कबीर से संवाद

अनुजीत

दावाग्नि जीवन अपना
अमृत एक अपार कबीरा
मंडित हो तुम योग ध्यान से
मंत्रमुग्ध हम तुम पे कबीरा।

 

काँचनपुरुष अभिलक्षित हो तुम
कंकालशेष है जीवन अपना
तुम सम्पूर्ण हो, हम संकटस्थ हैं
दुनिया हद हताशी कबीरा।

 

अनंतय साधना में दमक रहे तुम
हमारा जीवन संग्राम अपूठा
हम दोनों की रज्म जुदा है
लेकिन तत्व समान कबीरा।

 

धंधार जलाये तुम बैठे हो
हम दहकते निर्धुम अग्नि पर
तप कर अलमस्ती पा लेने की
ठोकरी हमने थामी कबीरा।

 

हृदय हकबक बना हुआ है
जीवन-तरु अति निर्जल है
निभृत मौन में अनुभूत करेंगे
हक़ीक़ी की हक्कानी कबीरा।

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