01-07-2019

नक्सली राजा का बाजा -5

प्रदीप श्रीवास्तव

नेताजी की बातें सुनकर लेखक सोचने लगे कि कहीं गाड़ी फिर ना पटरी से उतर जाए इसलिए तुरंत ही बोले- "आप निश्चिंत रहिए। मैं आपके संशय की सारी पर्तें तुरंत हटाता हूँ। देखिए मेरा उद्देश्य वास्तव में संपूर्ण नक्सल जगत का उद्देश्य है। स्वर्गीय कानू सान्याल, चारू मजूमदार का सपना है। देश में जन सामान्य, मज़दूरों की सरकार का सपना है। जो वर्तमान लोकशाही को समाप्त करके ही पूरा होगा। इस लोकशाही को उखाड़ने के लिए ऐसे ही जातिवादी, धार्मिक, क्षेत्रवादी, भाषावादी, अलगाववादी आंदोलनों की ही ज़रूरत है। ऐसे अंदोलन इस लोकशाही की जड़ों को खोखला कर देंगे। इतना कि एक दिन लोकशाही की दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का भवन अपने आप धराशायी हो जाएगा। और तब इस विशाल हिंदुस्तान में जन सामान्य की, मज़दूरों की, ग़रीबों की सरकार होगी। जो इनके लिए सच में काम करेगी। उनकी ज़मीनें भीमकाय उद्योगों के लिए ज़बरिया छीनी नहीं जाएँगी।

"जिन क्षेत्रों में हज़ारों-हज़ार वर्षों से जन-जातियों के लोग रहते आए हैं, उनसे उनका क्षेत्र छीना नहीं जाएगा। उसके मालिक वही रहेंगे। उसके नीति-नियंता वही रहेंगे। ना कि दिल्ली के सिंहासन पर बैठा तथाकथित जनसेवक। जो जनसेवक के नाम पर धब्बा होते हैं। कहलाएँगे जनसेवक, लेकिन जनता की कमाई से प्रचंड तानाशाहों की तरह रहते हैं। करोड़ों की सैकड़ों गाड़ियों के काफ़िले में निकलते हैं। जनता के पैसों पर आलीशान ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जिएँगे और तुर्रा यह कि हम तो जनसेवक हैं।

"अरे आप कैसे जनसेवक हैं भाई कि जनता आपकी छाया भी नहीं छू पाती। जब आपके निकलने का कार्यक्रम बनता है तो सड़कें खाली करा ली जाती हैं। मकानों पर सुरक्षा के नाम पर सुरक्षाकर्मियों का कब्ज़ा हो जाता है। आप का उड़न खटोला उतरेगा तो ग़रीबों की खून-पसीने से सींची खड़ी फ़सल तबाह कर दी जाती है। यही है लोकाशाही है? ये लोकशाही नहीं है, जन की सरकार नहीं है। लोग जिन्हें चुनते हैं वही चुने जाने के बाद सामंत बन बैठते हैं। 

"देखते-देखते करोड़पति, अरबपति, खरबपति बन जाते हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सबके सब सोने के अभेद्य क़िलों में पहुँच जाते हैं। और जनता उन्हें पाँच साल तक ठगी सी देखती रहती है। वह भी रूबरू नहीं बस मीडिया में। वास्तव में राजशाही, तानाशाही का नया रूप है आज की लोकशाही। आज दुनिया में लोकशाही लोकतंत्र के नाम पर आम जनता का ख़ून चूस रही है। यह भी तानाशाहों जितने ही अत्याचारी शोषक हैं। हमारा संघर्ष इन बहुरूपिये सामंतों, पूँजीपतियों से आमजन, ग़रीब, जनजातीय लोगों की मुक्ति का है। ज़मीन के मालिक जो आज ये पूँजीपति बन बैठे हैं, इनसे ज़मीनें मुक्त करानी है। इसे असली मालिकों को वापस दिलाना है। जो वास्तव में इन ज़मीनों के हक़दार हैं। हमारा एकमात्र उद्देश्य ग़रीबों को उनका हक़ दिलाना है। हम नक्सली किसी के दुश्मन नहीं हैं। बस अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं।"

