उपन्यास ‘अलकनन्दा सुत’ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
डॉ. मनोज मोक्षेंद्रपुस्तक: अलकनन्दा सुत
लेखिका: अर्चना पैन्यूली
विधा: उपन्यास
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2023
पृष्ठ संख्या: 280
मूल्य: ₹495
यह मत सर्वमान्य होना चाहिए कि कथा-कहानी रचते समय कथाकार अधिकतर अपने जीए हुए समय को उसके सभी प्रतिमानों, प्रतिरूपों और मान्यताओं के साथ अपने कथा-साहित्य में अवतरित करने की कोशिश करता है; या, इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि उसके जीए हुए समय में उपस्थित व्यक्ति, स्थान, परंपरायें और परिवेश जो उसकी साँसों में बचपन से ही रचे-बसे होते हैं, वे सभी उसके कथा-साहित्य में ज़ाहिर तौर पर कुलबुलाते हुए दृश्यमान होते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण स्वयं प्रेमचंद का कथा-साहित्य है जिसमें हम उत्तर भारत के अर्थात् विशेषतया बनारस एवं उसके इर्द-गिर्द के उन स्थानों, व्यक्तियों, रीतियों, मान्यताओं और विचारधाराओं से अवगत होते हैं जो प्रेमचंदीय देशकाल में मौज़ूद थे; जहाँ तथा जिनके साथ प्रेमचंद ने अपने समय को पूर्णता में जीया था। भारत के ही अंग्रेज़ी साहित्य के लेखकों नामत: आर.के. नारायण, मुल्कराज आनंद और कमला दास के कथा-साहित्य में भी सब कुछ ऐसा ही है। अपने आर्यावर्त्त की सीमाओं को लाँघते हुए जब हम अन्य हिंदीतर साहित्य या विशेष रूप से अंग्रेज़ी साहित्य में झाँकते है तो ख़ास तौर पर चार्ल्स डिकेंस, थॉमस हार्डी, हेनरी फ़िल्डिंग और जेन ऑस्टिन के उपन्यासों में उनका देशकाल अपने सभी तत्त्वों और सामाजिक प्रतिनिधियों के साथ स्पंदनशील अनुभूत होता है।
इन स्वाभाविक विशिष्टताओं के मद्दे-नज़र हम समकाल की सुपरिचित प्रवासी लेखिका अर्चना पैन्यूली के कथा-साहित्य में जब डुबकी लगाते हैं तो पाते हैं कि वह अपने समय की गंगा में तैरती हुई अपने देशकाल को भरपूर जीने की कोशिश करती हैं जिसे वह अपने कथा-साहित्य के कैनवस पर सूक्ष्मतम विवरण देते हुए चित्रित करती हैं। इसके प्रमाण-स्वरूप हम उनके नव-प्रकाशित उपन्यास ‘अलकनन्दा सुत’ को शोध-अनुसंधान के प्रयोगशाला में परखना चाहेंगे।
इस उपन्यास की प्रथमतः विशेषता है—इसका चरित्र-प्रधान होना। उपन्यास का आरंभ ही एक विपन्न पर्वत-प्रदेशीय परिवार के ब्योरे से आरंभ होता है। भाई का पलायन और फिर गृह-वापसी, मरणासन्न माँ की बीमारी, निर्धनता और बेकारी जैसी समस्याएँ निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार की दारुण व्यथा बयान करती हैं। इन सबके बीच शिवानन्द के विवाह का टूटना—एक अजीबो-ग़रीब वातावरण का सृजन करता है। शुरूआत में ही हम उपन्यास के अनेक मुख्य पात्रों से परिचित होते हैं—तीन भाई विश्वानन्द, शिवानन्द और देवानन्द; चाचा ब्रह्मानन्द, विश्वानन्द की पत्नी सत्यभामा तथा भाइयों की माँ, जिनका निधन दवाइयों और उचित परिचर्या के अभाव में होता है। ढहते मकान, विवाह के लिए तैयारियों की चिंता तथा फिर सम्बन्धियों की चुगुलख़ोरी के कारण विवाह टूटना, हैजे का प्रकोप जैसी समस्याओं का विवरण बड़ी मार्मिकता के साथ मिलता है। शिवानन्द अपने निकट