अँधियारे के पार
सुशीला श्रीवास्तव
जब घनघोर अँधेरा छाता है
ग़म का बादल मँडराता है
मन का दीपक बुझने लगता
आशा का रंग उतर जाता है।
किरणें सूरज की आती हैं
उम्मीद नयी दे जाती हैं
ये कठिन घड़ी टल जायेगी
मानो रोज़ हमें बताती हैं।
दुख के साये लाख घनेरे
पर चहके चिड़िया रोज़ सवेरे
समय का पहिया चलता रहता
हो चाहे जीवन में अँधेरे।
मन में धीरज रखना बन्दे
तकलीफ़ों से न डरना बन्दे
घिस-घिस कर ही हीरा चमके
कंचन-सा ही तपना बन्दे।
सुख के मोती तम के पार
थोड़ा करना जीवन में इंतज़ार
मिल जाता है सब कुछ जग में
क्यों समझे ख़ुद को लाचार।
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