एक झूठ

सुशीला श्रीवास्तव  (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

झूठ छोटा हो या बड़ा, जब उजागर होता है तो जीवन में तूफ़ान मच जाता है। वक़्त के धरातल पर कोई बच नहीं पाता है। इसलिए जीवन में सदा सच बोलना चाहिए। कहते तो सभी हैं पर क्या सभी सच कह पाते हैं। जीवन में एक ऐसा क्षण भी आता है कि किसी न किसी को झूठ बोलना ही पड़ता है। किसी की भलाई के लिए तो कभी अपनी बातें छुपाने के लिए। कभी रिश्ते बचाने के लिए। यहाँ छुपाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है, इसका कारण यह है कि जीवन में उसे खुलके बोलने की आज़ादी नहीं मिलती। अगर सच वह बोल दे तो घर में वबाल मच जाता है। ऐसे में वो इन्सान डर जाता है।

उदाहरण के लिए एक पुरुष अपनी अधूरी प्रेम कहनी दुनिया को चीख़-चीख़ के सुनाते हैं, वह न परिवार से डरते हैं, न समाज से न, अपनी पत्नी से, क्योंकि वह पुरुष हैं, उन्हें कुछ भी बोलने की आज़ादी है। दूसरी तरफ़ एक महिला अपनी कोई अधूरी प्रेम कहानी कहती है तो उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है। जबकि प्यार या दोस्ती में दोनों का दिल एक जैसा ही धड़कता है।

सच तो यह है कि सभी का प्यार या दोस्ती सफल तो नहीं होती। आज की दुनिया में स्त्री हो या पुरुष क़दम से क़दम मिलाकर चल रहे हैं, वहाँ दोस्ती होना लाज़मी है। पर किसी कारण बस उनकी दोस्ती में दरार आ जाती है तो अलग हो जाते हैं। पर महिलाएँ अपनी दोस्ती को छुपाकर रखती हैं, वह अपने पार्टनर से खुल के बातें नहीं कह पातीं। क्योंकि उन्हें डर रहता है कि वह घर परिवार में उसे ताना न मिले। उनकी गृहस्थी कहीं टूट न जाये। उन्हें जीवन में आगे बढ़ना होता है। वह अपने पति के साथ ख़ुश रहना चाहती है। पर यह भी सच है कि बीता हुआ कल जब सामने आता है तो सब कुछ नाश कर देता है।

कभी-कभी परिस्थतियाँ मजबूर कर देती हैं इन्सान को झूठ बोलने के लिए। उसके बाद तो जो होता है वह रिया की कहानी जैसी होती है, जो इस प्रकार है:

 

नीलम ने अपनी सहेली रिया के दरवाज़े पर खड़ी होकर जब बेल बजायी तो रिया ने दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही नीलम, रिया पर बरस पड़ी। अपनी नाराज़गी जताते हुए उसने अपना बैग सोफ़ा पर पटकते हुए कहा, “रिया, मेरा फोन क्यों नहीं उठाती? कई दिनों से तुम्हेंं फोन कर रही हूँ। कभी कूची हटाकर मुझे भी याद कर लिया कर। किसकी तस्वीर में आजकल उलझी हुई है। तुम्हें पता है कि तुम्हारा फोन नहीं आता तो मैं परेशान हो जाती हूँ।” 

पर रिया रोनी सूरत बनाकर खड़ी थी। यह देख नीलम पूछ बैठी कि क्या हुआ बोलती क्यों नहीं . . .? तब उसकी आँखों का रुका हुआ आँसू गालों पे ढ़ुलकने लगा था। नीलम उसकी एकमात्र सहेली थी। दोनों की शादी भी एक ही शहर में हुई थी। इसलिए दोनों ज़्यादा दिन एक दूसरे से दूर नहीं रह पातीं। दोनों सोफ़े पर बैठ गयीं। 