लेखक अपनी बातों को कहते-कहते काफ़ी उग्र हो चुके थे और नेताजी उन्हें कुरेद-कुरेद कर उनसे एक-एक सच जानने में लगे हुए थे। वह अंदर-अंदर भयभीत भी थे कि वह एक हार्डकोर शहरी पढ़े-लिखे प्रोफ़ेसर नक्सली के सामने बैठे हैं। उनके दिमाग़ में चार-पाँच नक्सलियों की गिरफ़्तारी घूम रही थी, जो कुछ दिन पहले ही गिरफ़्तार हुए थे। उनमें भी प्रोफ़ेसर, वकील, लेखक, पत्रकार थे। तो क्या अब यह नक्सली सुदूर जंगलों, गाँवों से निकलकर शहरों की ओर रुख कर चुके हैं? शहरों में अपनी जड़ें गहरे पैठा चुके हैं? अपने मन में उठते तमाम प्रश्नों के साथ उन्होंने लेखक को फिर कुरेदा, उनसे पूछा, "आप यह बताइए कि आप चारू मजूमदार, कानू सान्याल के सपनों की बात करते हैं, लेकिन जहाँ तक मुझे याद पड़ता है कि कानू सान्याल ने जीवन के अंतिम समय में दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "नक्सल आंदोलन अपनी राह से भटक गया है। नक्सल आंदोलन में ऐसी हिंसा को स्थान नहीं दिया गया था, जैसी आजकल नक्सली कर रहे हैं।" यह बात सही भी है। आप लोग जिहादी आतंकियों से भी पहले से पकड़े गए निरीह मासूम लोगों के हाथ-पैर काटते आ रहे हैं। सिर क़लम कर देते हैं। सुरक्षाकर्मियों की लाशों को चीरकर बम भरकर भेज देते हैं। यह सब निरंतर जारी है। ये सब मरने वाले कोई अमीर नहीं ग़रीब ही होते हैं। ऐसे ग़रीब जिनके पास दो जून की रोटी भी नहीं होती। वो जब आपका साथ नहीं देते तो आप क़त्ल कर देते हैं। टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। ये कैसा न्याय है? ये ग़रीबों का कौन सा हित कर रहे हैं आप लोग। अमीरों से तो आप लोग सिर्फ़ पैसा लेते हैं। शायद ही कोई अरबपति, खरबपति हो जिसे आप लोगों ने मारा हो। एक से एक नक्सली पकड़े गए जो ख़ुद अरबपति हैं। ऐशो आराम से रहते हैं। कहाँ से आता है इनके पास इतना अकूत धन। चारू मजूमदार, कानू सान्याल का सपना कहाँ है?"

लेखक को शायद अपने उग्र होने की ग़लती का एहसास हो चुका था, इसलिए जल्दी से उसने अपने को शांत कर लिया। और नेता जी के प्रश्न का बड़ी शांति से जवाब दिया। कहा- "देखिए हम सिर्फ़ यह जानते हैं कि उनका सपना क्या था? रही बात रास्ते की तो जब पहला रास्ता मंज़िल तक पहुँचता ना दिखे तो हमें तुरंत नया रास्ता ढूँढ़ कर उस पर चल देना चाहिए। हमें सिर्फ़ मंजिल दिखाई देती है, रास्ता कैसा है? यह सोचने का हमारे पास समय नहीं होता। ना ही हम ऐसा सोचना चाहते हैं।"

"लेकिन रास्ता भटक कर तो कभी मंज़िल तक पहुँचा नहीं जा सकता।"

"मैंने कहा ना कि हम रास्ता भटके नहीं हैं, हमने रास्ता बदला है बस। भटकना और बदलना दोनों ही दो चीज़ें हैं। भटकते वो हैं जो जाना कहीं होता है अनजाने में चले कहीं और जाते हैं। बदलना वह है जो हर चीज़ को जान-समझकर सही का चयन कर के आगे बढ़ जाए।" 

"मगर मैं तो यह समझ रहा हूँ कि नक्सल आंदोलन धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रहा है। सिकुड़ता हुआ समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। सरकार तमाम नक्सल प्रभावित ज़िलों को, क्षेत्रों को नक्सल मुक्त क्षेत्र घोषित करती जा रही है। फिर यह जो आप कानू, चारू के सपने की बात कर रहे हैं इसके पूरा होने की बात कहाँ रह जाती है।"

