पुत्र के लिए

01-01-2026

पुत्र के लिए

डॉ. परमजीत ओबराय (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

पुत्र तुम इतने बड़े मत होना—
कि ग़लती करने पर, 
 मैं तुम्हें—
डाँट न सकूँ।
 
तुम इतने बड़े मत होना कि—
बिलकुल चुप रहो, 
मैं तुम्हें अपनी—
सलाह न दे सकूँ। 
 
तुम इतने समझदार मत बनना—
कि मैं तुम्हें समझा न सकूँ, 
तुम इतने अधिक लायक़ न बनना—
कि मैं तुम्हें बातों-बातों मैं, 
नालायक़ न कह सकूँ। 
 
तुम इतने बड़े मत बनना—
कि तुम अपना सिर, 
 गोदी में न रख सको। 
 
तुम सब कुछ स्वयं मत खाना—
कि रोटी का कोर भी, 
 मैं तुम्हें न खिला सकूँ। 
 
तुम इतने बड़े हो जाना—
पर न भूलना, 
झुककर मुझसे बात करना। 
 
जानती हूँ—
कि तुम बड़े हो जाओगे, 
समझदार हो जाओगे—
महकोगे, 
पर माँ से तुतलाकर—
मरोट, केंडल जला लूँ, 
पूछना न भूलना। 
 
मेरे जीवन के प्राण हो तुम—
बिन तुम्हारे जीवन नहीं, 
लाल मेरे—
हीरे हो तुम। 
 
बिन चाँद जैसे आसमां—
बिन सूरज जैसे दिन, 
बिन फूलों जैसे बहार—
बिन लय जैसे गीत, 
मैं हूँ ऐसे बिन तुम। 
 
अपने जीवन को रोशन बनाना—
उन्नति कर तुम, 
किन्तु मेरा हृदय हो तुम—
न भूलना कभी तुम। 
 
अपनी जी जान से भी—
प्यारे हो तुम, 
यह अहसास गर न हो तुम्हें—
फिर भी बताना न तुम। 
 
एक ही होती है माँ जीवन में—
और रिश्ते अनेक, 
हो सकते हैं—
न भूलना सदा तुम। 

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