किताबें मेरा सुख और मेरी विपदा

01-02-2026

किताबें मेरा सुख और मेरी विपदा

विजय नगरकर (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


मूल मराठी लेख का हिंदी अनुवाद:  विजय नगरकर 


(भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मराठी साहित्यिक स्व. वि.स. खांडेकर द्वारा लिखित मराठी लेख का हिंदी अनुवाद जो मराठी पत्रिका ‘साहित्य’, जनवरी १९४७ में प्रकाशित हुआ था) 

 

आजकल मैं एक बड़ी उलझन में हूँ। बहुत दिनों से वज़न नहीं किया, इसलिए इस नई चिंता का मेरी सेहत पर क्या असर हुआ है, यह मैं पौंड्स में किसी को समझा नहीं सकता, यह तो सच है! पर अगर सोना एक सौ एक रुपये तोला होता और उसे कंगन बनवाने जितने पैसे मेरी जेब में खनखना रहे होते तो—तो क्या होता? शकुंतला के विरह में दुष्यंत के कंगन कोहनी तक सरकने लगे थे न? आज मेरी भी ठीक वैसी ही हालत होती! पर अगर कोई यह सोचे कि मेरे इस मूक दुख की जड़ में शकुंतला जैसी कोई मृगनयनी है, तो उसकी भारी फ़ज़ीहत हो जाएगी। 

बचपन में परीक्षा, जवानी में प्रेम, प्रौढ़ावस्था में बेटियों की शादी और बुढ़ापे में मृत्यु—ये चार ऐसे विषय हैं जो इंसान को भोजन का स्वाद नहीं लेने देते। मुझे आज भी याद है कि बचपन में परीक्षा का ख़्याल आते ही मेरी क्या हालत हो जाती थी। परीक्षा जैसे ही नज़दीक आती, मैं चुपचाप दत्तगुरु की शरण में चला जाता। उन दिनों मेरे दत्त-दर्शन के पवित्र व्रत में एक दिन का भी खंडन नहीं हुआ! गणपति का मंदिर हमारे घर के बिलकुल पास था, फिर भी मैं दत्तभक्त कैसे बन गया, यह सोचकर अब मुझे ख़ुद पर ही आश्चर्य होता है। शायद मेरे बालमन ने सोचा होगा—गणपति के पीछे तो अष्ट नायिकाओं का अष्ट पहर ताँता लगा रहता होगा! उनका झगड़ा सुलझाने में ही उनका सारा समय बीत जाता होगा! ऐसी स्थिति में वह हम जैसे शरारती विद्यार्थियों की मदद के लिए कैसे आ पाएँगे? और इसके ऊपर, ये लंबोदर अपनी जगह से उठे भी तो क्या तेज़ी से दौड़ पाएँगे? उनसे तो हमारे दत्त महाराज सौ गुना बेहतर हैं! एक तो उनके पीछे स्त्री-बच्चों का झंझट नहीं और दूसरा, उनकी तो साधारण चाल भी हवाई जहाज़ को पीछे छोड़ देगी। आज औदुंबर में तो कल गाणगापुर में रहने वाले भगवान ही परीक्षकों से हमारी रक्षा कर पाएँगे। 

सौभाग्य से, प्रेम के मामले में मुझे भगवान से मन्नत माँगने की नौबत नहीं आई। बीस से तीस साल की उम्र तक मैं अपना संसार चलाने में इतना व्यस्त हो गया था कि मुझे शादी के बारे में सोचने की ज़्यादा फ़ुर्सत ही नहीं मिली। आख़िरकार, जब रामदास का यह उपदेश कि ‘पहले गृहस्थी अच्छे से चलाओ’, मुझे पूरी तरह समझ आया, तो मैंने तुरंत एक लड़की पसंद कर ली। मेरी इस वधू-परीक्षा के पीछे सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं—उसकी आँखें, पाक-कला में उसकी डॉक्टरेट लायक़ कुशलता, और उसी वक़्त मेरे हाथ में आया एक मनमोहक हरे चम्पा का फूल। 