रिया को रोते देख नीलम को जिज्ञासा होने लगी कि ऐसा क्या हुआ, जो आज रिया इस तरह रो रही है। बहुत पूछने पर उसने बताया कि उससे बहुत बड़ी ग़लती हो गयी है। मेरी दुनिया उजड़ने को है। तब वह ज़ोर देकर पूछने लगी। कि आख़िर हुआ क्या है रिया। साफ़ साफ़ बताओ। पहेलियाँ मत बुझाओ। रिया ने कहा, “नीलम, अब जीऊँ तो कैसे जीऊँ? तुम तो जानती हो, मैंने कभी किसी लड़के को आँख उठाकर नहीं देखा जीवन में। अक्षय के अलावा किसी को प्यार के रूप में नहीं चाहा पर आज मेरे पति अक्षय मुझपर शक करने लगे हैं।”
“हाँ रिया, मैं सब जानती हूँ, पर कोई तो कारण होगा जिससे उनके मन में शंका उतपन्न हुई होगी।”

रिया ने आपबीती सुनाने लगी। 

“नीलम, बात यह है कि एक दिन किसी ने फ़ेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी तो, मैंने बिना-सोचे समझे स्वीकार कर ली, तभी उसने मैसेज किया कि आपकी मुझे कुछ पेन्टिंग्स ख़रीदनी है। आपसे कैसे सम्पर्क करें? मैं यह देख बहुत ख़ुश हो गयी कि किसी को मेरी पेन्टिंग पंसद तो आयी। उसकी प्रोफाईल देखने की उत्सुकता हुई। जब प्रोफाईल देखी तो पता चला कि वह सुबोध है, जो मेरे बचपन का दोस्त था। माना कि वह मुझसे दोस्ती करते-करते प्यार कर बैठा था, एक दिन मुझसे इज़हार भी कर बैठा। लेकिन मैंने कभी मंज़ूर नहीं किया। क्योंकि प्यार के चक्कर में, मैं पड़ना नहीं चाहती थी। मुझे शादी नाम से ही चिढ़ मचती थी। प्यार के नाम से घृणा होती थी। 

“रिया, तुम्हेंं तो सब पता है न। जब स्कूल में पढ़ती थी तो सब को प्यार करने से मना करती थी। अन्य लड़के-लड़कियों की बदनामी देखकर मैंने सोच लिया कि कभी किसी से प्यार नहीं करूँगी। आख़िर प्यार में रखा ही क्या है बदनाम और जुदाई के अलावे। कई सहेलियों को मैंने प्यार में रोते देखा था। यही कारण है कि मैं सुबोध को मना कर दिया और उससे नाराज़ होकर सारे रिश्ते ख़त्म कर लिए थे। 

एक दिन सुबोध मेरे घर आया और कहा कि अगर तुम शादी नहीं करना चाहती तो वह मजबूर नहीं करेगा। पर दोस्ती तो क़ायम रख ही सकती हो। फिर भी मैंने नहीं माना। उसने कहा कि तुम मुझे राखी बाँध देना राखी के दिन। मैं तुमसे कोई न कोई नाता जोड़ना चाहता हूँ। मेरे दिल में तुम्हारे लिए सिर्फ़ इज़्जत है। मैं दोस्तों के बहकावे में आकर तुमसे प्यार की बातें कर बैठा। मैं शर्मिदा हूँ। पर यक़ीन मानो मैं दिल से तुम्हेंं बहन मान लूँगा। यह कहकर वह चला गया। लेकिन मैं उसे राखी बाँधने उसके घर नहीं जा सकी। क्योंकि उस दिन बुख़ार आ गया था मुझे। और वह बेसब्री से इन्तज़ार करता रहा। 

मेरे न जाने के कारण वह दुखी था। उसके बाद क़सम खा ली कि वह मुझसे कभी बात नहीं करेगा। वह शादी कर ख़ुशी से ज़िन्दगी गुज़ारने लगा। मैंने भी पचास सालों में कभी उससे सम्पर्क नहीं किया। लेकिन उस दिन जब फ़ेसबुक पर मेरी पेंन्टिंग की बात करने लगा तो मैं सब कुछ भूल गयी सोचने लगी अगर क़सम उसने तोड़ी है तो मुझे बात करनी चाहिए। बचपन में पेंन्टिंग करना उसी ने तो सिखाया था। फिर कैसे मुँह मोड़ सकती थी। घंटों मेरे साथ रंगों की बातें करता था। रंगों का तालमेल उसी ने बताया था। 