लेखक नेताजी की इस बात पर बड़ी रहस्यमयी हँसी हँस कर बोले- "भ्रम! सरकार, मीडिया दोनों ही बड़े भ्रम में हैं। गफ़लत में हैं। कहीं कुछ ऐसा नहीं है। जिस एरिया को वह नक्सल मुक्त बता रहे हैं, वास्तव में हम वहाँ अपना काम कर चुके हैं। हम अपनी जड़ों को वहाँ बहुत गहराई तक पहुँचा चुके हैं। जैसे गर्मियों में तेज़ धूप होने पर आपको लगता है कि दूब घास सूख गई है, ख़त्म हो गई है। लेकिन बारिश की एक फुहार पड़़ते ही वह पहले से भी कहीं ज़्यादा बड़े क्षेत्र में हरी-भरी होकर एकदम से प्रकट हो जाती है। 

"ठीक वही स्थिति हमारी है। आप की सरकार हम से मुक्ति मानकर अपनी पीठ थपथपा रही है, ख़ुश हो रही है। जबकि वास्तविकता इसके उलट है। आप आवश्यकता पड़ने पर उन क्षेत्रों से भी और बड़े क्षेत्रों में हर तरफ़ हमें पाएँगे।" 

"जब इतना सफल हो चुके हैं आप लोग, इतना फैल चुके हैं, तो क्यों नहीं अपनी जनसामान्य की सरकार बना लेते। आख़िर अब किस बात की देर है, सपना पूरा कीजिए अपने महान कानू सान्याल का और चारू मजूमदार का।"

"आप भी कैसी बातें कर रहे हैं। हमारा सपना कुछ क्षेत्रों में अपनी सरकार बनाना नहीं है। हमें पूरे भारत में अपनी सरकार बनानी है। हम पूरे भारत से पूँजीपतियों की सरकार हमेशा के लिए उखाड़ फेंकेंगे। पूरे भारत से सफ़ेद वर्दीधारी नेताओं को ही नहीं, लोकशाही की विचारधारा का ही नामोनिशान मिटाना है। यह तभी हो सकता है जब दूरदराज के सुदूर गाँव, क़स्बा छोटे शहर ही नहीं मेट्रोपॉलिटन शहर की छोटी सी छोटी गलियों तक में हम अपनी जड़ें गहरे पहुँचाएँगे। जिससे वह नीचे तक इस तथाकथित लोकशाही की जड़ों को दीमक की तरह चाट डालें। जिस दिन हमें लगेगा कि हम दूब की तरह फैल चुके हैं भीतर-ही-भीतर पूरे देश में। इस लोकशाही की जड़ों को पूरी तरह चाल दिया है। उस दिन एक फुहार से ही पूरे देश में एकदम प्रकट होंगे और देखते-देखते खोखली जड़ों पर खड़े लोकशाही की इमारत को धराशाही कर देंगे। जो ग़रीबों के ख़ून से सने गारे से बनी है।"

ग़ौर सुन रहे नेताजी ने बीच में ही टोकते हुए कहा- "मैं इस समय इस बहस में क़तई नहीं पड़ूँगा कि नक्सली अपनी दुकान चलाए रखने के लिए यह सब खेल कर रहे हैं। ग़रीब, आदिवासी सभी की यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। स्थिति पूँजीवाद से ही बदलेगी। विकास बिना पूँजी के होता नहीं, चीन भी इसी राह चल रहा है। मगर नक्सली भ्रम फैलाए हुए हैं? मैं इतना ही कहूँगा कि जब क्रांति करेंगे तो क्या यहाँ की सेना, सारी सिक्योरिटी फ़ोर्सेज वह कहाँ चली जाएँगी? आप लोग लोकशाही के महल को गिराएँगे और लोकाशाही की इतनी बड़ी ताक़त, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना चुपचाप देखती रहेगी। जिसके सामने आपका आक़ा, आपका आयडल, आपका पालनहार चीन भी एक तरह से देखा जाए तो डोकलाम में बंदरघुड़की दिखाकर शांत हो गया। शांति की बात कर रहा है।"

नेताजी की बात पूरी भी ना हो पाई थी कि लेखक कुटिल हँसी हँसते हुए बीच में ही बोले- "लगता है आप मेरी बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं। आप का मन कहीं और लगा हुआ है। बातों को समझ रहे होते तो यह प्रश्न करने को छोड़िए आप के मन में यह पैदा भी नहीं होता। ख़ैर प्रश्न किया है तो उत्तर भी सुन लीजिए। यह बताइए मैं "क्या हूँ?", "कौन हूँ?"