अब मैं प्रौढ़ हो चुका हूँ, इसलिए आप में से कई लोगों को लगता होगा कि मेरी मौजूदा चिंता ज़रूर मेरी बेटियों की शादी की होगी। ‘जिसकी बेटी हुई है सयानी, उसे सताए चिंता’—यह पद गाकर बार-बार ‘वन्स मोर’ लेने वाली साठ साल पुरानी सौभद्रा नाटक की नटी अगर आज ग़लती से हमारे घर हल्दी-कुमकुम के लिए आ जाए, तो वह पल भर के लिए बेहोश हो जाएगी, यह मैं स्वीकार करता हूँ। एक के बाद एक चार कन्याएँ देखकर उस बेचारी की . . . 

 . . . पर ऐसा बिलकुल नहीं है कि मैं अभी बेटियों की शादी की चिंता से परेशान हूँ। उस मामले में अभी आठ-दस साल तक तो मैं निश्चिंत हूँ। मुझे उम्मीद है कि तब तक प्रेम विवाह आम हो जाएँगे। 

मेरी चिंता का असली कारण कुछ और ही है। मैं सोच रहा हूँ कि दोस्तों को बताऊँ या न बताऊँ। आप में से ज़्यादातर को शायद यह बात समझ न आए, पर कहते हैं न कि प्यारे दोस्त से अपना दुख बाँटने पर मन हल्का हो जाता है? 

मेरे घर की सात अलमारियाँ किताबों से भरी हैं और इस वजह से जो मेरी हालत है, वह ऐसी है कि कुत्ता भी न खाए। कहते हैं, जब सिकंदर को दुनिया जीतने के लिए कुछ नहीं बचा, तो वह रोने लगा था! नई किताब आने पर उसे रखने की जगह नहीं मिलती, तो मैं भी उसी की तरह माथा पकड़कर बैठ जाता हूँ। आठ साल पहले जब मैं शिरोडा से कोल्हापुर आया, तो साथ में चुनिंदा सौ-डेढ़ सौ किताबें लाया था। पर हिंदुस्तान की जनसंख्या की तरह मेरी किताबों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ती गई। मैंने कहीं पढ़ा था कि चींटियाँ, चुंबन और संकट कभी अकेले नहीं आते। अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि इस सूची में किताबें भी जोड़ देनी चाहिएँ। अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो एक-दो साल में पैसे, कपड़े, दही का जामन, मुरब्बे या अचार के जार जैसी ज़रूरी चीज़ों को रखने के लिए हमारे घर में जगह नहीं बचेगी, यह तय है। 

पिछले दो-तीन सालों में मेरे और मेरी पत्नी के बीच ज़्यादा बहस होने लगी है। मुझे लगता है कि इस कलह की मुख्य वजह मेरे घर के राज-पाट पर हमला करने वाली यह किताबों की फ़ौज ही होगी। उसे घर और घर की सभी चीज़ें क़रीने से रखे बिना चैन नहीं मिलता। ज़ाहिर है, उसे जितनी अलमारियाँ मिलें, उतनी कम हैं। और मुझे बचपन से ही किताबों से बेहद प्रेम है, इसलिए उन्हें अटारी में दवाओं की ख़ाली बोतलों और फटी-पुरानी चप्पलों के साथ रखने का ख़्याल मुझे राक्षसी लगता है। इसलिए मुझे भी जितनी अलमारियाँ मिलती हैं, वे कम ही पड़ती हैं। कुछ साल पहले मैंने अख़बार में पढ़ा था कि एक अमेरिकी महिला ने तलाक़ ले लिया क्योंकि उसका पति बहुत ज़ोर से खर्राटे लेता था। उस समय मुझे उस ख़बर पर बहुत हँसी आई थी। पर अब मुझे यक़ीन हो गया है कि पति-पत्नी के झगड़े को चरम पर ले जाने के लिए एक अलमारी जैसा छोटा-सा कारण भी काफ़ी होता है। 

जब मैं किताबों से भरी अलमारियों को देखता हूँ, तो मेरे मन में जो अनगिनत मधुर यादें जागृत होती हैं, उनकी कल्पना मेरी पत्नी कैसे कर सकती है? 