जब फ़ेसबुक पर उसने मेरी पेंटिंग ख़रीदने की बात की तो मैं उसे पेंन्टिंग देने को तैयार हो गयी। इसी सिलसिले में वह अक्सर बातें करने लगा। वह मेरी कामयाबी से ख़ुश था। वह भले ही मुझे किसी भी रूप में पसंद करता हो पर मैंने कभी उसे भाव नहीं दिया। क्योंकि कुछ बातें थी उसमें जिन्हें मैं पसन्द नहीं करती थी। बल्कि हमेशा बेरुख़ी से ही पेश आती। जब वह कॉलेज नहीं जाता या किसी से मार-पीटकर घर आता। मुझे उसकी सारी हरकतें उसके दोस्तों से पता चल जातीं। मैं भला-बुरा कहती पर उसे वह बुरा नहीं मानता। बल्कि सुधरने की कोशिश करता। वह मेरी नज़रों में अच्छा दिखना चाहता था। पर आदत से मजबूर था या उसका वो अल्हड़पन था। उस दिन मुझे लगा मेरी बेरुख़ी वह भूल चुका है, तो मुझे भी उससे नाराज़ नहीं होना चाहिए। इसलिए उसके मैसेज का जवाब देने लगी।

एक दिन मुझे अहसास हुआ कि मेरे पति ख़ुश नहीं है। यह बात अपने पति को भी बता चुकी थी कि वह मेरा कभी दोस्त था। फिर क्या शक की सूई मेरे ऊपर घूमने लगी। इसलिए मैं उससे बात कर कहना चाहती थी कि फोन या मैसेज न करे। जब उसे फोन किया तो मेरा हाल-चाल पूछने लगा। मैं भी बताने लगी कि मैं अपने जीवन में ख़ुश हूँ। उसने मुझे फोन कभी नहीं किया। मैंने ही उसे पेंटिग कोरियर करके फोन किया। यही ग़लती हो गयी। जो मेरे चरित्र पर दाग़ लगने के लिए काफ़ी था। 

तब नीलम ने ज़ोर देकर कहा, “रिया, कभी कभी दोस्ती प्यार में बदल जाती है। उससे ज़्यादा बात करने की ज़रूरत नहीं थी। अतीत हमेशा परछाईं बनकर चलता रहता है। चाहे तुम किसी को चाहो या न चाहो। उसके दिल में तुम्हारे लिए प्यार कहो या दोस्ती थी तो सही। उससे झुठलाया नहीं जा सकता। चालीस साल बाद जब तुम उससे बात करने लगी तो तुम भूल गयी कि वह तुम्हें कभी चाहता था . . . लेकिन दोस्ती याद रही। क्योंकि जहाँ तक मुझे पता है कि स्कूल कॉलेज में तुम्हारे लिए नोट बनाया करता था। तुम्हारे साथ हमेशा मददगार बनकर खड़ा रहता था। जब सुबोध, फ़ेसबुक पर मिला तो तुम उसे अस्वीकार नहीं कर सकी। यही न? रिया, चाहे पत्नियाँ कितनी भी पाक हों, या ऐसे रिश्तों की सफ़ाई दें—शक के दायरे में तो आ ही जाती हैं। शक का बीज अक्षय के दिल में तो पनपना ही था।”

