मेरा आख़िरी आशियाना - 5

01-10-2019

मेरा आख़िरी आशियाना - 5

प्रदीप श्रीवास्तव

लड़के तो संपत्ति के लिए ग़लत निकले। अम्मा ने अब भाई-भाभियों के झूठे आरोपों को भी सच मान लिया होगा कि मेरा उस ज्योतिषी के साथ वाक़ई सम्बन्ध रहा होगा। निश्चित ही मेरी बातें सुन कर वह बर्दाश्त नहीं कर सकी होंगी और चली गईं कहीं। पाँच-छह घंटे हो रहे हैं। मैं अब उनको ढूँढ़ूँ भी तो कहाँ? मिल जाने पर क्या मुँह दिखाऊँगी? अम्मा तो सीधे मुँह पर थूक देंगी। मेरी छाया भी नहीं देखना चाहेंगी।

इससे अच्छा है कि मैं मर ही जाऊँ। वैसे भी ज़िंदगी में मेरी बचा क्या है जिसके लिए जियूँ। बेवज़ह घुट-घुट कर जीने से अच्छा है मर जाऊँ। दुनिया की उपेक्षा, नफ़रत को तो मैं सह सकती हूँ, लेकिन अम्मा की नहीं। मेरा मर ही जाना अच्छा है। अम्मा को ढूँढ़ने जाने का भी अब क्या फ़ायदा। उन्होंने...।

मैंने मर जाने का निश्चय किया। समस्या मेरे साथ मेरे साये की तरह रहती है। तो इस समय भी सामने आई कि मरूँ कैसे? घर में कोई ज़हर वग़ैरह तो है नहीं। आखिर फाँसी की सोच कर अम्मा की साड़ी ले आई। मैं रोती भी जा रही थी और फंदा भी बनाती जा रही थी। तभी गेट के बंद होने और किसी के अंदर आने की आहट मिली। कुछ अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं थी। जल्दी-जल्दी आँसू पोंछे। अम्मा की साड़ी जल्दी से पास पड़ी कुर्सी पर डालकर बाहर निकलने को हुई तभी अम्मा सामने आ गईं।

मैं एकदम हक्की-बक्की उन्हें देखती रह गई। आँसू जैसे जहाँ के तहाँ जम गए। आवाज़ हलक में ही फँस कर रह गई। कुछ क्षण पहले तक जहाँ इस संदेह में कि अम्मा ने कुछ कर लिया है, इस दुख में रो रही थी, मरने जा रही थी, अब उन्हें देखकर ख़ुश होने के बजाय मैं इतना डर गई कि मेरी घिग्घी बँध गई। जैसे अचानक ही कोई शेर, चीता सामने आ गया हो।

मैं थर-थर काँपती, स्टेच्यू बनी खड़ी, अपलक उन्हें देखती रह गई। तब अम्मा अचंभित होती हुई बोलीं, "क्या हुआ बिटिया? तुम रो क्यों रही हो? बाहर तक आवाज़ जा रही है। बताओ क्या हुआ?" अम्मा एकदम मेरे पास आ गईं। मेरा हाथ पकड़ कर बेड पर बिठा दिया। ख़ुद बगल में बैठ कर दोनों हाथों से मेरे आँसू पोंछते हुए कहा, "बिटिया ऐसे मत रो। तुम ऐसे रोओगी तो मैं सह नहीं पाऊँगी।"

मैं अजीब असमंजस में पड़ गई कि क्या अम्मा मेरी और खुर्राट की कोई बात नहीं सुन पाई थीं। मैं नाहक़ परेशान हो रही थी। अम्मा पाँच मिनट और ना आतीं तो अब तक मैं फंदे पर लटक रही होती। मेरी रुलाई इतनी तेज़ ना होती तो अम्मा अभी बाहर ही बैठी रहतीं। अम्मा मुझे एकदम बुत बनी देखकर अचानक उठकर किचेन में गईं, एक गिलास पानी लेकर आईं, मुझे अपने हाथ से पानी पिलाकर कर बोलीं, "बिटिया बोल न क्या बात हुई?" उनका गला रुँध  गया था। मैं अचानक ही उनसे चिपट कर बिलख पड़ी।