अतीत में झाँकते हुए अपने दादा-दादी और सौतेले दादा के बारे में परिचय कराता है। सगे दादा-दादी के निधन के बाद सौतेले दादाजी मल्खू के सौतेलेपन के प्रति लोकप्रिय नकारात्मक धारणा ज़बान कसैला कर जाती है। अर्चना कथानक की बुनावट में कहीं भी कोई रिक्तता नहीं छोड़ती है। उन्हें एक सनातनी परिवार में रीति-रिवाज़ों और मानवीय द्वंद्वों की भरपूर जानकारी है जिनके ब्योरे वह तरतीबवार देते हुए कथात्मकता को रसपंकित करने में दक्ष हैं। अध्याय-एक से तीन तक एक भारतीय परिवार के भीतर के घात-प्रतिघात, घृणा-द्वेष और ग़रीबी का दंश; अभावग्रस्त ग्रामीण परिवेश, ऊँच–नीच का सामाजिक उच्चावच, रोज़गार-शून्यता एवं संसाधन-विहीनता, दक़ियानूस सोच जैसी बाते हमें यह सोचने पर विवश कर देती है कि अर्चना ने स्वयं इन्हें बहुत क़रीब से देखा-भाला है–चमोली-गढ़वाल-वासी अपने पिता के पर्वतीय जीवन के अनुभवों के साथ साझा करते हुए।
कथा में जिज्ञासा की बाढ़ पैदा करने के लिए कथानक को ट्विस्ट देने में अर्चना को अच्छी महारत हासिल है। वह अपने पात्रों को अपना माउथपीस बनाकर ग्रामीण समस्याओं को निःसंकोच उभारती हैं, मुखर बनाती हैं। अध्याय-चार में बड़े भाई विश्वानन्द के साथ शहर की धर्मशाला में पुफू से अकस्मात् हुई मुलाक़ात में शिवानन्द का यह उवाच ग्रामीण जीवन के कड़वे सच को नंगा कर देता है: “. . . मैं बहुत ग़रीब हूँ, अनाथ हूँ। न मेरी माँ है, न पिताजी। न हमारे पास खेत है, न ही मवेशियों के झुंड। न हमारे पास बड़ा मकान है। मुझ नालायक़ को . . . अपनी लड़की कौन देगा?” शिवा की शादी टूटने के भारी मलाल से उसकी पुफू, मामा और उनके बच्चे द्रवित होते हैं और पुफू तो भाट गाँव जाकर लड़की वालों को भरपूर कोसना चाहती है। कथानक यहाँ से रफ़्तार पकड़ता है और शिवानन्द अपने बचपन की स्मृतियों में जाकर, छोटे भाई देवानन्द के स्थान पर स्कूल में पढ़ाई आरंभ कर देता है। कर्णप्रयाग में मिडिल स्कूल की पढ़ाई और उसके बाद पुफू की मदद से लैंसडाउन जाकर सरकारी स्कूल में दाख़िला और वहाँ संघर्षों के तूफ़ान से तथा पुफू के प्रसव के दौरान प्रायः मामा के दुर्व्यवहार से वह बिलबिला उठता है। मामा के मेरठ तबादले के बाद वह विवश होकर कर्णप्रयाग आ जाता है। इस बीच उपन्यासकार अर्चना शिवानन्द के चरित्र को पूरी तन्मयता से उभारती हैं; समय के आगे-पीछे चलते हुए शिवानन्द के अतीत और वर्तमान को उकेरती हैं। इसी अध्याय में विश्वानन्द के कमसिन सत्यभामा के साथ विवाह, श्रीनगर-गढ़वाल में शिवानन्द द्वारा विद्यादत्त सिदौला से आर्थिक मदद लेकर पढ़ाई जारी रखना, माँ के स्वर्गवास के बाद लखनऊ जाकर सेवक की नौकरी करना आदि का दिलचस्प विवरण मिलता है। अध्याय-पाँच में मल्केश्वर नौटियाल के व्यक्तित्व से हम परिचित होते हैं जो शिवानन्द पर विशेष कृपालु थे जिनके बदौलत शिवानन्द को एक्साइज़ विभाग में नौकरी मिली थी। कथाकार अर्चना शिवानन्द को कई भूमिकाओं में पेश करती हैं, यथा नौकरी करते हुए अध्ययन में लगे रहना एवं अपनी दाल-रोटी का ख़ुद प्रबंध करना। वह बार-बार शिवानन्द के चरित्र को उसकी मेहनती दिनचर्या का ब्योरा देते हुए निखारती हैं। उसे कभी उसके लखनऊ के किराए वाले जर्जर घर में प्रस्तुत करती हैं तो कभी उसे विधुर डॉ. गौतम घोष के हवेलीनुमा घर में, जहाँ बड़ा भाई विश्वानन्द डॉक्टर साहब के घर से लेकर उनके क्लीनिक तक चाकरी करते हुए तथा उनकी बच्चियों की देखभाल करते हुए ठाट से रहता है।
