एकलव्य कविता-2
डॉ. ज़हीर अली सिद्दीक़ी
द्रोण का आदर्श भी
एक मोल से मैला हुआ
मलिन मन उस मैल से
गंदा पड़ा है आज भी . . .
मोल पर इतिहास भी
तब मौन होकर रह गई
जब गुरु का गौरव भी
गुमनाम होकर रह गया . . .
बिन गुरु, तिरस्कार भी
पर धनुर्धर था श्रेष्ठतम
दक्षिणा क्यों माँगना
जब दायरा था न्यूनतम . . .
उदय होता सूर्य भी
अस्त छल से हो गया
बिखरी किरणें आज भी
उपहास करती रह गयीं . . .
अतीत में दबा हुआ
किरदार ज़िन्दा आज भी
प्रश्न करता दिख रहा
गुरुओं से गुरुकुल धाम की . . .
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