मेरा सिर उनकी गोद में था। उसी गोद में जिसका साया बचपन में मिलते ही मैं चट-पट सो जाती थी। मैंने रोते-रोते कहा अम्मा मुझे माफ़ करना, मुझसे बड़ी ग़लती हो गई। मुझे बचा लो। अब फिर से ऐसी ग़लती नहीं होगी। अम्मा ने मुझे जगाया नहीं था इसलिए मुझे पूरा यक़ीन हो गया था कि उन्हें सब मालूम है। बस इतनी उम्र-दराज़ अपनी बिटिया को क्या कहें, कैसे कहें, इसी अनिर्णय के कारण बाहर पाँच घंटे से बैठी थीं। अम्मा बड़े प्यार से मेरा सिर कुछ देर तक सहलाती रहीं। फिर बड़े भावुक स्वर में बोलीं, "बिटिया तुम से कोई ग़लती नहीं हुई। इसलिए तू एकदम ना रो। ग़लती तो हमसे हुई, और रोना-पछताना तो हमें चाहिए। तुमसे तो हमें माफ़ी माँगनी चाहिए।"

अम्मा की बात सुनकर मैं दंग रह गई। मैं सिसकते हुए बोली, “अम्मा यह क्या कह रही हो। माफ़ी माँग कर मुझे जीते जी नर्क में क्यों डाल रही हो। न जाने कौन से पाप किए थी जो यह जीवन इस तरह बीत रहा है।” अम्मा ने मेरा सिर दोनों हाथों से ऊपर उठाया। फिर आँसू पोंछते हुए कहा, "तुम अपने दिमाग़ से यह सब निकाल दो कि तुमने कोई पाप किया है।" अम्मा की बातों से मुझे बहुत ताक़त मिली। मैं सारी ताक़त बटोर कर बोली, “अम्मा मैं दस बजे तक सोती रही तुमने आज उठाया क्यों नहीं? पहले तो उठा दिया करती थी।” अम्मा कुछ पल चुप रहने के बाद बोलीं, "कैसे उठाती बिटिया, चार बजे सवेरे तो तुम सोई थी। लेटने के बाद भी तुम्हें बड़ी देर तक करवट बदलते देख रही थी। जब तुम सो गई, सवेरे नहीं उठी अपने आप, तो मैंने सोचा सोने दो। रातभर जागी हो, ऑफ़िस जाकर भी क्या करोगी।"

मैंने झट से पूछा, बल्कि मेरे मुँह से स्वतः ही निकल गया कि अम्मा वो लेने आया तो तुमने क्या...। मैं बात पूरी भी ना कर सकी थी कि अम्मा ने कहा, "वह भी नहीं आया। रात भर वह भी तो जागता रहा है। कैसे उठता?" मैंने पूछा, “तो अम्मा मतलब तुमने हमारी सारी बातें…?” अम्मा बड़ी अधीर होकर बोलीं, "क्या करूँ बिटिया, बुढ़ापा बड़ी ख़राब चीज़ है। नींद आती नहीं। आती भी है तो हल्की सी आवाज़ से ही खुल जाती है। तुम्हारी नानी इस नींद को कुकुर निंदिया कहती थीं। जैसे वह हल्की आहट से ही जाग जाते हैं वैसे ही बुढ़ापे की नींद होती है।

“जब फ़ोन की घंटी बजी, तुम एकदम से मोबाइल लेकर यहाँ से गई, मेरी नींद तभी खुल गई थी। मुझे ज़रा भी अनुमान नहीं था कि उसका फ़ोन होगा। मैंने सोचा बात कर लो, तब पूछूँ कौन है? लेकिन तुम्हारी बात बढ़ती ही गई, तुम्हारी बातों से पता चल गया था कि किसका फ़ोन है। फिर जब तुम्हारी बातें और गहरी होती गईं तो मुझे लगा कि मुझे नहीं सुनना चाहिए। पाप है। फिर मैंने कानों में उँगली दे दी।

“मगर क्या करूँ, कुछ बातें कान में पड़ ही जा रही थीं, शुरू में ग़ुस्सा आया कि तुम यह क्या मूर्खता कर रही हो। अपने से इतने छोटे लड़के से ऐसी बातें। मगर सोचा कि नहीं वह एक इंसान है। और तुम भी एक इंसान हो। जैसे उसकी, दुनिया भर के लोगों की ज़रूरतें हैं, इच्छाएँ हैं, वैसे ही तुम्हारी भी हैं। जितना हक़ सबको है अपनी ज़रूरतें, इच्छाएँ पूरा करने का, उतना ही तुम्हें भी है। उम्र या और किसी भी को बीच में आने का कोई हक़ नहीं है। मुझे भी नहीं। बस यही सोच कर अनसुनी कर लेटी रही मैं।"