उपन्यासकार अर्चना अध्याय-छह में शिवानन्द के विवाह का माहौल बड़ी शिद्दत से सजाती हैं। उसकी होने वाली पत्नी प्रियंवदा, उस चंदनी की ही भतीजी है जिसके साथ शिवानन्द का विवाह टूट गया था। यहाँ कथानक का विस्तार वैवाहिक रीति-रिवाज़ों, संस्कारों, रिश्तेदारों और अतिथियों की पारस्परिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के माध्यम से होता है। वर-वधु पक्षों के बीच आर्थिक असमानताओं, विवाह में वर पक्ष की आर्थिक अक्षमता के कारण कन्यापक्ष की ओर से उपहासात्मक विरोध, कन्यादान एवं अन्य पूजा-पाठ आदि जैसी बातों का विवरण अर्चना जैसी कोई महिला लेखिका ही दे सकती है।
अध्याय-सात में शिवानन्द और प्रियवंदा के दाम्पत्य जीवन का विवरण है जहाँ प्रियंवदा सुरक्षा की दृष्टि से अदने-से सड़े हुए घर में रहते हुए ‘शहरी जीवन के नए अनुभवों से अवसादग्रस्त’ रहती है। पर, शिवानन्द का एक्ससाइज़ इंस्पेक्टर के पद हेतु चयन और डॉ. घोष के यहाँ बड़े भाई विश्वानन्द की देख-रेख में नव-दंपती का अल्पकालिक आतिथ्य-सत्कार प्रियवंदा के हर्ष का स्रोत बनता है। उपन्यासकार बार-बार ग्रामीण और शहरी पृष्ठभूमि बदलकर अपने चरित्र/पात्रों के व्यक्तित्व-विकास पर बल देती है। वह यह प्रदर्शित करना चाहती है कि मनुष्य की जीवन-शैली बदलने के साथ-साथ उसकी मनोवृत्तियों में कितने प्रकार के परिवर्तन आते हैं। परिवर्तन चाहे वंश-वृद्धि से आए, चाहे धन-धान्य से सम्पन्न होने से। शिवानन्द का अपने बड़े भाई से यह सवाल करना कि उसने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ रहते हुए वंश-वृद्धि क्यों नहीं की जबकि वह, उसका छोटा भाई होकर पहले पिता बन गया है। एक मिसालिया बात और रेखांकित की जानी चाहिए कि उपन्यासकार ने प्रियंवदा के परिवार में दो पत्नियों और उनके अलग-अलग पैदा हुए बच्चों के बीच सौतेलेपन की भावना को विकसित नहीं होने दिया है। कोई महिला कथाकार ही ससुरालियों के मध्य वातावरण को बहुकोणीय ढंग से सज्जित कर सकती है। शिवानन्द और ससुरालियों के बीच द्वंद्वों को अर्चना बेहतर ढंग से चित्रित करती है। उपन्यास के अग्रेतर क्रिया-व्यापार में विश्वानन्द और शिवानन्द के बीच कई रूपों में तकरार, विश्वानन्द की डॉ. घोष के प्रति निष्ठा और उसकी अपनी पत्नी के प्रति उपेक्षात्मक रवैया, संतानहीन सत्यभामा के परिवार के प्रति समर्पण किन्तु उसका शिवानन्द के बेटे के प्रति एकाध सौतेले व्यवहार से परिवारजनों के आहत होने जैसी बातों से कथातंतुओं को परस्पर संबद्ध किया जाता है और कहानी का विस्तार किया जाता है। पहाड़ी समाज (नैल गाँव, सेवल गाँव, सिदौली आदि) में व्यवहृत वैवाहिक रीतियों यथा, दोहरागमन, साहपट्टा, हल्दी रस्म, गुप्तदान (कन्यादान), वरडाली, अग्नि-फेरा आदि की चर्चा करके अर्चना पाठकों की जानकारी में बेहतर इज़ाफ़ा करती है।
