िर, अजनबी-से क्यूँ रहें
दिल में क्या अरमान है, तुमको सुना सकता हूँ मैं
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- ग़ज़ल
-
- आज महफ़िल में मिलते न तुम तो
- जहाँ कहीं समर हुआ
- ज़रा रुख से अपने हटाओ नक़ाब
- जा रहा है आज सेहरा बाँध के बारात में
- टूटे दिलों की, बातें न करना
- तुम मुझ को दिल से विसराकर
- तुम्हारी याद में हम रोज़ मरते हैं
- नहीं प्यार होगा कभी ये कम, मेरे साथ चल
- पहली ग़ज़ल कही है
- बच्चे गये विदेश कि गुलज़ार हो गए
- बेचैन रहता है यहाँ हर आदमी
- मुझको वफ़ा की राह में, ख़ुशियाँ मिलीं कहीं नहीं
- मुझे प्यार कोई न कर सका
- है मुहब्बत गर तुम्हें, दिल से निभा सकता हूँ मैं
- कविता
- गीत-नवगीत
- दोहे
- कहानी
- कविता-मुक्तक
- विडियो
-
- ऑडियो
-