स्वयंसिद्धा – ए मिशन विद ए विज़न - 2 

15-10-2020

स्वयंसिद्धा – ए मिशन विद ए विज़न - 2 

देवी नागरानी

आइये इस सिलसिलेवार सफ़र को अंजाम तक ले जाते है।.. वहाँ जहाँ घर की लक्ष्मी अपनी पहचान पाने में जूझ रही है, वही विवाहित महिलाओं का सांस्कृतिक समूह सोनाली जी किस दिशा में ले जाना चाहती थीं, आइये सुनते हैं —

देवी नागरानी:

आपको कब और क्यों लगा कि औरत को अपनी पहचान पानी चाहिए? That a woman has to come out of the cocoon of womanhood? समाज में इसका क्या स्थान व् मूल्यांकन है?

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

मैं बचपन से ही अपनी पहचान के प्रति संवेदनशील थी।

मैं चाहती थी मैं अपने नाम से जानी जाऊँ, न कि इस की बेटी, उसकी बहू, उसकी पत्नी। जब मेरी शादी हुई तब हमारे घर में अक़्सर निमंत्रण पत्र आते थे, जिसमें बाहर लिफ़ाफ़े पर लिखा होता था: मिस्टर चक्रवर्ती एंड फ़ैमिली और हर बार मेरे मन में यह सवाल उठता था कि "एंड फ़ैमिली"का मतलब क्या है? मेरी जगह कोई भी लड़की होती तो यह सवाल मन में ज़रूर उठता कि निमंत्रण तो परिवार के नाम है, इसमें मेरा नाम कहाँ है?

मैं अपने घर में सुखी थी। मेरे पति मेरी हर भावना का सम्मान करते थे फिर भी मैंने घर-परिवार की सारी ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए, अपनी पहचान बनाने की कोशिश की और कई क्षेत्रों में काम किया।

देवी नागरानी: 

सोनाली जी आपकी विचारधारा जानकर अच्छा लगा। अपने नाम निमंत्रण पत्र के होने और न होने की संभावना का निष्कर्ष आपने किस तरह निकाला? 

यह मुद्दा जो उठाया है वो रोचकता बाँध रहा है। मैं जानती हूँ और मानती भी हूँ कि कुछ परिवर्तन होना चाहिये, पर न होने पर कोई ज़्यादा अंतर नहीं पड़ता है, शायद औरत यह जानती है, मानती भी और स्वीकारती भी है। बावजूद इसके ऐसे और कई उदहारण भी हैं जहाँ स्कूल में बच्चे की एडमिशन के वक़्त पिता के नाम की जगह अब माँ का नाम भी लिखा जा रहा है। कहीं माँ ख़ुद अपने नाम के आगे अपने मायके का उपनाम लगाये हुए चल रही है। यहाँ विदेश में भी शादी के बाद वे पहला नाम चला रही हैं। इस विषय पर आपकी अपनी निजी सोच व् प्रतिक्रिया क्या है? 

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

मेरा यह मानना है कि हमेशा हमें सम्मान माँगने से नहीं मिलेगा हमें ख़ुद की योग्यता साबित करनी होगी। हम सिर्फ़ महिला होने के नाते सम्मान की अधिकारिणी नहीं बन जातीं। मायके का सरनेम लगाने भर से अपनी अलग पहचान बन जाती है, यह कहना भी उचित नहीं। अलग पहचान तो अपने व्यक्तित्व, कार्य, शिक्षा, अनुशासन, प्रतिष्ठा, संस्कृति से बनानी पड़ती है। 

जब मेरी शादी हुई, मैं सिर्फ़ ग्रेजुएट थी (बी.एससी. बायोलॉजी) उसके बाद मैंने M.Sc. की, पी.एचडी. की और घर के सारे कामों की ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए अपनी पढ़ाई पूरी ; जिससे मैं कहीं अपनी बात रख दूँ तो मेरी बात में वज़न रहे और अब, जब मेरे घर में इनविटेशन कार्ड आते हैं तो 10 में से 8 में मेरा नाम रहता है।

इसमें ज़िद करके सम्मान पाना न उचित है, न संभव। मैंने दिन रात एक करते हुए इस इस मुक़ाम को पाने के लिए बहुत मेहनत की है। 

देवी नागरानी: 

अपने कार्यक्रम में भी इस तरह की ज़द्दोजेहद का सामना आपको करना होता होगा? कुछ उस बारे में बताएँ कि आप अपनी साथी महिलाओं को कैसे मोटिवेट करती हैं? 

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

यही ज़द्दोजेहद मैंने मंच के कार्यक्रम को अंजाम देने में की, जहाँ कभी 15 महिलाएँ रहती हैं। कभी 45 महिलाएँ, एक बार तो 80 महिलाएँ थीं। इन सबके शेड्यूल के हिसाब से उनकी अलग-अलग तैयारी करवाकर मंच तक कार्यक्रम पहुँचाने में जो ज़द्दोजेहद करनी पड़ती है। यह मेहनत तो करनी पड़ेगी, जब तक वह रंग नहीं लाती। तब ही तो लोग मुझे मेरे नाम से जानेंगे। मैं अपनी योग्यता नहीं बनाऊँगी, बावजूद इसके फ़क़त हर एक से सम्मान की आशा करूँगी तो यह सामने वाले पर भी अत्याचार होगा। 

देवी नागरानी:

क्या आप कुछ ऐसी परिस्थितियों से गुज़री हैं जिनके एवज़ आपको यह क़दम उठाना पड़ा?

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

मैं ख़ुद तो ऐसे किसी परिस्थिति से नहीं गुज़री। अगर गुज़रती तो शायद किसी के लिए कोई काम नहीं कर पाती लेकिन हाँ, मैंने अपने घर की महिलाओं की, अपनी सहेलियों की, अपने आसपास और समाज की महिलाओं की ऐसी हालत देखी कि वह लोग अपने दिल की बात अपने दिल में ही छुपा कर अपने आँसुओं को पी के चेहरे पर मेकअप लगाकर अपना काम करती रहती हैं। इन महिलाओं को घर से निकाल कर निखारना और इन्हें अपनी पहचान देना मुझे ज़रूरी लगा। इसीलिए मैंने यह क़दम उठाया और इस विषय पर लिखी ‘मुखौटा’ नामक कविता पेश कर रही हूँ। जिससे आपको औरत का वह पहलू भी नज़र आएगा, जो ख़ुद की पहचान पाने की लालसा मन में लिए हुए जीती है। 

मुझे ऐसा लग रहा था कोई भी महिला अपनी निजी ज़िंदगी से ख़ुश नहीं है। वह सिर्फ़ अपने चेहरे पर मुखौटा लगाए हुए हैं। मैं विवाहित महिलाओं के साथ काम करती हूँ। अधिकांश महिलाएँ विवाह पश्चात ख़ुद को निखारना व माँजना बँद कर देती हैं। जैसे विवाह ही जीवन का अंतिम लक्ष्य हो। मुझे लगता है हम सिर्फ़ महिला होने के नाते सम्मान की अधिकारिणी नहीं है बल्कि हमें योग्यता साबित करनी होगी।

'मुखौटा' नामका मेरी कविता अगर आप पढ़ेंगे तो आपको मेरे प्रश्न का जवाब मिलेगा कि मैं महिलाओं को कैसे मोटिवेट करती हूँ:

तो लीजिये उसी कविता के आक्रोश भरे और तेज़ाबी तेवरों को शब्दों की धार पर पढ़ते हुए महसूस करते हैं: 

"मुखौटा

स्त्री
तुम मुखौटे क्यों रँगती रहती हो

तुम निकलती नहीं अपने खोल से
अपने सिले हुए अँधेरे बासी खोल में सरकते हुए मुखौटे रँगती हो

बस क़ैद में रहती हो
ख़ुद के बनाए सलाखों की उन काली कोठियों में सड़ती हो....

थोड़ा सा भी रोशनदान खुला नहीं छोड़ती
जहाँ से होकर ज्ञान की झीनी सी लकीर भी प्रवेश कर पाए”

देवी नागरानी:

आप स्वयं एक नारी हैं, और पढ़ाई करके अपने आत्म-सम्मान को बरक़रार रखते हुए क्या कभी ऐसी किसी परिस्थिति का सामना आपको करना पड़ा जिसके कारण आपको इस मिशन के निर्माण का निर्णय लेना पड़ा? भविष्य में किन सपनों को साकार करने की प्रेरणा आज नारी को मिल रही है? 

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती: 

नहीं, मुझे ऐसी किसी परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन मैंने अपने आसपास ऐसी कई परिस्थितियाँ देखीं। इसीलिए सोचा क्यों न इनके लिए काम किया जाए। जिनको सुविधाएँ हैं वह यदि ज़रूरतमंदों के लिए काम नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी।

जब मैंने महिलाओं की ग्रूमिंग और प्रोग्राम करना शुरू किया तब अधिकांश लोगों ने मुझसे कहा कि इसका कोई फ़्यूचर नहीं है महिलाएँ घर से निकल ही नहीं पाएँगी। तो ऐसी क्लासेस में कैसे आएँगी और शो कैसे करेंगे? आज हम लोग पूरे भारत में शोज़ करते हैं और मैंने सब की बातों को झुठला दिया। आज़ादी उनका जन्म सिद्ध अधिकार है।

देवी नागरानी:

इस प्रेरणादायक कार्य के लिए आपको ऊर्जा देने वाले स्त्रोत भी होंगे, परिवार से या आपके कर्मठ सदस्य दल से? क्योंकि सहयोग भी बल प्रदान करता है। कोई ख़ास यादगार पल जहाँ आपको लगा आप अकेली नहीं हैं?

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

मेरा सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम है मेरा परिवार।

घर में अगर किच-किच होती रहे तो आप बाहर क्रिएटिव काम नहीं कर पाएँगे। घर का सपोर्ट बेहद ज़रूरी है और मैं न केवल ख़ुद के लिए, बल्कि समाज की महिलाओं के लिए काम करती हूँ। उनके लिए नाटक लिखती हूँ, संवाद रिकॉर्ड करती हूँ, म्यूज़िक बनाती हूँ, शोज़ में जाती हूँ, संगीत सिखाती हूँ, संगीत के कार्यक्रम तैयार करती हूँ। कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि हमें जो हाल चाहिए था वह नहीं मिला या स्पॉन्सर में अचानक कुछ प्रॉब्लम आ गई, तो हर ऐसे वक़्त पर मेरे हस्बैंड मेरे साथ खड़े रहते थे और उन्होंने कभी ख़र्चे की चिंता नहीं की। आज तक मेरे हर प्रोग्राम का ख़र्चा उन्होंने किया है। वैसे ही मेरे ग्रुप में कई साथी ऐसे हैं जिनका मुझे हमेशा अच्छा सपोर्ट मिलता है। 

देवी नागरानी:

आप भाग्यशाली हैं जो अनेकता में एकता वाले इस वासुदेव कुटुम्ब परिवार का हिस्सा हैं। अक़्सर सुनते हैं, पढ़ते भी है नारी, नारी की दुश्मन होती है। पर यह तो परम सत्य की परिभाषा है कि नारी भी मनुष्य है। क्या आपके स्वयंसिद्धा परिवार में यह मान्यता पाई जाती है, या जुड़े हुए परिवारों को इस मान्यता की महत्वता को स्वीकारा है। सभी मर्द इस भाव को स्वीकारें ये ज़रूरी नहीं। इस सन्दर्भ में कोई निजी यादगार या तजुर्बा जिसका आप उल्लेख करना चाहेंगी?

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती: 

जी हाँ यह सच है, मैंने ख़ुद को इस अपने पारिवार में ढालते हुए पाया है, मेरी सासू माँ गौरी चक्रवर्ती जो आज 94 साल की हैं, उनका कहना है कि दुनिया को बताओ कि "स्त्रियाँ भी मनुष्य है"। और इस ढंग से वह मुझे सपोर्ट करती हैं। मेरी प्रेक्टिस देखती हैं, साथ में अगर उनकी तबीयत साथ दे तो वह तीन घंटे का कार्यक्रम भी बैठ कर देखती हैं।

मेरी क़िस्मत से मेरा मायका मेरे घर के पास ही है। मेरी माँ हेलन धर ने बचपन से मेरे बेटे की परवरिश में मेरा साथ दिया, जिससे मुझे बेटे को छोड़ कर बाहर निकलने में कभी सोचना नहीं पड़ा और मेरे पति एक मजज़त स्तंभ की तरह मेरे साथ हर वक़्त रहते हैं और कोशिश करते हैं कि मेरा मूड किसी भी वज़ह से प्रोग्राम के दिन ख़राब न हो। ऐसे संवेदनशील पति और परिवार के कारण मैं यह सारे काम कर पाती हूँ।

देवी नागरानी:

‘स्त्रियाँ भी मनुष्य हैं’ यह तो एक मंत्र है, स्लोगन की मानिंद है। पर इस सच्चाई को यदि पुरुष या परिवार स्वीकार न करे तो क्या सच्चाई बदल जाएगी? इस सिलसिले में कोई सुखद या अन्य घटना जो आप हमसे शेयर करना चाहेंगी...

डॉ. सोनाली चक्रवर्ती:

बड़े दुख की बात है कि हम अभी तक यही साबित नहीं कर पाई हैं कि हम भी मनुष्य हैं! हमारे अंदर भी वही संवेदनाएँ हैं, हमारे भी दुख-दर्द बिल्कुल पुरुषों जैसे हैं। गुलाब देखकर हमें अच्छा लगता है, गोबर देखकर बुरा लगता है। हमारी भावनाओं में, सोच में, विचारों में, ज्ञान में, बुद्धि में, कहीं कोई अंतर नहीं है। पर हक़ीक़त की कड़वी सच्चाई यही है कि हमें अब भी साबित करना पड़ता है कि हम भी मनुष्य हैं। हमें न तो देवी बनाया जाए, न दासी के रूप में देखा जाए। हमें सिर्फ़ एक मनुष्य के रूप में देखा जाए। और हाँ हमें कई जगह संघर्षों का सामना करना पड़ा है।

मुझे एक घटना याद आ गई हमारे समूह में 56 साल की एक महिला बड़ी ललक के साथ अभिनय सीखने आती थीं। एक नाटक में जब उन्हें रोल दिया गया वे बड़ी लगन से उसकी तैयारी कर रही थीं।

शो के शुरू होने के ठीक कुछ देर पहले स्टेज के सामने बने गड्ढे (जिस पर ग्रीन कारपेट बिछा दिया गया था) उनकी चप्पल अटकी और वे गिर पड़ीं। उनके कंधे की हड्डी खिसक गई पर उनकी प्रतिबद्धता क़ाबिले तारीफ़ थी कि show must go on की तर्ज़ पर उन्होंने नाटक समाप्त किया और वहाँ से अस्पताल गईं। जब हड्डी बिठवाई और घर आईं तो उनके पति ने अपने व्यंग्य वाणों से उनका हृदय छलनी कर दिया था। वह बार-बार उन से एक ही वाक्य कह रहे थे कि 'तुम कब से नाटक करने लगी', 'तुम्हें कब से अभिनय आ गया', 'तुम क्यों बच्चों के बीच में सिंग तुड़ा के घुसी हुई हो'; ऐसी ही कई दिल जलाने वाली बातें।

अचानक आंटी जी का धैर्य जवाब दे गया, और उन्होंने पानी से भरा गिलास दरवाज़े पर दे मारा और चीख कर कहा कि– "इतने सालों से तुम्हारी गृहस्थी में नाटक ही तो करती आई हूँ। जब अनचाहे तानों के साथ बेटी होने के व्यंग्य बाण झेले मैंने मुस्कुराते हुए अभिनय ही तो किया है। आज मंच पर कर लिया तो क्या हुआ?"

वह दिन था और आज का दिन उनके पति ने उनपर किसी तरह कि तन्ज़ नहीं की है। यह वाक्य हमारे समूह के लिए एक बहुत बड़ा पाथेय बन गया।

मैंने अपनी भावनात्मक बातों को आगे न बढ़ाने की ठानते हुए इस अनमोल धरोहर को समेटते हुए पाया कि यह तो एक सिलसिलेवार सफ़र है, कभी न ख़त्म होने वाला सफ़र. जारी रहेगा तब तक, जब तक देश के हर कोने में, घर के हर कमरे के किसी ख़ाली कोने को भरती हुई ऐसी विचारधारा कल कल कर बह रही होगी। मैं इस बातचीत को यहीं विराम देना चाहूँगी, और साथ में इस प्रतिभादायक कार्यशालाओं के लिए उन्हें हार्दिक बधाई देती हूँ: “मुझे आज़ादी चाहिए” नामक कविता के अंश के साथ जो नारी को मनुष्य बनने के लिए बाध्य करती है।.. 

मुझे आज़ादी चाहिए 
परिवार से नहीं, पुरानी मान्यताओं से
मुझे आज़ादी चाहिए/ रिश्तो से नहीं रूढ़ीवादी परंपराओं से
मुझे आज़ादी चाहिए, घर से नहीं बंधनों से
मुझे अब आज़ादी चाहिए,/अंधविश्वास से
आशिया से/ घिसे पिटे नियमों से/अपमान से
मुझे पंख चाहिएँ/ नई उड़ानों के/परिवार की धुरी हूँ 
सारे रिश्तों को सहेज कर अपनी 
पहचान बनाते हुए अपना अस्तित्व/वर्चस्व रखूँगी
हाँ मैं वह कर दिखाऊँगी..स्वयंसिद्धा…

मैं सोनाली जी के बातों की धार में बहती रही, सुनती रही, सोचती रही। सच तो यह है अपने-अपने हिस्से का योगदान देते हुए आदर सम्मान कमाना पड़ता है। परिवार की, बच्चों की कामयाबी पर अभिमान होता ही है, बावजूद इसके एक आत्मसम्मान की दमक कुछ और होती है जो एक नारी अपने बलबूते पर अपने कार्यों की नींव पर स्थापित करती है। जब तक कोई अपने स्थान से हिलता नहीं, उसे कैसे पता चलेगा कि उसके पाँव में कितनी बेड़ियाँ कसी हुई हैं। बस उनसे मुक्ति पाना ही आत्मसम्मान की पहली सीढ़ी है। इतना सुनने-सुनाने के बाद भी मन में कई सवाल कुलबुला रहे है। अब मेरा नारी मन इन परिस्थियों से निजात पाने के द्वार पर आकर आधी अधूरी सूचना लेकर तो नहीं जी पायेगा। बस तय किया कि फिर किसी दिन आकर उनसे और अनेक समस्याओं के समाधनों के बारे में जानूँगी, जो नारी को अपनी पहचान पाने का अधिकार देते हैं। 

सफ़र का सिलसिला और आगे . . . अंजाम तक . . .

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