वो ही चला मिटाने नामो-निशां हमारा

01-08-2014

वो ही चला मिटाने नामो-निशां हमारा

देवी नागरानी

221 2122 // 221 2122


वो ही चला मिटाने नामो-निशां हमारा
जो आज तक रहा था जाने-जहां हमारा


दुश्मन से जा मिला है अब बाग़बाँ हमारा
सैयाद बन गया है लो राज़दां हमारा


ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
कोई तो आ के सुनता दर्द-ए-निहां हमारा


हर बार क्यों नज़र है बर्क़े-तपां की हम पर
हर बार ही निशाना क्यों आशियाँ हमारा


दुश्मन का भी भरोसा हमने कभी न तोड़ा
बस उस यक़ीं पे चलता है कारवां हमारा


बहरों की बस्तियों में हम चीख़ कर करें क्या
चिल्लाना-चीख़ना सब है रायगां हमारा


परकैंच वो परिंदे हसरत से कह रहे हैं
‘देवी’ नहीं रहा अब ये आसमां हमारा

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा
कहानी
साहित्यिक आलेख
ग़ज़ल
अनूदित कविता
अनूदित कहानी
पुस्तक चर्चा
बाल साहित्य कविता
विडियो
ऑडियो