पप्पा सुनो न, प्लीज़

15-01-2026

पप्पा सुनो न, प्लीज़

विजय नगरकर (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


मूल लेखक: मनोहर विभांडिक 
मूल मराठी से अनुवाद: विजय नगरकर

 
मनोहर विभांडिक मराठी साहित्य में एक ऐसे कवि के रूप में उभरे हैं, जिनकी कविता ने पिछले चार दशकों से अपनी अनूठी पहचान बनाई है। उनकी कविता का सबसे बड़ा यश यह है कि वह अपने पूर्ववर्तियों की परंपराओं से अलग हटकर एक नई अभिव्यक्ति के साथ सामने आई है। उनकी रचनाएँ किसी एक ख़ास चौखट में बँधी नहीं हैं—चाहे वह ग्रामीण हो, दलित हो, नागर हो, महानगरी हो, स्त्रीवादी हो या सामाजिक हो। 

उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद सादर प्रस्तुत है। 


पप्पा सुनो न, प्लीज़ 
तुम्हारी वो . . . 
 
अच्छा-अच्छा 
देखी न पोस्ट 
शानदार है न! . . . 
अरे, ऐसे भगाया न
धकेलते-धकेलते दूर तक 
थोड़ा और ज़ोर लगाया होता न
तो जाकर धड़ाम से गिरते 
उनके राज्य में . . . 
 
कहते हैं क्या, फ़्रूट मर्चेंट . . . 
अरे, फूटो सालो 
यहाँ आकर पेट भरते हो 
ऊपर से 
उनकी ही भाषा में बोलोगे . . . 
ऐसी सनसनाकर लगायी न 
हमारे कर्नल अंकल ने 
दो-चार लोगों को कि 
सामने वाले को नहीं लगा होगा 
कि बूढ़ा रिटायर्ड होकर 
दस साल बीत गये होंगे, फिर भी . . . 
 
फटाफट 
फिर कहने लगे 
हमारे पीछे अष्टक और स्तोत्र 
कि भैंसा भी शरमा गया होगा 
उसे सुनकर . . . 
 
पप्पा सुनो न प्लीज़़ 
पप्पा . . . 
 
हाँ 
तो मैं क्या बता रहा था 
देख, कल-परसों 
यह कार्यक्रम किया बेटा 
 
तो पिछले हफ़्ते 
पानीपुरीवालों के 
फोड़े मटके 
बड़े-बड़े गमछे-वमछे 
पहनकर घूम रहे थे 
शान से 
अब भागेंगे साले 
लँगोटी सँभालते हुए . . . 
 
पप्पा सुनो न, प्लीज़ 
ओ पप्पा . . . 
 
और वह कबाड़ीवाला 
आता था न 
हमारी कॉलोनी में 
देख, वह निकला जासूस, 
हमारी कॉलोनी की 
रेकी करके विस्तार से 
जानकारी दे रहा था 
पड़ोसी देश में 
अपने भाइयों को . . . 
 
प्रोफ़ेसर काका ने 
बिल्कुल सही पहचानी 
उसकी भाषा 
और फिर 
क्या पूछते हो . . . 
प्लान तय हुआ 
रात की बैठक में 
सुबह-सुबह 
कॉलोनी में घुसा 
जब वह
अपने बेटे के साथ 
तो हम ऐसे दौड़े उस पर कि 
भागता ही चला गया 
गाड़ी सँभालते हुए . . . 
 
वह आगे और हम पीछे . . . 
वह आगे और हम पीछे . . . 
बड़ा मज़ा आया! 
 
आख़िर में भैयाजी ने 
ऐसा निशाना साधकर 
डंडा फेंका न कि 
पैर के दो टुकड़े ही 
हो गये होंगे उसके 
अंदर ही अंदर 
अब पी कहो 
घर जाकर 
पैरों का सूप गटागट . . . 
 
पप्पा सुनो न, प्लीज़ . . . 
सुनिए पप्पा . . . 
 
अरे भाई . . . 
वह पहाड़ 
याद है क्या तुझे 
हमारी छत से 
दिखता था दूर खड़ा . . . 
वहाँ बड़ा आश्रम 
बना रहे हैं हम सभी मिलकर, 
बाबा का आश्रम
एक पैर पर खड़े हैं 
बाबा हिमालय में 
तीन सौ सालों से . . . 
तो वहाँ के निर्माण के लिए 
आए न परदेसी लोग 
हम गए
थोड़ा हंगामा किया, कहा कि 
यह नहीं चलेगा तो . . . 
कॉन्ट्रैक्टर सुनो न . . . 
फिर क्या 
बाबा को टाइल्स लगाई 
सब बैठ गए ध्यान में . . . 
 