मैं उनसे पूछना चाहती थी कि अम्मा तुम्हें बुरा नहीं लगा। लेकिन अम्मा पहले ही बोलीं, "सारा दोष हमारा ही है बिटिया, एक औरत उससे भी पहले एक माँ होकर भी अपनी जवान बिटिया की भावनाएँ, उसकी ज़रूरतों की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाई। देखते-देखते वह प्रौढ़ा बन गई। उसके हिस्से के सारे सुख पीछे छूटते चले गए। लेकिन मैं परिवार, लड़कों से मिली ठोकर से बने अपने घाव ही देखती रही। जब-तक होश आया तब-तक बहुत देर हो चुकी थी। कोई लड़का क़ायदे का मिल ही नहीं रहा था।

“मैं डर रही थी कि फिर से किसी ग़लत आदमी का पाला ना पड़ जाए। शादी के नाम पर हम फिर न ठगे जाएँ। यही सब सोचते-सोचते इतना समय निकल गया। तरह-तरह के रास्ते सोचती हूँ लेकिन सब मन में ही रह जाते हैं। कोई आगे पीछे नहीं। किसको भेजूँ, कहाँ भेजूँ, क्या करूँ। पास-पड़ोस में भी कोई नहीं। एक घर यहाँ तो दूसरा बहुत दूर। घर अकेले छोड़कर निकला भी नहीं जा रहा है। शरीर अलग साथ नहीं दे रहा है। तेरी ज़िंदगी अपनी आँखों के सामने पल-पल बर्बाद होते देखकर अंदर ही अंदर घुटने के सिवा मेरे वश में अब कुछ नहीं रह गया है?"

मैंने देखा अम्मा बहुत ज़्यादा भावुक होती जा रही हैं तो उन्हें समझाते हुए कहा, “अम्मा क्यों इतना परेशान हो रही हो, तुम तो सब जानती हो कि सब को सब कुछ नहीं मिलता। मुझे जो कुछ जितना मिलना था वह मिल गया। और कोई इच्छा बची भी नहीं है। बस ना जाने कैसे उस के चक्कर में आ गई। एक ही जगह काम करते, साथ-साथ आते-जाते पता नहीं कैसे क्या हो गया मुझे। मगर अम्मा मेरा विश्वास करो, मैं अपनी ग़लती सुधार लूँगी। अब कभी उसके साथ नहीं आऊँगी, नहीं जाऊँगी। ऑफ़िस में भी काम के सिवा एक शब्द ना बोलूँगी। आज ही उसको साफ़ मना कर दूँगी। होता है ग़ुस्सा तो होता रहे। मेरी नौकरी नहीं ले सकता। बहुत होगा तो परेशान करेगा। लेकिन कितना करेगा? ख़ुद ही थक जाएगा। अब तो इन सब की आदत पड़ गई है।”

मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह बोलीं, "नहीं, अब तुम उसे मना नहीं करोगी। मैं तुम्हारे चेहरे पर ख़ुशी देखना चाहती हूँ बिटिया। मेरी बूढ़ी आँखें, मेरा अनुभव यह कहता है कि जो भी हो तुम उसके साथ ख़ुश रहोगी। वह भी ख़ुश रहेगा। इसके अलावा तुम दोनों को और क्या चाहिए? और तुम ख़ुश रहो मुझे इसके अलावा और कुछ चाहिए, तो सिर्फ़ इतना कि अपने जीते जी तुम्हारे लड़के-बच्चे देख लूँ बस। इच्छाओं का क्या करें बेटा, बुढ़ापे में चाहत भी बहुत बढ़ जाती है।"

अम्मा ने बिना रुके अपनी बात कह डाली। मैं अवाक एकटक उन्हें देखती रह गई कि मेरी अम्मा यह क्या कह रही हैं? मैं तो क्या-क्या सोच रही थी, आत्महत्या करने जा रही थी और अम्मा एकदम उलट वह कह रही हैं जिसकी मैंने कल्पना तक नहीं की है। खुर्राट के साथ जीवन बिताने, शादी करने की तो मैंने सोची ही नहीं। धोखाधड़ी के चलते जो रिश्ता बन गया उससे आगे का कोई चित्र तो ख़्यालों में भी नहीं था और, और अम्मा कुछ ही घंटों में सब कुछ सोच-समझ कर इतना बड़ा निर्णय भी ले बैठीं हैं।

