कोहरा
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
कोहरे को देखकर
डर सा लगता है
जब घना सा दिखता कोहरा
धुँध में नहीं दिखता कुछ
धीरे-धीरे चलते लोग
बड़ा मज़ा मिलता है कोहरे में
नहीं दिखती सूरज की लाली
इंतज़ार होता कोहरा छँटने का
कोहरा भी सूरज को ढके रहता
बेचारा सूरज भी ठिठुरा रहता