कंठ भर गीत

01-02-2026

कंठ भर गीत

अरुण कुमार प्रसाद (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कंठ भर गीत गाने दे। 
हर वीणा को सजाने दे। 
ये गणतंत्र हो पावन, ज़रा
मन-मन में समाने दे। 
 
इतिहास की त्रुटियाँ सभी, 
भूगोल को फिर याद आने दे। 
तुम्हारे अर्थ में स्वेच्छाचारिता के
तत्त्व को निष्प्राण होने दे। 
 
संकल्प की शुचिता व दृढ़ता
गणों का अभिमान होने दे। 
तंत्र को मंत्रों से शिक्षित कर
सरल, सुग्राह्य और शान होने दे। 
 
क़िले की दृढ़ हर दीवार ढहने दे
ध्वजा हर हाथ में ऊँची ही फहरने दे। 
इन्हीं दीवार के अन्दर ग़ुलामी पल रही होती
उसे हर हाल में कुचली हुई एक मौत मरने दे। 
 
उतरकर अट्टालिकाओं से हर दिन
हमारे गली-कूचों से गुज़रने दे। 
हमारा हाथ धरकर और हमारे साथ होकर
चेतना इसकी निरन्तर ही मचलने दे। 
 
ख़ूबसूरती गणतंत्र की है तंत्र को
दृढ़ तथा अक्षुण्ण रखने में। 
यही कर्त्तव्य हो जन की 
तथा हो कर्म भी सम्पन्न रखने में। 

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