मैं उनकी बेटी होते हुए भी सच में उनसे बहुत पीछे हूँ। मैंने उनके निर्णय पर कहा, “अम्मा तुम समझ रही हो कि तुम क्या कह रही हो?” लेकिन अम्मा कुछ सोचने, सुनने, समझने को तैयार ही नहीं हुईं। एकदम ज़िद कर बैठी थीं कि अभी खुर्राट को बुलाओ। अभी बात करेंगे। मैंने टालने के लिए कहा अब तक वह ऑफ़िस चला गया होगा। लेकिन उन्होंने बात पकड़ते हुए कहा, "बिटिया हमें आज बहकाओ नहीं। ऑफ़िस गया होता तो यहाँ होकर जाता। जितना भी उसको सुना है उसके हिसाब से वह तुम्हें लिए बिना जा ही नहीं सकता।"

अम्मा की ज़िद के आगे मैंने फ़ोन किया तो सच में वह उस समय सो कर उठा था और मुझे फ़ोन करने ही वाला था कि मैं ऑफ़िस चली गई क्या? मैंने उससे तुरंत घर आने के लिए कहा। कहा, चाय-नाश्ता यहीं करना, अम्मा कह रही हैं। मेरी बात पर सशंकित हो उसने पूछा, "बात क्या है? सब ठीक तो है ना।" मैंने कहा सब ठीक है। बस आ जाओ। उसने ऑफ़िस चलने की बात की तो मैंने कह दिया आज नहीं जाऊँगी।

वह जब आया तो अम्मा ने बहुत खुलकर सारी बातें कीं। बिना संकोच यह भी कहा कि, "तुम दोनों की सारी बातें सुनने के बाद मुझे शादी से अच्छा कोई रास्ता नहीं दिखता। तुम्हारी बातों से मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि तुम दोनों ख़ुश रहोगे। मैं नहीं चाहती कि समय, समाज, मैं या कोई भी तुम दोनों की ख़ुशी के बीच आए।" खुर्राट की तमाम बातों का अम्मा एक ही जवाब देतीं थीं कि, "तुम्हारे बारे में जितना जानती हूँ, उससे ज़्यादा मुझे कुछ जानना भी नहीं है।” अम्मा की हड़बड़ी, उनकी जल्दबाज़ी हम दोनों को हैरान किए हुए थी।

मैं हैरान इस बात पर भी थी कि खुर्राट से बातें करते समय मोबाइल का साउण्ड कुछ ज़्यादा था। मगर तब खुर्राट की बातों में मैं ऐसी खोयी, उलझी थी कि मेरा ध्यान इस तरफ़ गया ही नहीं। जिससे खुर्राट को भी अम्मा सुनती रहीं। मैं उन बातों को सोच-सोचकर शर्म से गड़ी जा रही थी, जिन्हें अम्मा ने भी सुना था। आख़िर अम्मा की ज़िद के चलते हमें उनकी बातें माननी पड़ीं। तीसरे ही दिन एक मंदिर में हम दोनों की महज़ दस मिनट में शादी हो गई।

भगवान के सिवा अम्मा और पुजारी साक्षी बने। और आशीर्वाद भी दिया। पुजारी को अम्मा और खुर्राट ने उसकी उम्मीदों से कहीं ज़्यादा दान-दक्षिणा दी। मुझसे भी दिलवाया। मंदिर में उपस्थित क़रीब दर्जन भर लोगों को खाना भी खिलाया गया। मिठाई-फल भी दिया गया। कुछ भिखारी भी थे उन्हें भी ख़ूब खिलाया गया। ख़ूब दिया गया, पैसा भी। तैयारी के नाम पर हम सब ने कुछ सिंपल से कपड़ों के अलावा कुछ नहीं लिया था।