इस प्रश्न से नेताजी अजीब सी उलझन में पड़ गए। लेखक का असली परिचय मिलने के बाद उसको लेकर एक अजीब भय उनके मन के किसी कोने में बैठ चुका था। वह लेखक के नए प्रश्न से कुछ विचलित भी हो रहे थे कि "अब यह क्यों पूछ रहा है कि "मैं कौन हूँ?" इसके बारे में जो नहीं जानता था वह भी इसने बता दिया कि यह एक हार्डकोर नक्सली है। फिर यह प्रश्न मुझसे क्यों कर रहा है? आख़िर मुझसे यह क्या कहलाना चाहता है। इसको तो अब बड़ा सोच-समझ कर जवाब देना होगा।" उनको चुप देखकर लेखक ने पूछा - "आप कहाँ खो गए, जवाब नहीं दे रहे हैं कि मैं कौन हूँ?" 

"आप क्या जानना चाह रहे हैं मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। आप एक लेखक हैं। एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं, विभागाध्यक्ष हैं। यह मैं बरसों से जानता हूँ। समझता हूँ। जो नहीं जानता था कि आप एक नक्सली हैं, आप का सपना चारू, कानू के सपनों को पूरा करना है। वह भी आप से जान चुका हूँ। इसके बाद भी यह प्रश्न कि आप कौन हैं यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ तो उत्तर क्या दूँ?" 

"चलिए ठीक है, मैं ही अपने प्रश्न का उत्तर भी देता हूँ कि मैं कौन हूँ? यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हूँ, विभागाध्यक्ष हूँ। बेहिचक यह भी कहता हूँ कि एक नामचीन लेखक भी हूँ जिसकी एक दो नहीं डेढ़ दर्जन किताबें हैं। वह लेखक जिसके साहित्य पर दर्जन भर छात्र पीएच.डी. कर चुके हैं। कई प्रोफ़ेसर बन कर पढ़ा रहे हैं। आगे जो बताने वाला हूँ वह सब आप आसानी से ज़्यादा बात किए बिना समझ जाएँ इसलिए यह सब कह रहा हूँ, कि आलोचक मेरे साहित्य को उग्र वामपंथी सोच का प्रतीक कहते हैं। कुछ ज़्यादा ही घुटे हुए जो आलोचक हैं वह तो दबे स्वर में ही सही मुझे नक्सली विचारों का पोषक, प्रचारक कहते हैं। उनकी तीक्ष्ण नज़रों से मेरा वास्तविक चेहरा मुश्किल से बच पाता है। 

"उनकी संदेह की नज़र मुझ पर बनी ही रहती है। और स्पष्ट करूँ तो सीधे से यह कि नक्सल एक विचार के रूप में पूरे देश में, हर क्षेत्र में फैल रहा है। शिक्षण संस्थाओं, न्यायपालिका, सिक्योरिटीज़ फ़ोर्सेज़, सेना, मेडिकल क्षेत्र, और प्रशासनिक क्षेत्र में भी। जिस दिन हर क्षेत्र में यह पर्याप्त रूप से फैल जाएगा उस दिन एक साथ क्रांति होगी। जिन सिक्योरिटी फ़ोर्सेज़, सेना, पुलिस की ताक़त पर आप या आप जैसे लोग नक्सल आंदोलन को कुचलने का भरोसा किए बैठे हैं, जिनकी ताक़त पर आप अपने दंभ में हैं वही ताक़त आप की नहीं, परिवर्तित होकर नक्सली ताक़त बन चुकी होगी। और यह निरंतर हो रहा है। 

"यहाँ तक कि आपकी पार्टी में भी हमारे विचारों के ढेरों समर्थक हैं। आप फिर कोई संशय प्रकट करें इसके पहले ही प्रमाण दिए देता हूँ कि आपकी पार्टी के ही एक बड़े क़द्दावर नेता ने बीते दिनों ही कहा है कि नक्सली क्रांति कर रहे हैं। उसने हमारे विचारों का पूरा समर्थन किया है। वह अभिनेता से नेता बना, नाचने गाने वाला आपके आला कमान का चहेता भी है। उसका पूरा परिवार ही नचनियाँ-गवनियाँ है। तो जब नचनिए गवनिए, आपकी फ़िल्म इंडस्ट्री वाले हमारे विचारों के समर्थन में हैं तो बाक़ी आगे की आप समझ सकते हैं। यह और आगे बढ़ेगा।