मैं पहली या दूसरी कक्षा में था, जब मुझे 'वसईचा वेढा' नाम की एक पाँच आने की किताब इनाम में मिली थी। पहले पन्ने पर गणेश सखाराम खांडेकर नाम लिखकर जब मैंने उसे अच्छी तरह गंदा कर दिया, तो हमारे क्लास टीचर ने देखा कि इनाम की किताबों में कुछ गड़बड़ हुई है। हेडमास्टर ने फ़रमान सुनाया कि वह किताब वापस करके दूसरी ले आऊँ, लेकिन चाहे उसके कुछ पन्ने फटे होने की वजह से हो, या साथ रहने से हुए लगाव की वजह से, या उस किताब में चिमाजी अप्पा के पराक्रम के वर्णन से मेरे बालमन के वीर रस में भर जाने की वजह से हो, मैंने मन ही मन सोच लिया कि चाहे लड़ना पड़े, पर यह किताब वापस नहीं करनी है। यह विचार उस समय कई दिनों तक मेरे दिमाग़ में घूमता रहा था। आगे चलकर मुझे पढ़ने की लत लग गई—नहीं, वह एक व्यसन ही था, कहने की ज़रूरत नहीं! 

मामा के नाम पर लाइब्रेरी से रोज़ एक किताब लाता और देखते ही देखते उसे ख़त्म कर देता था! इस पढ़ने की लत से कभी-कभी मुझे बहुत परेशानी भी होती थी! ऐसा इसलिए होता था क्योंकि ‘गड आला पण सिंह गेला!’ (गढ़ आया पर शेर गया) यह हरिभाऊ की कहानी मैंने एक दिन ऐसे पढ़ी, जैसे कोई भूखा खाना खाता है। इस कहानी ने मुझे इतना मोहित कर लिया कि मेरे मन में यह तीव्र इच्छा जागृत हुई कि यह किताब मेरे पास होनी ही चाहिए। 

किसी भी मनचाही चीज़ को पाने के लिए ग़रीब आदमी के पास भिक्षा, उधार और चोरी, ये तीन ही रास्ते होते हैं और किताबों के मामले में पहला रास्ता मेरे जैसे बच्चे के लिए सफल होने की सम्भावना नहीं रखता था, इसलिए उस समय लाइब्रेरी से वह किताब चुराने का विचार मेरे मन में आया था, यह अब स्वीकार करने में कोई दिक़्क़त नहीं है। यह अलग बात है कि चोरी करने का साहस मुझमें नहीं था, इसलिए मैं उस विचार को अमल में नहीं ला पाया। पर उस समय एक बार मैं आधी रात को चीखता हुआ उठ गया था। मेरे शरीर से पसीना बह रहा था! मैंने सपना देखा था कि लाइब्रेरी का क्लर्क मुझे पुलिस के हवाले कर रहा है! 

कॉलेज जाने के बाद मेरा किताबों के प्रति यह प्रेम चरम पर पहुँच गया। उन दिनों मैं किताबें पढ़ते समय खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रखता था। इतना ही नहीं, अपनी पसंदीदा किताबें हमेशा अपने पास रहें, इसलिए मैंने कई बार अन्न-सत्याग्रह भी किया है। मेरे पास आज तीस सालों से पड़ा हुआ सुंदर नीले गत्ते वाला शेरिडन के नाटकों का यह संग्रह—मेरे पहले अन्न-सत्याग्रह का गवाह है! गडकरी ने मुझे ‘स्कूल फ़ॉर स्कैंडल्स’ नाटक ख़ास तौर पर पढ़ने के लिए कहा था। मैं उनकी किताब ले जाकर पढ़ आया। वह मुझे इतनी पसंद आई कि मैंने तुरंत बाज़ार जाकर शेरिडन के सभी नाटकों के संग्रह की तलाश की। 