रिया ने सफ़ाई देते हुए कहा, “नीलम, इसलिए सुबोध को हमेशा के लिए फोनकर कह दिया कि कभी भविष्य में मुझसे किसी प्रकार का नाता न रखे। उधर से सुबोध नाराज़ होते हुए कहा, ‘रिया, तुम आज भी मुझे ग़लत समझ रही हो। अब मैं एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ। अब मैं वो नालायक़ लड़का नहीं हूँ, जिसे तुमने नाम दिया था। समाज में आज मेरी इज़्ज़त है। मर्यादा से बाहर न कभी गया, न कभी जाऊँगा। शायद वह सोलह साल का आकर्षण था जो तुम्हारी तरफ़ खींचने लगा था। लेकिन बहुत जल्द मैंने अपना क़दम मोड़ लिया था। नादानी में मेरे कारण जो भी तुम्हें दुख पहुँचा हो, उसके लिए माफ़ी भी तुमसे माँग ली थी। तुम अपनी दुनिया में आज ख़ुश हो इससे बड़ी ख़ुशी मुझे और क्या हो सकती है? मैं तो तुम्हें सिर्फ़ ख़ुश देखना चाहता था। तुम तो मेरी आदर्श हो . . . मैं तुम्हारा सिर्फ़ दोस्त बने रहना चाहता था। पर तुमने तो वो अधिकार भी छीन लिया था दूर जाकर . . . तुम चिन्ता मत करो, मैं न कभी मैसेज करूँगा न कभी फोन करूँगा। मैं भी अपनी दुनिया में अपने परिवार में बहुत ख़ुश हूँ। अलविदा।‘ 

“जैसे ही उसने अलविदा कहा, अक्षय मेरे पीछे खड़े थे। उन्हें शक हो गया था कि सुबोध से ही मैं बात कर रही थी। जब उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया कि मेरी सहेली का फोन था। लेकिन जब फोन नम्बर देखा तो मेरा झूठ पकड़ा गया। न जाने वह कौन सा लम्हा था जो मैं पहली बार उनसे झूठ बोल गयी। मैंने तो सबकुछ ख़त्म ही कर दिया था। फ़ेसबुक से उसका प्रोफाईल लॉक कर दिया। अपना भी कर दिया ताकि वह कभी मुझे न देख सके। क्योंकि मैं अक्षय से बहुत प्यार करती हूँ, और करती रहूँगी। लेकिन मेरे एक झूठ ने मेरे दिल पर दाग़ लगा दिया। मैं तो यह सोचकर झूठ बोल गयी कि उन्हें दुख न पहँचे। एक छोटी-सी बात का बतंगड़ न बन जाए। मेरा घर परिवार न उजड़ जाय। 

“कभी-कभी अनजाने में ग़लतियाँ हो जाती हैं। पर कोई समझता नहीं है। आज भी मेरा दिल सिर्फ़ अक्षय के लिए धड़कता है लेकिन अब वे मुझपर विश्वास नहीं करते। ज़िन्दगी अब बोझ लगने लगी है। जी चाहता है कि मर जाऊँ। पर दिल कहता है कि यदि मैं ग़लत नहीं तो क्यों अपनी जान दूँ? जो बीत गया वो मिटाया नहीं जा सकता। इन चालीस सालों में यादें भी धुँधली हो जाती हैं। जी चाहता है कि चीख-चीख कर कहूँ अक्षय से कि मैंने कभी किसी से प्यार नहीं किया, मुझपर विश्वास करो। लेकिन जब विश्वास का धागा टूटता है तो गाँठ तो पड़ ही जाती है। अक्षय मेरे साथ जी तो रहे हैं, वह अंदर ही अंदर घुट रहे हैं। मुझसे कुछ कहते नहीं। बल्कि कहते हैं यदि तुम सुबोध के साथ जाना चाहती हो तो चले जाओ। तुम्हारी ख़ुशी के लिए जी लूँगा। नीलम, तुम्हीं बता अब क्या करूँ कि अक्षय मुझपर विश्वास करें? किसी से बात कर लेने क्या मैं अपवित्र हो गयी।”