"फिर दुनिया में महान रूसी क्रांति के बाद एक और उससे भी बड़ी महान क्रांति होगी। देश जनसामान्य के शासन तले आगे बढ़ेगा। लोकशाही का ठीक उसी तरह नामोनिशान नहीं रहेगा जिस तरह पूर्व सोवियत संघ में ज़ारशाही का नामोनिशान नहीं रहा। मुझे लगता है कि अब और ज़्यादा समझाने की आवश्यकता नहीं है कि लोकशाही को नेस्तनाबूद कर जनसामान्य की सरकार कैसे बनेगी?" 

"नहीं, समझाने की तो नहीं लेकिन संशय की आख़िरी पर्त रह गई है। आपको उस पर्त को भी हटाना है"

नेताजी की बात सुनकर लेखक कुछ खीझते हुए अंदाज़ में बोले- "इतना कुछ बताने के बाद भी संशय की एक पर्त रह गई है, आश्चर्य है! बताइए वह आख़िरी संशय की पर्त क्या है? ख़ुशी इस बात की है कि आपके संशय की यह आख़िरी पर्त है।" 

लेखक की खीज को नेताजी ने भाँप लिया था। वह नक्सली के सामने हैं इस भय के प्रभाव से वह क़रीब-क़रीब बाहर निकल चुके थे। अतः बेबाकी से बोले- "मैं आपकी सारी बातों से सहमत हूँ, बस एक संशय यह कि आप एक तरफ़ अपनी पहचान दुनिया से छुपाने के लिए सारे जतन करते हैं, फिर अचानक ही आपने सारे सच मेरे सामने क्यों रख दिए। किसी और को भी तो आगे करके आंदोलन करवा सकते हैं। अपना उद्देश्य पूरा कर सकते हैं। मुझसे ही क्यों? मुझ में ही ऐसी कौन सी योग्यता देखी आपने कि सारे राज़ बता दिए।" 

"क्योंकि मैंने देखा कि आप प्रतिद्वंद्विता में इस क़दर धँसे हुए हैं कि भोजू की हत्या के लिए भी जी-तोड़ कोशिश में लगे हैं। आप में जैसा जुनून है मुझे अपने काम के लिए वही चाहिए था। आप में मिला तो आपसे बातें कीं। यानी सुपात्र से। बस इतनी सी बात है।"

लेखक के मुँह से भोजू की हत्या के प्रयास की बात सुनकर नेताजी हक्का-बक्का हो गए। लेकिन पूरी ताक़त से अपने को सामान्य बनाए रहे। अनजान बनते हुए कहा- "आप यह नई बात भोजू की हत्या के प्रयास की क्या कर रहे हैं? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।"

"मुझे सब मालूम है। अनजान ना बनिए। सतवीर ड्राइवर को भोजू को ट्रक से मारने के लिए कितने पैसे दिए यह भी।"

इतना कहते हुए लेखक ने अपने मोबाइल को ऑन कर सतवीर और नेताजी की बातचीत की रिकॅार्डिंग सुना दी। सारी बातें एकदम साफ़-साफ़ रिकॉर्ड थीं। नेताजी एक बार फिर पसीने से तर हो रहे थे। उनकी हालत का अंदाज़ा करके लेखक ने उन्हें फिर पानी पिलाया। समझाने के लिए उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा- "कोई बड़ा काम ऐसे परेशान होने से नहीं होता, पूरे जोश, होश, हिम्मत के साथ आगे बढ़ने से होता है। मेरी बात मानिए जैसा कह रहा हूँ वैसा करिए, अपना आंदोलन खड़ा करिए। अपना सपना पूरा करिए। भोजू को नहीं उसके क़द को ख़त्म करिए।" 

