रग-रग के लहू से लिक्खी है

01-01-2021

रग-रग के लहू से लिक्खी है

निज़ाम-फतेहपुरी

221 1222 22 221 1222 22


अरकान- मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ैलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ैलुन

 

रग-रग के लहू से लिक्खी है हम अपनी कहानी क्यों बेचें
हर लफ़्ज़ अमानत है उनकी वो अहद-ए-जवानी क्यों बेचें
 
ये गीत ही तो बस अपने हैं हमको जो किसी ने बख़्शे हैं
तुम दाम लगाने आए हो हम उनकी निशानी क्यों बेचें
 
फ़नकार को जो कुछ देकर ख़ुद नोटों से तिजोरी भरते हैं
हम ऐसे दलालों के हाथों वो याद पुरानी क्यों बेचें
 
लफ़्ज़ों में पिरोयी हैं यादें जो जान से हमको प्यारी हैं
क़ीमत ही नहीं जिनकी कोई घड़ियां वो सुहानी क्यों बेचें
 
शोहरत के लिए बिकने से तो गुमनाम निज़ाम अच्छा यारों
बेबाक क़लम है अपनी ये हम इसकी रवानी क्यों बेचें

– निज़ाम-फतेहपुर)

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल
गीतिका
कविता-मुक्तक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में