एक रुपया चौदह आने में वह नीले गत्ते वाली सुंदर किताब मिल रही थी। महीने के ख़र्च से इतनी बड़ी रक़म निकालना उस समय मेरे लिए बिलकुल असंभव था, पर कुछ भी हो, मुझे वह किताब चाहिए थी। आख़िरकार, मैंने उसे पाने का एक नया तरीक़ा खोज निकाला—तीन-चार दिन मैं सिर्फ़ एक वक़्त खाना खाता और आख़िरकार, इस बड़ी रक़म को पूरा करने के लिए पंचांग में कोई एकादशी न होते हुए भी उस दिन मैंने निर्जला एकादशी का पुण्य कमा लिया। 

बाद में लेखक बनने पर किताबों के प्रति मेरा यह प्रेम अनजाने में भक्ति में बदल गया। ख़ुद को मार्गदर्शन मिले, इसलिए ख़रीदी हुई, कई लेखकों से उपहार में मिली हुई, दोस्तों द्वारा ख़ास तौर पर भेजी हुई, ख़ुद मँगवाई हुई—ऐसी सैकड़ों किताबें मेरे चारों ओर हमेशा नाचती रहती थीं। ग्रंथ ही इंसान के सच्चे मित्र होते हैं, इस सूक्ति को याद करके मैं किताबों के इस ढेर को बड़े गर्व से देखता था। बाद में जब मैं पुणे-मुंबई जाता और रास्ते में कोई किताबों की दुकान दिखतीं, तो मेरी हालत ऐसी हो जाती, जैसे शराब की दुकान के सामने से गुज़रते शराबी की होती है। दुकान में नई-नई अनगिनत किताबें मुझे अंदर बुलातीं। जेब में रखे सीमित पैसे मुझे चेतावनी देते, “होश में आओ, होश में आओ, लालच में मत पड़ो!” मन को पक्का करके मैं किसी तरह चार क़दम आगे बढ़ने की कोशिश करता, पर तुरंत ही मेरे पैर वापस मुड़ जाते। ऐसे ही एक मौक़े पर, ज़रूरी दवा लेने के लिए मैं बाज़ार जा रहा था, जेब में सिर्फ़ पाँच रुपये का नोट था। उस दिन मैं घर वापस आया, तो एक नया रूसी कहानियों का संग्रह लेकर! जब पत्नी ने पूछा कि दवा कहाँ है, तो मैंने तुरंत जवाब दिया कि पेट में बेवजह दवाएँ भरने से पहले मैंने प्राकृतिक उपचार करने का फ़ैसला किया है और उस कहानियों के संग्रह की पहली कहानी पढ़ने लगा। 

इस उन्माद की अवस्था में मैंने कितनी किताबें ख़रीदी होंगी, यह तो भगवान ही जाने। इन सभी किताबों की देखभाल में मेरा इतना अनमोल समय ख़र्च हुआ है कि—अलमारियाँ झाड़ते, किताबें पोंछते और उनमें से छिपकर निकलने वाले फ़ुर्तीले कीड़ों का शिकार करते हुए मैं ख़ुद से सत्रह बार कह चुका हूँ, “बच्चे और किताबें, दोनों पहली नज़र में बहुत सुखदायक लगते हैं; पर उन्हें सँभालने की परेशानी—छी! सीता-सावित्री से गांधारी की महानता कुछ अलग ही है। एक साथ सौ बच्चे ‘माँ, माँ, माँ’ कहकर चिल्लाने लगें, तो वह माँ—“
डामर की गोलियाँ और वेखंड (एक जड़ी-बूटी) रखना, झाड़ू लगाना, पढ़ने के लिए दी गई पर वापस न लाई गई किताबों की चिंता करना—एक नहीं, दो नहीं, कितनी परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं इन किताबों को सँभालते हुए! आज तक मैंने उन्हें बड़े आनंद से झेला! पर अब किताबों की इन सात अलमारियों में से कम से कम दो तो ख़ाली होनी ही चाहिए, ऐसा रानी साहिबा की तरफ़ से आख़िरी फ़रमान आ गया है, इसलिए—
एक पल के लिए मुझे लगा, क्यों न मैं भी उनसे पूछूँ कि तुम्हारे अचार और मुरब्बे के जार घर में क्यों चाहिए! पर तुरंत मुझे ध्यान आया कि दोपहर का समय सबसे मुश्किल होता है। 