नीलम बोली, “देखो रिया, सच तो यह है कि हम पत्नियाँ अपने पतियों की सभी ग़लतियाँ माफ़ कर देती हैं। पर दुनिया का कोई भी पति यह नहीं बरदाश्त कर सकता है कि उसकी पत्नी अपने पुराने दोस्त या आशिक़ से बात करे। चाहे तुम उसे दोस्त समझो या आशिक़। तुम्हारे दिल में कोई झाँककर नहीं देख सकता। यहाँ हर पल नारी को सीता-सी ही परीक्षा देनी पड़ती है। अब तो समय ही उसे ठीक कर सकता है। वह विश्वास करे भी तो कैसे? तुम्हारे दिल में सुबोध के प्रति कुछ नहीं है तो सच बोल देती, पर घबराहट में ऐसा कभी-कभी हो जाता है। तुम्हारी मजबूरी मैं समझती हूँ, पर अक्षय नहीं समझ सकते। क्योंकि वह तुम्हारे पति हैं।”

“मैं जानती हूँ, अक्षय, मुझसे बहुत प्यार करते हैं। मुझे माफ़ भी कर देंगे; पर शंकित रहते हैं। जब भी किसी का फोन आता है तो उन्हें लगता है कि सुबोध का है। पर ऐसा अब कभी नहीं होगा, उन्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ। कभी-कभी लगता है अपने पास फोन ही न रखूँ। कभी-कभी सोचती हूँ कि फ़ेसबुक पर अपनी पेन्टिंग नहीं डालती तो ये बखेड़ा ही नहीं होता। न उस तक पहुँचता न मेरी ज़िन्दगी में बवाल मचता। यही कारण था कि अब किसीका फोन उठाने का मन नहीं करता। न अब फ़ेसबुक का इस्तेमाल करती हूँ।”

नीलम बोली, “बात फ़ेसबुक और फोन की नहीं है रिया। अपने जज़्बातों को नियंत्रण रखना तुम्हारे हाथ में होता है। उस पर क़ाबू कर लो तो कोई ग़लती हो ही नहीं सकती। अब जो हो गया उसे भूल जाओ। अक्षय भी समझदार है, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, अपने प्यार और समर्पण से अपने पति का दिल जीत सकती हो। समय हर घाव को भर देता है। इसे याद कर आँसू बहाने की ज़रूरत नहीं। सुबोध को मैं जानती हूँ। यदि उसने तुमसे वादा किया है कि तुम्हारी ज़िन्दगी में नहीं झाँकेगा तो नहीं झाँकेगा। जो सच्चे दोस्त या प्रेमी होते हैं वे कभी अपनों को दुख नहीं पँहुचाते। और सुबोध ने तो सदा तुम्हारी ख़ुशी चाही है। 

“पर यह भी सच है कि आजकल जितने भी पति-पत्नी के झगड़े होते हैं, या तलाक़ होते हैं, उसका ज़िम्मेदार वाट्सेप या फ़ेसबुक का अधिक हाथ होता है। बात-बात में लोग अपनी समस्याएँ एक दूसरे को सुना बैठते हैं। यह नहीं सोचते कि अपनी समस्या इन्सान को आप ही सुलझानी पड़ती है। कई मैसेज पढ़कर लोग ग़लत अर्थ निकाल लेते हैं। इसलिए आज ज़रूरत है सावधान रहने की। अब सब कुछ भूलकर तुम भी ज़िन्दगी में आगे बढ़ो। ग़लतियों से ही तो इन्सान सीखता है। पुरुष क्या जाने कि औरत जब एक बार किसी को अपना मान लेती है तो कभी दूसरे की तरफ़ आँख उठाकर नहीं देखती। अतीत में कोई हो या न हो उसकी यादों को बहुत पीछे छोड़ देती हैं। सीता ने अग्नि परीक्षा दी तो थी फिर भी अयोध्या लौटते बनवास जाना पड़ा। और तुम तो एक साधारण स्त्री हो। कोई विश्वास करे या न करे—तुम अपने आप पर विश्वास करो। बाक़ी समय सब कुछ ठीक कर देगा।” यह कहते हुए नीलम अपने घर जाने के लिए खड़ी हो गयी।

तभी रिया ने पूछा, “नीलम, अब तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं न। आज मैं अपनी कहानी ही सुनाती रही, चाय पीलाना भी तुम्हेंं भूल गयी।” 