मेरी इस बड़ी बेमेल सी दूसरी शादी का हर काम ही एकदम अलग तरह से, लीक से हटकर हुआ। शादी की रस्म के बाद मैं ससुराल यानी अपने नए-नवेले पति खुर्राट के घर नहीं गई। अम्मा ने उससे हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "बेटा इस घर में है ही कौन? तुम दामाद बेटा सब कुछ हो गए हो मेरे लिए। अब तुम यहीं रहो।" अबकी अम्मा की ज़िद नहीं उनकी याचना, उनके स्नेह-प्यार, आँसुओं से भरी आँखों के सामने खुर्राट मोम बन गया। पिघल गया। नतमस्तक हो गया। अम्मा दो दिन में जो ख़रीददारी कर पाई थीं दामाद के लिए, घर में जो तैयारी की थी वह खुर्राट के लिए आश्चर्यजनक थी। और मुझे सुहाग सेज पर उसने आश्चर्य में डाल दिया सोने नहीं डायमंड के ज़ेवर देकर।

मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। तभी उसने यह भी बताया कि अगर वह अम्मा की बात ना मानकर मुझे अपने यहाँ ले जाता तो एक छोटा सा बेड हमारी सुहाग सेज बनता, या फिर ज़मीन। जहाँ ना जाने कब से झाड़ू भी नहीं लगी है। जो भी नाम-मात्र की चीज़ें हैं वह सब अस्त-व्यस्त बिखरी पड़ी हैं। हमारी तरह उसने दो दिन में भी कुछ इसलिए नहीं किया क्योंकि वह दो-तीन हफ़्ते होटल में ही रहने का प्लान बनाए हुए था। और इसी बीच कहीं किराए का मकान लेकर नए सिरे से सब कुछ ख़रीदना चाहता था। मगर अम्मा के प्यार ने उसका प्लान बदल दिया। दो दिन में ऑफ़िस के अलावा वह और कुछ काम कर सका तो बस इतना कि बैंक से पैसा निकालकर मेरे लिए डायमंड सेट ले पाया। पसंद करने में सारी मदद ज्वैलर के यहाँ सेल्स वूमेन ने की। जिसकी आँखें और होंठ उसकी नज़र में बेहद ख़ूबसूरत थीं। मगर मुझे उसकी यह बात सिवाय ठिठोली के और कुछ नहीं लगी थी।

मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह हुआ कि सुहाग-सेज पर मुझे मेरा खुर्राट नहीं मिला। जो मिला वह एक बेहद संकोची, शर्मीला, भावुक इंसान मिला। मैं चकित थी कि फोन पर ना जाने कैसी-कैसी बातें करने वाला खुर्राट कहाँ चला गया। जिस खुर्राट के इंतज़ार में मैं जोश, उमंग, रोमांच में सुध-बुध खोती जा रही थी, रात में उसके एकदम बदले रूप ने मुझे झकझोर कर रख दिया था। मैं विस्मित सी बैठी उसके हाथों से गले में डायमंड नेकलेस पहन रही थी, और साफ़ महसूस कर रही थी कि मेरे प्यारे खुर्राट के हाथ काँप रहे हैं। उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था। मैं जोश, उमंग, रोमांच, उत्तेजना शून्य हो बस उसके थरथराते जिस्म को गहराई तक पढ़ने का प्रयास कर रही थी।

दूसरी शादी की सारी ख़ुशियाँ मुझे लगा कि मेरी मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जा रही हैं, और मैं उन्हें रोक पाने में असमर्थ हूँ। मुझे लगा हो ना हो, अम्मा, मेरा, दोनों ही का निर्णय ग़लत होने जा रहा है। बेमेल विवाह की यह गाड़ी हिलते-डुलते थोड़ा-बहुत सफ़र तय कर ले यही बड़ी बात होगी। खुर्राट से मासूम गुड्डा बने अपने पति पर मुझे बड़ी दया आ रही थी। बड़ी तरस आ रही थी। मैंने सोचा कि कहीं यह भी मेरी तरह सपने टूटने की हताशा में डूबने लगे, इसके पहले कि इसकी भी मुट्ठी से खुशियाँ फिसलने लगे, मुझे इसकी मुठ्ठी अपनी ही दोनों हथेलियों में थाम लेनी चाहिए। मैंने पूरी कोशिश की, कि उसे उसकी सारी ख़ुशियाँ मिलें। लेकिन विश्वास के साथ अब भी नहीं कह सकती कि तब उसे वह ख़ुशियाँ मिली थीं कि नहीं।