मैं चुपचाप सभी अलमारियाँ खंगालने लगा। उनमें से कौन-सी किताबें घर से बाहर की जा सकती हैं, यह विचार मेरे मन में आया ही था कि—

 . . . उसके बाद आए एक नए विचार से मैं ख़ुद ही हैरान रह गया। उसकी सच्चाई को मैं किसी भी तरह से नकार नहीं पा रहा था। वह विचार कह रहा था, ‘इन सात अलमारियों में से कितनी किताबें तुम बार-बार पढ़ते हो? तुम्हारी सबसे पसंदीदा पचास-साठ किताबें भी नहीं हैं। बाक़ी की किताबें तुमने सिर्फ़ अपनी बड़ाई दिखाने के लिए रखी हैं। है न? बाबू, यह अमीरों के गहनों की तरह तुम्हारे अहंकार का प्रदर्शन है। तुम्हारी सच्ची ज़रूरत नहीं है। इनमें से आधी किताबें तो ऐसी हैं कि अगर कोई बड़ा इनाम भी लगा दे, तो भी तुम उन्हें पूरा नहीं पढ़ पाओगे। उनके बिना तुम्हारा पूरे जीवन में कुछ नहीं अटकेगा! सिर्फ़ अंध-प्रेम की वजह से क्या हर इंसान में तुलसीदास का कुछ अंश होता है, कौन जाने? पर खिड़की से लटकते साँप के सहारे आधी रात को प्रेमिका से मिलने जाने जितनी उसकी शृंगार वृत्ति जैसे उत्तान थी, वैसे ही मोहभंग होने पर प्रभु रामचंद्र के अलावा बाक़ी दुनिया को भूल जाने जितनी उसकी भक्ति भावना भी तीव्र थी। अनुराग और वैराग्य शायद आम इंसान के मन में भी इसी तरह जोड़ी में रहते होंगे, नहीं तो बचपन से किताबों की पूजा करने वाले मेरे जैसे इंसान के मन में ऐसा अजीब विचार बिजली की तरह एकदम से क्यों कौंधता? 

इस नई दृष्टि से जब मैं अपनी सात अलमारियों को देखने लगा, तो मुझे ख़ुद पर ही हँसी आई। बचपन में बालमन को किताबों से बहुत प्यार महसूस होता है, इसमें कुछ भी अजीब नहीं है। उस उम्र में अक्षर-ज्ञान और गीतारहस्य, दोनों ही सरस्वती के क्रीड़ा-स्थल लगते हैं। पर बचपन में किताबों की तरह मुझे गुल्ली-डंडे का भी बहुत शौक़ था। पर उस समय ज़बरदस्ती से हासिल किए गए कई रंग-बिरंगे गुल्ली-डंडों में से एक भी आज मेरे संग्रह में नहीं है, और किताबों के प्रति तब का अंध-आदर मैं अभी तक दिल से लगाए बैठा हूँ। विद्यार्थी जीवन में किताबें मुझे देवता जैसी लगती थीं। उस भावना को कौन अनुचित कह सकता है? जिन चिड़ियों के पंख नहीं निकले होते, उन्हें अनंत आकाश को देखने की भूख माँ के वर्णन से ही मिटानी पड़ती है! प्रेम, कीर्ति, नीति, त्याग, भोग, राग, लोभ आदि के तीव्र परिचय के लिए लालायित मेरे जैसे बीस साल के युवा को उस समय किताबों के अलावा और कौन संतुष्ट कर सकता था? पर किताबों के प्रति वह युवावस्था का लगाव अभी तक मेरे मन में दृढ़ता से बैठा हुआ है, यह कितनी हास्यास्पद बात है! हमें यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिए थी कि मूर्ति-भंजन भी मूर्ति-पूजा की तरह जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है। 

