नफ़रत दिलों में अक़्ल पे छाई ग़ुबार है

01-05-2026

नफ़रत दिलों में अक़्ल पे छाई ग़ुबार है

निज़ाम-फतेहपुरी (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 
221    2121    1221    212
 
नफ़रत दिलों में अक़्ल पे छाई ग़ुबार है
हम आ गए कहाँ पे ये कैसा दयार है
 
बरसों बरस जो साथ रहे वो बदल गए
रिश्तों में कैसे आज ये आई दरार है
 
मुझसे बिछड़ गए वही अपने थे जो कभी 
आ जाओ पास मेरे कि दिल बेकरार है
 
घबरा न साथ वक़्त के चलना है सीखना
बूढ़ा है पेड़ देख लो उस पे बहार है
 
झूठों मे होड़ चल रही झूठा बड़ा है कौन
झूठों से बोले झूठ जो झूठा अपार है
 
दुनिया में आया कैसे वो पैदा हुआ न जो
ऐसा अजूबा मुझको दिखा पहली बार है
 
जो वो कहेंगे सच वही बाक़ी निज़ाम झूठ
मानो न मानो बात तुम्हें इख़्तियार है

निज़ाम फतेहपुरी

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