लेखक की बातों से नेताजी बहुत साफ़-साफ़ समझ गए कि वह उसके चंगुल में ऐसा फँस चुके हैं कि वहाँ से उनका निकलना संभव नहीं है। उसे कोसते हुए सोचने लगे कि "बुलाया था इसे किस लिए और हो क्या गया है? यह न जाने कब से मेरा पीछा कर रहा है? न जाने क्या-क्या जानता है? नहीं सुनता हूँ तो जिस टोन में यह बोल रहा है उसमें साफ़-साफ़ धमकी है कि भोजूवीर की हत्या के प्रयास में यह अंदर करा देगा। यह बात जानकर भोजूवीर भी मेरी जान का जानी दुश्मन बन जाएगा। ये साला लेखक तो जेल में भी मेरी हत्या करा देगा। मेरे बाद क्या होगा मेरे परिवार का? इधर कुआँ, उधर खाई, किधर क़दम बढ़ाऊँ?"
 
उनको चुप देखकर लेखक ने फिर टोका। "आजकल इतना सोचने नहीं तुरंत एक्शन लेने का दौर है। भोजू की तरह। सोचने-विचारने में समय लगाना आप जैसे नेताओं के लिए ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।" 

"मैंने डिसाइड कर लिया है कि मुझे क्या करना है। लेकिन मेरी समझ में अभी भी नहीं आ रहा है कि मेरे इस एक आंदोलन से आप की महान क्रांति जैसे असंभव से सपने को पूरा करने में क्या मदद मिलेगी।"

लेखक ने बड़ी मुश्किल से अपनी खीज पर नियंत्रण करते हुए कहा- "देखिए मैं बार-बार कह रहा हूँ कि एक अकेले आपके ही आंदोलन से नहीं बल्कि ऐसे तमाम आंदोलन देशभर में होंगे और यह सारी बातें मिलकर ही चुनाव के क़रीब आने तक ऐसा माहौल बिगाड़ेंगे कि जिस एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है वह भी पिछड़ जाएगी। अस्थिर मज़बूर सरकार अस्थिरता पैदा करेगी। आप क्या समझते हैं कि यह सब इतना आसान है। हम लोगों द्वारा बहुत कुछ देश भर में किया जा रहा है। बरसों-बरस से बराबर किया जा रहा है। हमारे काम का महत्व कितना है इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिए कि हमें एक नहीं कई देशों से समर्थन, मदद सब मिलती रहती है। कुछ देर पहले आपने ही चीन को हमारा पालनहार कहा ही है। आप क्या समझते हैं यह जो मॉब लिंचिंग होती है, किसानों के उपद्रव होते हैं, चुनाव आते ही बढ़ जाते हैं, क्या यह सब अपने आप ही हो जाता है?

"अपनी रोज़ी-रोटी के लिए मर रही भीड़ के पास इतना समय कहाँ है? यह सब हम ही कराते हैं। हमारे प्रयासों से होता है। दस में से एक घटना ही भीड़ की होती है बाक़ी भाड़े के गुंडों से कराई जाती है। कभी दलितों की पिटाई, हत्या। कभी किसी को मंदिर में जाने से रोकना, कभी कुँए का झगड़ा, कभी शादी का लफड़ा। कभी यूनिवर्सिटी में देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे, आए दिन पाकिस्तान ज़िंदाबाद, पाकिस्तान के झंडे फहराना ऐसी नब्बे परसेंट घटनाएँ हमारे प्रयासों का ही परिणाम होती हैं। कभी आप लोगों के दिमाग़ में यह बात क्यों नहीं आती कि ऐसी घटनाएँ चुनाव के क़रीब आते ही क्यों हर तरफ़ होने लगती हैं?

"यह बातें मैं सिर्फ़ इसलिए बता रहा हूँ जिससे आप हमारी ताक़त, हमारे विस्तार का सटीक अनुमान लगा सकें। अपना कंफ्यूज़न तुरंत दूर कर सकें। बताई इसलिए भी क्योंकि अब आप हमारे आदमी हैं। हमारे सदस्य बन चुके हैं। अपनों से कुछ क्या छुपाना, और क्या डिसाइड करना। इसी मंगल से आप का आंदोलन शुरू हो रहा है। यहाँ एक बड़े मंदिर में भीड़ में धक्का-मुक्की होगी, भगदड़ मचेगी। कुछ भक्त बेचारे मर जाएँगे। आप सिंपैथी में तुरंत वहाँ पहुँचेंगे, प्रशासन, मंदिर की व्यवस्था को एकदम दोषी ठहराएँगे। कहेंगे सरकार मंदिर का अधिग्रहण तो कर लेती है, लेकिन कोई व्यवस्था नहीं करती। जिस कारण आए दिन ऐसी घटनाओं में मासूम भक्त जान गँवाते हैं। इसलिए सरकार भारत के सभी मंदिरों से अपना शिकंजा हटाए। 