मैं अगले पंद्रह दिन तक छुट्टी पर रही। वह जाता रहा। उसने ऑफ़िस में किसी को नहीं बताया। कहा, "साले इस लायक़ नहीं कि उनसे अपनी ख़ुशी शेयर की जाए।" मैंने कहा लेकिन जब मैं चलूँगी तब तो सब सिंदूर-बिंदी देखकर जान ही जाएँगे कि शादी हो गई है। तो उसने कहा, "तुम्हारी शादी हो गई है यही जानेंगे ना। किससे हुई है यह तो जब हम बताएँगे तब पता चलेगा।" यही हुआ भी। ऑफ़िस में हम दोनों पहले की ही तरह रहते। लोग पूछते हस्बैंड के बारे में तो मैं टाल जाती।

अम्मा ख़ुश थीं कि मैं ख़ुश हूँ। लेकिन मैं कितना ख़ुश थी यह मैं ही जानती थी। खुर्राट कितना ख़ुश था कितना नहीं यह वही जानता था। लेकिन उसे देख कर मुझे शत-प्रतिशत भरोसा था कि कम से कम वह मुझसे ज़्यादा ख़ुश था। अम्मा को लेकर मेरा आकलन ग़लत निकला।

अम्मा की अनुभवी आँखों ने मेरी पेशानी पर कुछ इबारतें पढ़ ली थीं। बड़े संकोच से एक दिन मेरे सिर में तेल लगाते हुए पूछा, "बिटिया तू ख़ुश तो है ना, मुझसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई।" यह सुनते ही मैं एक झटके में उनकी तरफ़ मुड़ी। पूछा, “क्यों अम्मा ऐसा क्यों पूछ रही हो?” वह बोलीं, "पता नहीं क्यों बिटिया इधर कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि तेरे चेहरे पर कुछ उदासी सी बीच-बीच में तैर जाती है।" अम्मा से यह सुनते ही मैंने उन्हें बाँहों में भर लिया। फिर उन के माथे को चूम कर कहा, “क्यों अम्मा, क्यों इतना चिंता करती हो? मैं एकदम ख़ुश हूँ। तुम्हें दिखता नहीं मैं कितना ख़ुश रहती हूँ।”

मैं एकदम सफ़ेद झूठ बोलती गई। अम्मा कुछ देर जैसे मेरे चेहरे को पढ़ने के बाद बोलीं, "हाँ बिटिया तुम ऐसे ही हमेशा ख़ुश रहो। तुम्हारे चेहरे पर ज़रा भी चिंता मेरी जान ही निकाल लेती है। बस बिटिया अब जल्दी से एक नाती दे दो तो घर का सूनापन ख़त्म हो जाए। सूना-सूना घर अब बड़ा ख़राब लगता है।" अम्मा की बात पर मुझे बड़ा तेज़ झटका लगा। साथ ही उनकी नादानी पर हँसी भी आ गई।

मैंने जब अपनी ज़्यादा हो चुकी उम्र की बात उठाई, कहा कि अब कहाँ इस तरह की कोई उम्मीद है तो अम्मा का जवाब सुनकर मैं उन्हें एकटक देखती रह गई। डॉक्टर से मिलने से लेकर आईवीएफ टेक्नोलॉजी को यूज़ करने तक की बात करने लगीं। मैं अचंभित रह गई जब उन्होंने अपनी अलमारी से कई अख़बारों के पन्नों के टुकड़े निकाल कर मेरे सामने रख दिए और उन में आईवीएफ टेक्नोलॉजी से निसंतान दंपत्ति को संतान पैदा कराने के विज्ञापनों को दिखाते हुए कहा, "देखो यह सब क्या है? इनमें से किसी के यहाँ जाकर दिखाओ। बिटिया उम्र की बात हमारे भी मन में थी। मगर इसमें जो बातें लिखीं हैं उससे हमें विश्वास है कि इस घर में भी नन्हें-मुन्नों की किलकारी ज़रूर गूँजेंगी। तुम्हारी गोद ज़रूर हरी-भरी होगी।" कहते-कहते अम्मा एकदम भावुक हो गईं। उनका गला भर आया। अपने लिए उनकी भावना, उनके प्यार, चिंता को देखकर मेरा दिल भर गया। मेरी भी आँखें भर आईं। मैंने लाख कोशिश की लेकिन अम्मा को चुप कराते-कराते ख़ुद भी उनसे ज़्यादा रोने लगी।