पिछले पच्चीस सालों में हमने जीवन के सभी पहलुओं को बहुत क़रीब से देखा है, है ना? पर हमारी ज़िन्दगी के प्याले में आधा ज़हर और आधा अमृत डालकर भगवान ने उसे जो अनोखा स्वाद दिया है, उसका अनुभव इन अलमारियों की पाँच-पचास किताबें पढ़ते समय ही हमें मिला, बाक़ी की किताबें तो क़रीने से दिखने वाली निर्जीव गुड़िया हैं! ज़्यादातर सामान्य, कुछ सुंदर, और एकाध ऐसी जो सजीव लगे! सिर्फ़ आदत की वजह से हम इन सारी गुड़ियों को अप्सरा मानते थे। जिन फूलों को सूँघने के बाद हम मुरझाते ही फेंक देते थे, वैसे ही क्षणिक मनोरंजन या हल्की-फुल्की बौद्धिक क्रीड़ा के लिए पास रखी गई इन अनगिनत किताबों को हमें बहुत पहले ही दूर कर देना चाहिए था। 

किताबें दोस्तों जैसी होती हैं, यह सच है! पर हज़ारों दोस्त होने जैसा दुर्भाग्य दुनिया में कोई नहीं होगा! बूढ़ा और उसका बैल वाली कहानी में बूढ़े की जो फ़ज़ीहत हुई, वह इसीलिए हुई थी न कि वह जिससे भी मिलता, उसे ही अपना सच्चा दोस्त मानकर उससे सलाह माँगने लगता था? सैकड़ों किताबों का परिवार रखने वाले इंसान की भी जीवन-ज्ञान के मामले में ऐसी ही दुर्दशा होती होगी। हर किताब में कुछ ख़ास ज्ञान या तीव्र आनंद के कुछ क्षण ज़रूर होंगे, यह कल्पना छपाई के आविष्कार से पहले कुछ हद तक सही हो सकती है। पर वह आविष्कार होने और लेखन कला के व्यवसाय में बदलने के बाद मुझे वह अजीब सूक्ति बार-बार याद आने लगी—जो इंसान के पशुत्व को ख़त्म करता है, वह धर्म है और जो इंसान के देवत्व को पत्थर बनाता है, वह धंधा है। 

अब मैं अपनी सात अलमारियों को तिरस्कार से देखने लगा। इन्हें ख़ाली करते समय क्या कसौटी अपनाऊँ, यह विचार मन में आते ही मुझे व्हिटमन का वाक्य याद आया—‘Who touches a book touches a man’ (जो किताब को छूता है, वह इंसान को छूता है)। मैंने मन में तय कर लिया कि मैं सिर्फ़ वही किताबें रखूँगा जिनसे किसी महान आत्मा का दर्शन होता हो। इस कसौटी से मुझे यक़ीन हो गया कि मेरी दो ही नहीं, बल्कि पाँच अलमारियाँ भी देखते ही देखते ख़ाली हो जाएँगी। 

जब मैंने पत्नी को बुलाकर यह अच्छी ख़बर सुनाई, तो वह बोली, “मैं कितने दिनों से आपके कान में यह बात कह रही थी। पर जो बात कल समझ आनी चाहिए, वह आपको कल समझ आती है! छोड़िए इन बातों को—ये पाँच अलमारियाँ कब ख़ाली करके दे रहे हैं?” 

“यह तो बहुत मुश्किल काम है, भई! कौन-सी किताबें रखनी हैं और किसे छुट्टी देनी है—मई में बच्चे मदद कर पाएँगे। तो आने वाले मई महीने में—”

मेरा यह छह महीने का वादा सुनकर वह चिढ़ती हुई अंदर चली गई। मैं उसे दिया हुआ वचन किसी भी हालत में पूरा करूँगा। पर मेरे मन में बार-बार एक ही बात आ रही है, ‘अगर इन छह महीनों में मुझे ज़्यादा अलमारियों वाला घर मिल जाए तो क्या बात होगी!!’

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