मेरी आरज़ू   रही  आरज़ू

01-05-2020

मेरी आरज़ू   रही  आरज़ू

निज़ाम-फतेहपुरी (अंक: 155, मई प्रथम, 2020 में प्रकाशित)

मेरी आरज़ू   रही  आरज़ू  युँ  ही  उम्र  सारी  गुज़र  गई
मैं कहाँ-कहाँ न गया  दुआ  मेरी  बे-असर  ही मगर गई


की तमाम कोशिशें उम्र भर  न बदल सका मैं नसीब को
गया मैं जिधर  मेरे  साथ  ही  मेरी  बेबसी  भी उधर गई


चली गुलसिताँ में जो आँधियाँ तो कली-कली के नसीब थे
कोई गिर गई वहीं ख़ाक पर  कोई  मुस्कुरा के सँवर गई


वो नज़र जरा सी जो ख़म हुई मैंने समझा नज़र-ए-करम हुई
मुझे क्या पता ये अदा थी उनकी जो दिल के पार उतर गई


मेरे दर्द-ए-दिल की दवा नहीं  मेरा ला-इलाज ये मर्ज़ है
मुझे देखकर मेरी  मौत  भी  मेरे  पास  आने  में डर गई


ये तो अपना अपना  नसीब  है  कोई  दूर कोई करीब है
न  मैं  दूर  हूँ  न  करीब  हूँ  यूँ  ही  उम्र  मेरी  गुज़र  गई


ये खुशी 'निज़ाम' कहाँ से कम कि हैं साथ अपने हज़ार ग़म
ये ही ज़िंदगी है ये सोचकर हँसी आके लब पे बिखर गई

– निज़ाम फतेहपुरी

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