घर गिराओ आज माटी का, लगी है होड़
हो चले हम सन्निकट पाषाण के
अब न कीचड़ में कमल दल उग रहा
मोर भी नाचे नहीं दिन बीतते आषाढ़ के
हे विधाता! क्या प्रकृति भी परवशा होगी?

हो गए इतिहास ‘अर्पण’ और ‘न्योछावर’ शब्द
हम नित नयी बुनते कला अनुबंध की
लूटते हैं सुख लुभावन और पछताते जनम भर
हो रही बिकवालियाँ संबंध की
इस जहां की ज़िंदगी अब अनरसा होगी?

पशु-पक्षी पी रहे किस घाट का पानी, न जाने
तज रहे क्यों स्वत्व का उपधान
आदमी अब है लजाता आदमी के बीच
खो रही देवी यहाँ पहचान
छोड़ ममता, दया नारी कर्कशा होगी?

गगनभेदी, तड़ितरोधी, प्रकृति के पर सब विरोधी
गा रहे हम प्रगति अपनी, चाँद-मंगल पर चढ़े
सुख सुई की नोंक भर, मुस्कान टेढ़ी नज़र की
ख़ाक मानवता हुई, अब सोच लो कितना बढ़े
दौड़ अंधी, इस दिशा की क्या दशा होगी?

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