फोटो में मध्य रात को 
बाबा के पद्म हिलते हुए 
कइयों को दिखे . . . 
 
तो भाई चमत्कार देख 
सुबह-सुबह ये 
ज़ोर-ज़ोर से चीख़ें 
सुनाई दीं 
गिर गई न दीवार बेटा 
अपने आप 
आड़ में सोए थे वे
वहीं दब गए 
चौदह-पंद्रह लोग थे कहते हैं . . . 
 
पप्पा, सुनिए पप्पा 
सुनो न प्लीज़़, तुम 
जो बता रहे हो न . . . 
 
 . . . वह बहुत इंटरेस्टिंग लगता है 
ऐसे ही कहना था न तुझे? 
है न बेटा इंटरेस्टिंग 
और थ्रिलिंग भी . . . 
राष्ट्र के लिए, धर्म के लिए 
कुछ करने का 
मौक़ा मिल रहा है 
इस उम्र में हमें . . . 
अरे, ज़िंदगी भर 
झाड़ू-पोंछा मारकर 
पैसे कमाए
बैंक भरे 
और उस चक्कर में 
देव-धर्म से दूर ही रह गए न . . . 
 
देख, 
मुझे भी बड़ा 
टेंशन था कि 
रिटायर्ड होने के बाद 
टाइम पास 
कैसे होगा इसका 
लेकिन तुझे बताता हूँ 
अब टाइम ही नहीं मिलता 
हमें . . . 
 
सुबह जल्दी उठता हूँ 
घूमकर आता हूँ 
कोई कार्यक्रम दिया गया 
होता है, तो उसे बजाता हूँ . . . 
 
सेंटर पर 
नाश्ता होता है सबका 
शेट्टी भेजता है 
नरम-नरम इडली 
दाँत नहीं हैं 
उन काकाओं के लिए . . . 
भावी नगर सेवक 
चाय पिलाते हैं 
बारी-बारी से 
रात को सप्ताह में 
थोड़ा नाच लेता हूँ . . . 
 
मैसेज पढ़ते हैं हम 
एक-दूसरे के 
एक-दूसरे को भेजते हैं 
दिन भर एक-दूसरे को 
लाइक्स का अँगूठा 
दिखाते रहते हैं 
कोई प्रगतिशील मिल जाए
तो फिर उसे 
ख़ूब झाड़ते हैं 
इसको मारो 
उसको भगाओ 
यह खोदो 
वह गिराओ 
और इसी में
दिन आराम से निकल जाता है . . . 
 
पप्पा सुनो न, प्लीज़ 
मैं अब क्या कहता हूँ . . . 
 
स्विच मारता हूँ वही . . . 
मार बेटा, मार 
जल्दी-जल्दी स्विच मार 
तेरी मम्मी के 
अगले जन्मदिन तक 
पाँच करोड़ का पैकेज 
होना चाहिए हमारा 
मार . . . मार . . . स्विच मार . . . 
 
पप्पा, सुनिए पप्पा 
सुनो न प्लीज़ . . . 
यह देखो . . . मेरी तो सुनो ज़रा . . . 
तुम करते हो न 
वहाँ कार्यक्रम 
वैसे ही करने लगे 
यहाँ के अंकल 
और भाई भी . . . 
 
वीक-एंड पर 
इकट्ठा हुए थे हम सब 
तो पीछे से धमाल 
मचा रहे हैं कब से 
अपार्टमेंट के नीचे 
“गो बैक” कह रहे हैं 
पप्पा वो 
“गो बैक” . . . 
 
पप्पा 
कबाड़ीवाले काका को 
भागने के लिए 
कम-से-कम रास्ता तो था . . . 
यहाँ बाहर शून्य से नीचे 
पारा है पप्पा 
सब कुछ 
जमकर ठंडा हो जाएगा पप्पा 
चीख़ भी नहीं फूटेगी 
और फूटी भी 
तो शायद 
पहचान भी 
नहीं पाओगे तुम कि 
वह उस दीवार के नीचे 
दबे हुए लोगों की है 
या हमारी है कहकर . . . 
 
सुन रहे हो न पप्पा 
सुनो न, प्लीज़ 
प्लीज़ सुनो न . . . 

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