‘अलकनन्दा सुत’ एक परिवारिक कथा है जिसमें उपन्यासकार तीन पीढ़ियों में परिवारिक लफड़ों-झटकों और कथात्मक तानों-बानों के ज़रिए परिवार के सूई से लेकर पहाड़ तक का अभिरुचिपूर्ण ब्योरा देती है। वह भाइयों, जेठानी-देवरानी, दादाओं, सास-बहू और अन्य रिश्तेदारों आदि के बीच की पारस्परिक क्रियाओं और अनुक्रियाओं का वर्णन दक्षतापूर्ण ढंग से देती है। अध्याय-आठ में शिवानन्द की सफीपुर में एक्साइज़ इंस्पेक्टर के रूप में तैनाती का ज़िक्र करते हुए पत्नी प्रियंवदा के साथ उसके सम्बन्धों को रूपायित किया जाता है। प्रियंवदा के गाँव में छोटी सौतेली माँ के निधन पर उसका रोना-धोना और इस विषय में शिवानन्द के उदासीन रवैये पर अर्चना दोनों के बीच जो नोक-झोंक का ब्योरा देती है, वह दिलचस्प है। उपन्यासकार इस उपन्यास में सगे-सम्बन्धियों के पत्रों के माध्यम से भी कथा का विस्तार करती है। उदाहरण के लिए शिवानन्द के अपने ससुर को लिखे उस पत्र को प्रस्तुत किया जाता है जिसमें वह प्रियंवदा के गाँव में छोटी सौतेली माँ के निधन पर शोक व्यक्त करता है। उसी पत्र में दी गई सूचना के आधार पर, उसके आमंत्रण पर ससुर सफीपुर उसके आवास पर आ धमकते हैं। इस अध्याय में प्रियंवदा अपने परिवार के बाबत चर्चा करती है। अध्याय-नौ में बड़े भाई विश्वानन्द का शिवानन्द को लिखा गया पत्र, अध्याय-तेरह में पुनः शिवानन्द को विश्वानन्द द्वारा प्रेषित पत्र, अध्याय-सत्रह में सूरज, जो देहरादून में अध्ययनरत है, द्वारा गैरोला को लिखा गया पत्र जिसमें उसने उनकी पुत्री से विवाह न करने का अनुरोध किया था, उल्लेखनीय है, जिनसे कथा को पर्याप्त विस्तार मिलता है। उपन्यास के अध्याय सत्रह और अट्ठारह में शिवानन्द की अगली पीढ़ी की कहानी से हम अवगत होते हैं। यहाँ हम सूरज और जया से परिचित होते हैं जिनके बीच सगाई टूट जाने के बाद प्रेम के बीज प्रस्फुटित होते हैं। प्रेम-व्यापार की यह कहानी पाठकों को रोमांचित करती है। प्रेम के बाद विछोह और सूरज के साथ सगाई टूटने के बाद जया का दूसरी सगाई के वक़्त अनुपस्थित होना कहानी में ख़ास नाटकीय मोड़ लाती है। तदनंतर, सूरज की सगाई और शादी जया की छोटी बहन रिया के साथ सम्पन्न होती है। अध्याय-उन्नीस में एक पुत्री अपने पिता शिवानन्द के अतीत में उनकी अस्मिता को तलाशती है और उन्हें महानता की कसौटी पर किसी भी तरह से कमतर नहीं आँकती है।
यह उपन्यास उनतीस अध्यायों में विभक्त है; साथ में, इसका उपसंहार भी है जिसे उपन्यास से जोड़कर पढ़ना चाहिए। उपसंहार में पत्रों की झड़ी-सी लग जाती है जिन्हें पढ़कर उपन्यास के इस छोर से उस छोर तक पहुँचा जा सकता है। यह उपन्यास अनेकानेक व्यक्तियों के साथ बदलते रिश्तों और उन रिश्तों में आने वाले उतार-चढ़ावों की मार्मिक कहानी कहता है। यह उपन्यास आद्योपांत सम्बन्धों की सार्थकता को आँकने की कोशिश करता है। यद्यपि कहानी स्वतंत्रता-पूर्व से आरंभ होती है और कोई बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक आकर ठहरती है तथापि उपन्यास को पढ़ने के बाद जो इम्प्रेशन्स बनते हैं, वे यह सुनिश्चित करते हैं कि अर्चना इस पूरे कथानक में कहीं न कहीं उपस्थित है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह उपन्यास