“कोई बात नहीं, रिया। इतना सब कुछ दिल में तुम दबा के बैठी थी मुझे क्या पता था? मैं आज चाय पीने नहीं आयी थी। तुम्हारा हाल जानने आई थी। आशा है अगली बार तुम खिलखिलाती हुई मिलोगी। क्योंकि जीना तो है ही, फिर क्यों न अपनी ग़लतियों को सुधार कर आगे बढ़ा जाय। अब मैं चलती हूँ। और हाँ अब फ़ेसबुक पर सोच समझ कर ही दोस्त बनाना। वरना मैं भी माफ़ नहीं करूँगी। मेरी तुम्हारी दोस्ती क्या काफ़ी नहीं?” 

उसे विदा करने के बाद रिया मन ही मन कहने लगी, ‘तुम्हें क्या पता नीलम। अब मेरी ज़िन्दगी ठूँठे पेड़ की तरह हो गयी है, जो ज़मीं पे खड़ा तो रहता है, पर बिन पत्तियों का—उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। अब मेरी ज़िन्दगी में वंसत कहाँ। एक छोटी सी ख़ता पल में ज़िन्दगी बदल देती है, विश्वास का धागा जब टूटता है तो कुछ भी नहीं बचता। बच भी जाय तो गाँठ तो पड़ ही जाती है।’ 

सच ही तो है रिया की एक छोटी सी ख़ता, नासूर बन के रह गयी। एक लम्हे की ख़ता ने उसकी ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छीन ली। क्या हज़ार आँसू, चरित्र पर लगे एक दाग़ को मिटा सकते हैं? बात कुछ भी तो नहीं थी। पर सोचनेवाले के लिए तो बहुत कुछ थी . . . रिया ने भले ही सुबोध से पेंटिग से संबधित बातें की हों, पर शक का कीड़ा तो कुलबुलाना ही था अक्षय में। क्योंकि सुबोध वह व्यक्ति था जिसने रिया से कभी प्यार का इज़हार किया था। चाहे एकतरफ़ा ही क्यों न हो! इसलिए अक्षय को भी दोषी नहीं मान सकते। 

रिया जीवन भर ग्लानि में जीती रही। क्योंकि समय गुज़र जाता है। ग़लतियाँ इन्सान को जीवन भर कचोटती रहती हैं। जीवन में इस तरह की समस्या आए तो शक करने से पहले आपस में बात कर लेनी चाहिए, वरना पति–पत्नि में तलाक़ की नौबत आ जाती है। जो अक्सर देखने को मिलता है। ज़रूरी नहीं कि जो दिखता है वह सच ही हो। आवश्यकता है एक दूसरे पर विश्वास करने की। तभी सांसारिक जीवन ख़ुशहाल हो सकता है।

यह सच है कि फ़ेसबुक हो या ट्वीटर यह जीवन के क्षेत्र में जितना कारगर सिद्ध हुआ है, उतना ही कभी-कभी नुक़्सान भी पहुँचाता है। 

यह तो एक मायाजाल के रूप में उभरा है। इस मायाजाल से बचिए। वरना रिया की तरह पश्चात्ताप और ग्लानि में जीवन व्यतीत होने लगता है। हज़ार सच एक झूठ पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं। सच तो सच है उजागर हो ही जाता है। इसलिए अपने पार्टनर से झूठ नहीं बोलना चाहिए। एक झूठ के कारण रिया अब ख़ुश नहीं रहती। क्योंकि वह झूठ बोले या न बोले उसकी हर बात में उसके पति अक्षय को झूठ ही नज़र आता है। अक्सर वह कहा करता है कि तुम झूठी हो। तब रिया को रोना आता है, अब वह कोई सफ़ाई भी नहीं देना चाहती। जो एक बार नज़र से गिर जाता है वह फिर उस इन्सान के नज़र में उठ नहीं सकता। यही सच है। अब रोकर या हँसकर रिया को ऐसे ही ताने सुनते हुए ज़िन्दगी गुज़ारनी होगी।

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