कुछ याद रहा कुछ भूल गए
वन्दना पुरोहित
मैं आज बहुत परेशान था दो-तीन घंटे से अपने दादाजी को पास पड़ोस और सड़कों पर ढूँढ़ रहा था। ना जाने कहाँ चले गए। पड़ोस में भी पूछा कि किसी ने दादाजी को देखा तो किसी ने कोई जवाब ना दिया। वैसे भी फ़्लैट सिस्टम में किसी को किसी की नहीं पड़ी। कोई क्या कर रहा है? कहाँ जा रहा है? किसी को कोई मतलब नहीं। पड़ोस के नाम पर सिर्फ़ फ़्लैट नंबर और बंद दरवाज़े। कभी-कभार की मुस्कुराहट जो ज़बरदस्ती चेहरों को खिला हुआ दिखाती है। वैसे सभी अपनी उलझनों में उलझे नज़र आते हैं। हर किसी को कभी घर तो कभी ऑफ़िस पहुँचने की जल्दी रहती है। इन सब के बीच किसी ने भी दादाजी को बाहर जाते नहीं देखा।
मैं बहुत चिंतित था गली के नुक्कड़ तक गया वहाँ दादा जी की फोटो दिखाकर दुकानदारों से पूछा तो एक आदमी ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले ही उसने उन्हें मेन रोड पर जाते हुए देखा है। यह सुनते ही मैं तो पसीने-पसीने हो गया मुझे अनहोनी कि आशंका होने लगी। कहीं कोई एक्सीडेंट ना हो जाए और अपनी बाइक लेकर में रोड की तरफ़ गया। वहाँ एक आदमी के पास उन्हें बैठा देख मैंने चैन की साँस ली। बाइक जल्दी से खड़ी कर दौड़ कर दादा जी के पास पहुँचा—उन्हें सही हालत में देखकर ही मुझे सुकून मिला। वह भी मुझे देखकर मुस्कुरा उठे। वहाँ उनके पास बैठे उसे भले आदमी ने बताया, “दादाजी सड़क के बीच खड़े होकर सोच रहे थे कि वह सड़क पर किधर जायें। वह सड़क पार नहीं कर पा रहे थे। उनकी यह हालत देख मैंने उन्हें हाथ पकड़कर यहाँ फ़ुटपाथ पर पेड़ के नीचे बैठा दिया। बहुत देर से इनको घर का पता पूछ रहा हूँ लेकिन यह सही से कुछ बता नहीं पा रहे हैं। इन्हें कुछ याद रहा कुछ भूल गए वैसे इनका ख़्याल रखा करो। इस अवस्था में इनका अकेले घूमना ठीक नहीं। अच्छा हुआ! बेटा तुम आ गए।”
मैंने सहमति से गर्दन हिला दी और उन्हें दादाजी का ध्यान रखने के लिए धन्यवाद दिया।
दादाजी को बाइक पर बैठाकर घर ले आया। घर पर मम्मी और दीदी सभी परेशान थे। दादा जी के भूलने की बीमारी के कारण उन्हें कभी भी अकेला बाहर नहीं जाने दिया जाता था लेकिन उस दिन कामवाली बाहर गई तो गेट बंद न कर पाए दादाजी गेट खुला देख न जाने कब बाहर निकल गए।
अभी कुछ समय से ही दादाजी बहुत कुछ भूलने लगे थे। उन्हें खाना खाने के बाद भी लगता कि उन्होंने खाना नहीं खाया—दोबारा खाना माँगते, नहीं देने पर ग़ुस्सा करते। मम्मी को बार-बार खाना लगाने को कहते हैं। जब मम्मी कहती कि आपने खाना खा लिया तो मम्मी पर ही आरोप लगाकर पापा से कहते हैं कि देख आज बहू ने मुझे भूखा मार दिया अभी तक खाना नहीं दिया। उनकी तृप्ति के लिए पापा, मम्मी से दोबारा खाना लगवाते और वह दोबारा खाना खाकर ही संतुष्ट होते।
कभी-कभी दोबारा नहाने चले जाते हैं कभी सुबह को शाम को शाम को सुबह कहते। शुरूआत में हमारे नाम व अपनी चीज़ रखकर भूल जाते थे फिर मुझे और दीदी को कहते बेटा देखना कहाँ रख दिया। ना जाने कब यह छोटी-छोटी भूल बड़ी भूल बनती जा रही थी। अब तो हद हो गई थी।
आख़िर एक दिन पापा के एक मित्र ने उन्हें सलाह दी कि किसी साइकोलॉजिस्ट को दिखाओ। पापा उन्हें डॉक्टर के पास लेकर गए तो उसने बताया की यह डिमेंशिया है जो ज़्यादातर बड़ी उम्र के लोगों में हो जाता है। उन्होंने कुछ दवा दी उसे पूरा तो नहीं लेकिन कुछ हद तक आराम मिला अब दादाजी की जेब में हमेशा एक डायरी रखते हैं जिससे घर का पता और मोबाइल नंबर दर्ज है। ना जाने कब हमसे भूल हो जाए और दादाजी अगर घर से बाहर निकल जाएँ तो मैं उन्हें वापस अपने घर ले आऊँ। मैं उन्हें इस हालत में खोना नहीं चाहता। न जाने कितने वृद्ध इस दौर से गुज़र रहे होंगे कुछ के पास उनके अपने होंगे और कुछ अपनों को खो चुके होंगे। घूमते होंगे बेसहारा किसी फ़ुटपाथ पर, देखकर लोग कहते होंगे बेचारों को इस अवस्था में किसने घर से बेघर कर दिया। वे भूल गए होंगे उम्र के इस दौर में अपना पता अपना नाम अपना शहर।