तब उल्टा अम्मा हमें चुप करा रही थीं। मेरे सब्र का बाँध इसलिए टूटा, इसलिए मैं न रोक पाई ख़ुद को, क्योंकि मन में खुर्राट और अपने बीच जो अनकही सी दूरी के बीज अंकुरित होते देख रही थी, उन्हें देखते हुए तो बच्चे का सपना देखना भी मूर्खता थी। वह भी आईवीएफ जैसी बेहद जटिल, ख़र्चीली टेक्नोलॉजी के ज़रिए। मगर यह बातें अम्मा से कह कर मैं उन्हें दुख नहीं देना चाहती थी। दुख क्या यह सुनकर तो उन पर वज्रपात ही हो जाता। अपनी बात, अपना दर्द मैं कह भी नहीं सकती थी। अम्मा से भी नहीं। इसी विवशता ने मेरे आँसू और भी नहीं रुकने दिये थे। कुछ देर बाद अम्मा का दुख कम करने के लिए मैंने झूठ ही कहा, ठीक है अम्मा, मैं इनसे बात करूँगी। जाऊँगी किसी डॉक्टर के पास। 

जब अम्मा से मैंने यह बात कही थी, तब मन में बिल्कुल नहीं था कि इस बारे में अपने मुँह से खुर्राट पति से बात करूँगी। मगर मन में इस बात को लेकर उथल-पुथल मची रही। रात में उनको काफ़ी जॉली मूड में देखकर मेरी भी बरसों-बरस से दबी इच्छा एकदम जाग उठी। मैं मचल उठी। पति महोदय से बात उठाई तो देखा कि उनकी स्वाभाविक हँसी बनावटी हँसी में बदल गई। मेरी बगल में बैठे थे, उठे, एक हल्की सी थपकी पीठ पर मारी और बाथरूम में चले गए। लौटे तो मोबाइल उठा कर किसी को कॉल की और बात करने लगे। मुझे उनका जवाब मिल चुका था। इतना स्पष्ट जवाब दिया था कि शक-शुबह की रंच मात्र को भी गुंजाइश नहीं थी।

मेरा दिल रो उठा। कलेजा फट गया। अपनी मूर्खता पर ग़ुस्सा नहीं आया बल्कि ख़ून खौल उठा कि सब कुछ जानते समझते हुए मैंने यह मूर्खता नहीं बल्कि यह पागलपन क्यों किया? पहली मूर्खता तो इनकी बातों में आकर, भावनाओं में बहकर इनके इतने क़रीब चली गई। फिर अम्मा की बातों को मान लिया जो वास्तव में मेरे मन में ही अँखुवाई बात थी। आनन-फानन में शादी कर ली। कितना सही कहा गया है कि जल्दी का काम शैतान का होता है।

मेरा मन फूट-फूटकर रोने को कर रहा था। बेड पर एक तरफ़ करवट लेकर लेट गई। मैं पूरी ताक़त से अपनी रुलाई रोकने में लगी हुई थी। दस मिनट बाद ही खुर्राट को भी बेड पर लेटते महसूस किया। मुझे जवाब देने के लिए बात करने का ड्रामा ख़त्म हो गया था। मैंने जब उनके हाथों का स्पर्श अपनी बाँहों पर महसूस किया तो मैंने तुरंत ही उनकी ही तरह ड्रामा किया। बात करने का नहीं, सोने का। खुर्राट ने पूछा, "सो गई क्या?" लेकिन मैं एकदम निश्चल पड़ी रही। शरीर को एकदम ढीला छोड़ दिया, जिससे उनको ज़रा भी शक ना हो। मुझे तब और कष्ट हुआ जब वह अगले ही पल दूसरी तरफ़ करवट होकर सो गए। "सो गई क्या?" यह पूछ कर उन्होंने केवल कंफ़र्म किया था कि मैं सो रही हूँ कि नहीं।

इस रात के बाद मैंने फिर कभी उनसे इस चैप्टर पर एक शब्द तो क्या एक अक्षर ना बोली। अम्मा पूछतीं तो लगातार झूठ बोलती कि डॉक्टर के पास गई थी, यह बताया, वह बताया। कुछ दवाएँ भी दी हैं। पूरा कोर्स होने के बाद आने को कहा है। अम्मा से झूठ बोलने, उन्हें धोखे में रखने का पाप मैं लगातार करती रही। बोलते वक़्त मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती थी। मन कचोटता था, लेकिन मैं अपनी इस बात पर अडिग थी कि चाहे जो भी हो जाए, चाहे दुनिया के सारे पापों के बोझ तले दबकर मैं ख़त्म हो जाऊँ, लेकिन सच बता कर अम्मा की आँखों में आँसू नहीं आने दूँगी।