आत्मकथात्मक है। संभवतः उपन्यासकर शिवानन्द में अपने संघर्षशील पिता के अक्स को देखना चाहती है अथवा अपने पिता के संघर्षों ने ही उन्हें शिवानन्द के चरित्र को रूपायित करने के लिए प्रेरित किया है। पिता के संघर्षों का मूल्यांकन करती रही है। जहाँ कहानी का समापन होता है, उस बिंदु पर आकर ऐसा लगता है कि कहानी की इतिश्री होना अभी शेष है। वैसे भी अर्चना ने इस उपन्यास की पृष्ठभूमि वर्ष 2003 में तैयार की थी और इसका ख़ाका भी तैयार कर लिया था जिसे 2023 में पूरा किया गया। उपन्यास का शीर्षक ‘अलकनन्दा सुत’ है; किन्तु, इसकी सार्थकता हमें बाद में पता चलती है जबकि शिवानन्द बताता है कि अलकनन्दा उसकी माँ का नाम था और उसे “अलकनन्दा की संतान होने पर गर्व है!” जबकि उसका लालन-पालन अलकनन्दा नदी के आँचल में ही हुआ था।
संपूर्ण कहानी एक ही व्यक्ति अर्थात् शिवानन्द के जीवन पर केंद्रित है। कथानक गूढ़ है; किन्तु, क्लिष्ट नहीं। जिज्ञासा आद्योपांत बनी रहती है। वर्ष 1997 से लगातार डेनमार्क में रह रही अर्चना पैन्यूली ने भारत के पहाड़ी जीवन का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। उनकी अपनी जन्मभूमि और अपने पर्वतवासियों से चिपकी हुई मानवीय संवेदनाएँ उनके ज़ेहन में साँस ले रही हैं और लेती रहेंगी। उपन्यास में पात्रों की अधिकता तो है लेकिन पाठक हर पात्र से स्वयं को सहजता से जोड़ लेता है। प्रत्येक पात्र के व्यक्तित्व-निरूपण में उपन्यासकार कहीं भी पक्षपात नहीं करती है। यहाँ तक कि शिवानन्द के चरित्रांकन में ऐसा नहीं लगता कि उसके प्रति उनकी सहानभूति है। इस दृष्टि से अर्चना निरपेक्ष है। रीति-रिवाज़ों, कर्मकांडों, नानाविध मानसिकताओं, नई-पुरानी आदतों, रिश्तों के प्रति निष्ठा, मित्रता का निर्वहन, स्वामिभक्ति जैसी बातों में उपन्यासकार की सांस्कृतिक चेतना श्लाघ्य है। वह ऊँचे मानदंडों का पालन करती है।
जहाँ तक कला-पक्ष के अंतर्गत, उपन्यास की भाषा-शैली का सम्बन्ध है, अर्चना पैन्यूली सजग-सतर्क लेखिका हैं। वह इस बात का सदैव ध्यान रखती हैं कि वह अपनी सहज-सरल भाषा के माध्यम से कितने बेहतर ढंग से पाठक के क़रीब पहुँच सकती हैं; स्वाभाविक संप्रेषणीयता में किसी प्रकार के व्यवधान और क्लिष्टता को दरकिनार कर सकती हैं। पात्रों के बीच संवाद में वह भाव-संप्रेषण के लिए उचित शब्दावलियों का प्रयोग करती हैं। प्रयुक्त संवाद पात्रों के मनोभाव तथा परिस्थिति-अनुकूल उनके उद्वेग-संवेग को व्यक्त करते हैं। बेशक, वह अपने हर पात्र के भिन्न-भिन्न मनोविज्ञान पर ख़ास ध्यान रखती हैं। विभिन्न प्रकार के सुखद-दु:खद वातावरण के सृजन में उनकी भाषा-शैली सफलता के मानक पर खरी उतरती है। जब वह लेखकीय स्तर पर टिप्पणियाँ करती हैं, अपने विचार प्रस्तुत करती हैं तो वहाँ उनका व्यक्तित्व निखर कर सामने आता है। समकाल की वह जागरूक और संवेदनशील कथाकार हैं। पाठकों को उनसे और अधिक सृजनशील होने की उम्मीद है। हम उनसे आग्रह करते हैं कि वह पर्वतीय पृष्ठभूमि में कथा-साहित्य को नई ऊँचाइयों प्रदान करने के लिए ऐसी ही और कहानियाँ और उपन्यास लिखें और हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाएँ!