प्रदीप श्रीवास्तव की कहानियाँ - समीक्षक चंद्रेश्वर

20-02-2019

प्रदीप श्रीवास्तव की कहानियाँ - समीक्षक चंद्रेश्वर

प्रदीप श्रीवास्तव

प्रदीप श्रीवास्तव बुनियादी तौर पर शहरी निम्न मध्यवर्गीय ज़िंदगी के कहानीकार हैं। उनकी ज़्यादातर कहानियों में एक ऐसा शहरी समाज उपस्थित दिखाई देता है जो नकारात्मक स्थितियों से जाने या अनजाने संचालित है। दरअसल भूमंडलीकरण ने पिछले दो-ढाई दशकों के दरम्यान जिस तरह से हिन्दुस्तानी समय और समाज को अपनी गिरफ़्त में लिया है; उसके अब बुरे नतीजे सामने हैं।

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने विकास के नाम पर जिस भौतिकता की आँधी को पैदा किया है उस आँधी ने परंपरागत हिन्दुस्तानी समाज के स्थिर मान-मूल्यों को बुरी तरह से तहस-नहस करने का ही काम किया है। इस आँधी ने यूँ तो हर वर्ग, वर्ण और जाति को अपने घेरे में लिया है; पर सबसे ज़्यादा शहरी निम्न मध्यवर्ग या मध्यवर्ग प्रभावित हुआ है। इसने पारिवारिक रिश्ते और उन रिश्तों में सदियों से पड़े नैतिकता के मज़बूत धागे को खंड-खंड करने का काम किया है। भले ही इससे बाहरी चमक-दमक बढ़ी हो; पर हमारा समाज अपनी गहरी जड़ों से विच्छिन हुआ है। एक तरह से कहा जाय तो खोखलापन बढ़ा है और उसके अंदर अँधेरा भर गया है। इन चीज़ों के पीछे हर व्यक्ति में ग़लत तरीक़े से पैसा कमाने या सुविधा हासिल करने की होड़ भी है।

प्रदीप श्रीवास्तव की कहानियों में शहरी निम्नमध्य या मध्यवर्गीय एकल परिवारों में बढ़ती स्वच्छंदता या अराजकता और स्त्री-पुरुष के बीच तेज़ी से विकसित हुए नाज़ायज रिश्तों को प्रमुखता के साथ चित्रित करने का प्रयास किया गया है। उनकी ज़्यादातर कहानियों में इसे एक मुख्य प्रवृत्ति के रूप में चिह्नित या रेखांकित किया जा सकता है। उनकी कहानियाँ पारंपरिक दाम्पत्य के नैतिक आधार को ढहते हुए दिखाती हैं। वे भविष्य के समाज के संकट को भी दर्शाती हैं। ये सहसा आया बदलाव नहीं है कि उनकी कई कहानियों के केंद्र में उच्च तकनीकी और मोबाइल/ इंटरनेट की महती भूमिकाएँ हैं। स्त्री-पुरुष, युवा-युवतियों के लिए अगर ये ज़रूरी माध्यम हैं तो इन माध्यमों ने उन्हें एक बड़े दलदली इलाक़े में भी धँसते जाने के लिए छोड़ दिया है। इसने हमारे पारंपरिक नैतिक बोध और विवेक को भी अपहृत करने का काम किया है। इस लिहाज़ से उनकी कुछ लंबी कहानियाँ "मैं, मैसेज और तज़ीन", "भुंइधर का मोबाइल", "किसी ने नहीं सुना", "भगवान की भूल", "मम्मी पढ़ रही है" और "नुरीन" आदि पढ़ी जा सकती हैं।

प्रदीप श्रीवास्तव की कहानियों में बूढ़े उपेक्षित दिखते हैं। युवा स्त्रियाँ आसानी से बिना किसी दुविधा के पराये पुरुषों के आगे समर्पण कर देती हैं। इसे लेकर उनके अंदर पाप-बोध या अपराध-बोध न के बराबर ही दृष्टिगोचर होता है। ये भूमंडलीकरण के बाद की शहरी युवा स्त्रियाँ हैं, जो अपने पतियों को आसानी से धोखा देती हैं। उनके यहाँ ऐसी स्त्रियाँ नहीं दिखाई देती हैं जो अपनी देह को लेकर सचेत हों।

प्रदीप श्रीवास्तव असल में एक संक्रमण कालीन हिन्दुस्तानी शहरी समाज के भीतर तेज़ी से विकसित हो रही कुप्रवृत्तियों को सामने लाने वाले कहानीकार हैं। उन्होंने भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और नवउदारवाद के दौर में आवारा पूँजी के पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों को बेबाक़ी से अपनी कहानियों में चित्रित करने का काम किया है।

प्रदीप श्रीवास्तव के पास कहानी लिखने का अद्भुत हुनर है। उनके पास क़िस्सागोई है और है एक सरल-सहज, दिलचस्प संप्रेष्य भाषा। मुझे उम्मीद है कि उनकी लंबी कहानियाँ अपने पाठकों को पढ़ने के लिए आकर्षित करेंगी।

चंद्रेश्वर (कवि/आलोचक)
मो. न. 9236183787, 9519442761 

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