एकलव्य कविता-2

01-01-2026

एकलव्य कविता-2

डॉ. ज़हीर अली सिद्दीक़ी  (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

द्रोण का आदर्श भी 
एक मोल से मैला हुआ 
मलिन मन उस मैल से 
गंदा पड़ा है आज भी . . . 
 
मोल पर इतिहास भी 
तब मौन होकर रह गई 
जब गुरु का गौरव भी 
गुमनाम होकर रह गया . . . 
 
बिन गुरु, तिरस्कार भी 
पर धनुर्धर था श्रेष्ठतम 
दक्षिणा क्यों माँगना
जब दायरा था न्यूनतम . . . 
 
उदय होता सूर्य भी 
अस्त छल से हो गया 
बिखरी किरणें आज भी 
उपहास करती रह गयीं . . . 
 
अतीत में दबा हुआ 
किरदार ज़िन्दा आज भी 
प्रश्न करता दिख रहा 
गुरुओं से गुरुकुल धाम की . . . 

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