लेकिन मेरी कोशिश आंशिक ही सफल हो रही थी। जैसे-जैसे समय बीत रहा था वैसे-वैसे उनकी आँखों में आँसू की चमक मैं और तेज़ होते देख रही थी। उनकी बातचीत भी कम होती जा रही थी। चेहरे पर सूनापन, विरानापन गहरा और गहरा होता जा रहा था। हमारे और खुर्राट के बीच मधुरता का विलोपन भी गहरा होता जा रहा था। घर में सूनापन अपनी जगह और बड़ी करता जा रहा था। और एक दिन यही सूनापन लिए अम्मा मेरे जीवन का आख़िरी कोना भी एकदम सूना करके चली गईं। रात ग्यारह बजे मैं उनकी दवाओं का डिब्बा, पानी और घंटी का लंबे तार वाला स्विच उनके बेड के बगल में स्टूल पर रख कर सोने गई थी।

मैंने महीने भर पहले ही यह घंटी उनकी बढ़ती स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को देखते हुए लगवाई थी कि अम्मा ज़रूरत पड़ने पर स्विच दबा देंगी तो मेरे कमरे में घंटी बज जाएगी। मैं तुरंत उनके पास पहुँच जाऊँगी। लेकिन अम्मा ने घंटी नहीं बजाई। कंबल, बिस्तर की हालत, स्टूल से नीचे गिरा पानी का गिलास और दवाई का डिब्बा और ख़ुद वह जिस तरह बिस्तर पर पड़ी थीं, वह सारी स्थितियाँ चीख-चीख कर बता रही थीं कि अम्मा ने तकलीफ़ बढ़ने पर दवा पानी लेने की कोशिश की थी। और जल्दी में नीचे गिर गईं। फिर बड़ी कोशिश कर बिस्तर पर पहुँच तो गईं। लेकिन अपने को सही पोज़ीशन में भी नहीं कर पाईं। स्विच जैसे का तैसा स्टूल पर पड़ा था। उन्होंने मुझे परेशान करना नहीं चाहा था। जबकि सच यह है कि यह करके उन्होंने मुझे ऐसा दुख दिया है, जो जीवन भर मेरे साथ रहेगा।

मैंने उनकी अंतिम इच्छा का भी पूरा ध्यान रखा, कई बार भाइयों को सूचना देने के लिए सोचा लेकिन अंततः क़दम रुक गए। वैसे भी मुझे घर का एड्रेस आदि याद ही नहीं था। किसी का कोई कॉन्टेक्ट नंबर भी मेरे पास नहीं था। मैं अम्मा के ना रहने पर भी उनकी हर बात का अक्षरशः पालन करने का प्राण-प्रण से प्रयास करती रही। ऑफ़िस में भी किसी को सूचना नहीं दी। कुछ पड़ोसी आ गए थे। जो खुर्राट के परिचित थे। खुर्राट दामाद होने का रिश्ता बख़ूबी निभा रहे थे। अर्थी को कंधा देने के लिए वह ख़ुद ही आगे बढ़े।

मैं भी आगे बढ़ी, लेकिन उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ पकड़ा। मना करना चाहा, लेकिन मैंने अपने दूसरे हाथ से उनका हाथ हटा दिया। जो पड़ोसी कंधा देने के लिए खड़े थे उनमें से आगे वाले एक ने मुझे आगे बढ़ा देखा तो ख़ुद ही पीछे हट गए। मैं अपनी माँ को कंधे पर लेकर आगे बढ़ी। पीछे वालों ने राम-नाम सत्य है, का मध्यम स्वर में उच्चारण शुरू किया। पास-पड़ोस के बहुत से लोग अपने-अपने दरवाज़े पर खड़े देख रहे थे। ऐसे आश्चर्य से जैसे कोई अजूबा निकल रहा है। मगर मुझे किसी की कोई परवाह नहीं थी। मैं लड़की-लड़के के फ़र्क़ से नफ़रत करती थी। आज भी करती हूँ। लड़की से पहले मैं अम्मा की संतान हूँ बस यही मेरे दिमाग़ में था। और मैंने सारे क्रिया-कर्म सम्पन्न किए थे।

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