"व्यवस्थापक अपनी व्यवस्था ख़ुद कर लेंगे। वैसे भी यह भेदभावपूर्ण है। संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है। यह सारी बातें मंगलवार को आप मीडिया के सामने चीख-चीखकर कहेंगे। रही बात मीडिया की कि आप के पास क्यों आएगी? क्योंकि आपके साथ कम से कम दो ढाई सौ लोग होंगे। आप प्रशासन, लोगों की मदद कर रहे होंगे। दूसरे हम ख़ुद मीडिया को इतना मैनेज करेंगे कि आप का व्यू लेने सब पहुँचेंगे। इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया दोनों ही। आप भी पार्टी लाइन के अगेंस्ट बोलकर, अगले दिन से बड़ा आंदोलन प्रारंभ करने की घोषणा करके भोजू की तरह छा जाएँगे।

"आपकी सफलता और सुरक्षा भी इस बात पर निर्भर है कि हमारे आपके बीच हुई यह वार्तालाप कितनी गुप्त बनी रहेगी। मेरी तरफ़ से निश्चिंत रहें। मैं जो कहता हूँ उस पर अंतिम साँस तक अडिग रहने का संकल्प रखता हूँ। आप भी रखिए। आख़िर आप एक बड़े व्यवसायी हैं। भरे-पूरे परिवार के स्वामी हैं।" 

लेखक यह कहते हुए उठे और नेता जी से हाथ मिला कर चले गए। उनकी आख़िरी बातों में साफ़-साफ़ धमकी सुनकर नेताजी बड़े गहरे सहम गए।

उन्हें लेखक की आँखों में भयानक ग़ुस्सा, खून सब कुछ दिख रहा था। वह उसके जाने के बाद भी जहाँ के तहाँ बुत बने बैठे रहे। मंगल को मंदिर में भगदड़ में भक्तों के इधर-उधर पड़े शव, चीख-पुकार, खून, दबे-कुचले बच्चे, सब दृश्य उनकी आँखों के सामने घूम रहे थे। और ख़ुद को वह इस भगदड़ के बाद अफरा-तफरी में इधर-उधर भटकते देख रहे थे। कुछ सँभलने के बाद उन्होंने सोचा कि "जो भी हो यह भगदड़ रुकनी चाहिए। हे भगवान यह राजनीति...।" 

नेता जी इतना ज़ोर से चीखे कि पत्नी दौड़ी भागी उनके पास पहुँच गई। मगर नेता जी की हालत उनकी कुछ समझ में नहीं आ रही थी। पूछने पर भी वह कुछ नहीं बोल रहे थे। स्तब्ध से सामने दीवार पर देखे जा रहे थे। मन में एक वाक्य दोहराए जा रहे थे कि "जैसे भी हो लोगों की मौत रुकनी चाहिए। लेकिन कैसे? इस लेखक, नहीं-नहीं नक्सली राजा ने यह ख़ुलासा तो किया ही नहीं कि भगदड़ किस मंदिर में होगी। हे भगवान मैं किस बवाल में पड़ गया। इस भोजू साले के कारण मैं कहाँ से कहाँ फँस गया। अब चाहे जो भी हो भोजू से पहले इस नक्सली से निपटूँगा। साला धमकी देकर गया है। मेरे परिवार पर नज़र डाली है। लोकशाही के ख़ात्मे का सपना देख रहा है। घबड़ा नहीं तुझे सपना देखने लायक़ ही नहीं छोड़ूँगा। अपनी राजनीति की बलि देकर भी तुझे समाप्त करना पड़ा तो अब पीछे नहीं हटूँगा चीनी पिल्ले। तूने भले ही ऐसा फँसाया है कि ना निगलते बन रहा है ना उगलते।"

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक चर्चा
बात-चीत
विडियो
ऑडियो