पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार

पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

एक जननायक की संघर्षगाथा

 

‘भारत रत्न के दावेदार (तालचेर प्रजामण्डल आंदोलन के अमर नायक पबित्र मोहन प्रधान के क्रांतिकारी जीवन की अमर गाथा)’ हिंदी साहित्य के उत्कृष्ट ऐतिहासिक उपन्यासों की श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त करने की पूर्ण संभावनाएँ रखता है,ऐसा विश्वास इस कृति के गहन अध्ययन से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है।

अनुवादक, कथाकार और उपन्यासकार दिनेश कुमार माली द्वारा जब इस उपन्यास की भूमिका लिखने हेतु मुझे यह कृति प्रेषित की गई, तब मैंने इसे एक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार करते हुए गंभीरता से इसका अध्ययन प्रारम्भ किया। वस्तुतः ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर ‘शहीद बिका नाएक’ के उपरान्त यह उनका द्वितीय उपन्यास है, जो उनके सृजनात्मक विकास की निरंतरता को प्रमाणित करता है।

उपन्यास की चर्चा से पूर्व दिनेश कुमार माली के संदर्भ में यह कहना समीचीन होगा कि वे समकालीन हिंदी साहित्य के उन प्रमुख रचनाकारों में हैं, जिनकी साहित्यिक यात्रा बहुआयामी एवं सशक्त है। एक ओर वे कथाकार के रूप में मानवीय संबंधों, सामाजिक विडंबनाओं तथा परिवर्तित होते समय की जटिलताओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर अनुवादक के रूप में वे ओड़िया भाषा के श्रेष्ठ साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु निर्मित कर रहे हैं। उनके अनुवादों में मूल कृति की आत्मा अक्षुण्ण रहते हुए सहज, प्रवाहमयी एवं प्रभावसंपन्न हिंदी का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

उनकी कहानियों में जीवन का ठोस यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं की गहनता तथा भाषा की सादगी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे अनावश्यक अलंकरणों से परे रहकर सीधे, मार्मिक और संप्रेषणीय शैली में अपनी बात कहने में समर्थ हैं। उनके उपन्यासों एवं कहानियों में समकालीन समाज की समस्याएँ, व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व तथा परिवेश की परिवर्तित संरचनाओं का सूक्ष्म एवं प्रभावपूर्ण चित्रण मिलता है। यही विशेषताएँ इस उपन्यास में भी सम्यक् रूप से परिलक्षित होती हैं।

समकालीन हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक उपन्यासों की स्थिति बहुआयामी, पुनर्मूल्यांकनपरक तथा वैचारिक रूप से अत्यंत सक्रिय रूप में उभरकर सामने आई है। यदि प्रारंभिक हिंदी ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहास मुख्यतः गौरवगान, राष्ट्रीय चेतना के जागरण तथा अतीत की महिमा के पुनर्स्मरण का माध्यम था, तो आज यही विधा आलोचनात्मक दृष्टि, प्रश्नाकुलता और बहुवचनात्मकता से समृद्ध एक सशक्त विमर्श के रूप में विकसित हो चुकी है। समकालीन ऐतिहासिक उपन्यास इतिहास को स्थिर एवं निर्विवाद सत्य के रूप में न देखकर, उसे व्याख्यायित, पुनर्लिखित तथा बहुस्तरीय अनुभव के रूप में ग्रहण करता है।

वर्तमान हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक उपन्यासों का प्रमुख रुझान ‘इतिहास के हाशिए’ की ओर उन्मुख है। अब कथा का केंद्र केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता-परिवर्तनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसमें सामान्य जन, स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी तथा उपेक्षित वर्गों की उपस्थिति सशक्त रूप से अभिव्यक्त होने लगी है। इस प्रकार इतिहास के मौन पृष्ठों को स्वर प्रदान करने का जो रचनात्मक प्रयास समकालीन लेखन में दिखाई देता है, वह न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, अपितु सामाजिक और वैचारिक परिप्रेक्ष्य में भी अत्यंत सार्थक सिद्ध होता है।

उपेक्षित समुदायों के अनुभवों को भी समुचित और समान महत्व प्रदान किया जा रहा है। इस दृष्टि से समकालीन ऐतिहासिक उपन्यास इतिहास के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। यह उन स्वरहीन और उपेक्षित आवाज़ों को अभिव्यक्ति देता है, जो परम्परागत इतिहास-लेखन में प्रायः अनुपस्थित या हाशिये पर रखी गई थीं।

आधुनिक ऐतिहासिक उपन्यासों में तथ्य और कल्पना के अंतर्संबंध को भी नवीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित किया गया है। जहाँ पूर्वकाल में इतिहास को प्रायः दस्तावेज़ीय रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति प्रमुख थी, वहीं अब रचनाकार इतिहास के ‘रिक्त स्थानों’ को सृजनात्मक कल्पना के माध्यम से पूर्ण करते हैं। इस प्रक्रिया में वे केवल घटनाओं का पुनर्निर्माण नहीं करते, अपितु इतिहास के अंतरालों में निहित मानवीय द्वंद्व, मनोवैज्ञानिक जटिलताओं तथा सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को भी उजागर करते हैं। फलस्वरूप ऐतिहासिक उपन्यास ‘रचनात्मक इतिहास-विमर्श’ का एक सशक्त रूप धारण कर लेता है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में यह उपन्यास इतिहास और सत्ता के अंतर्संबंधों की आलोचनात्मक समीक्षा भी करता है। यह प्रश्न उठाता है कि इतिहास का लेखन किसके द्वारा, किन उद्देश्यों से और किन दृष्टियों के अंतर्गत किया गया, तथा किन वर्गों को उसमें स्थान नहीं मिला। इस प्रकार यह विधा केवल अतीत का पुनर्सृजन नहीं करती, बल्कि वर्तमान की वैचारिक संरचनाओं को भी चुनौती प्रदान करती है। इतिहास के माध्यम से यह समकालीन सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है।

भाषा और शिल्प की दृष्टि से दिनेश जी ने संवादप्रधान, बहुस्तरीय तथा स्थानीय रंग-रूप से संपन्न शैली का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। कथानक में समय की रैखिकता का अतिक्रमण करते हुए स्मृति, फ़्लैशबैक तथा बहुदृष्टिकोण जैसी तकनीकों का प्रयोग किया गया है, जिससे उपन्यास का रूप अधिक जीवन-समीप और यथार्थोन्मुख प्रतीत होता है।

वस्तुतः समकालीन हिंदी ऐतिहासिक उपन्यास के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए दिनेश जी ने अपनी सृजनात्मक यात्रा के लिए एक विशिष्ट पथ का अन्वेषण किया है। इतिहास के प्रति उनकी गंभीर वैचारिक संवेदनशीलता उन्हें एक उत्तरदायी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित करती है, जिसके कारण वे ‘तथ्य’ और ‘कल्पना’ के मध्य संतुलन स्थापित करने में सफल रहे हैं। इतिहास के राजनैतिक उपयोग और दुरुपयोग के इस युग में निष्पक्षता तथा संवेदनशीलता को अक्षुण्ण बनाए रखना किसी भी लेखक के लिए एक कठिन साधना है, जिसे उन्होंने साधने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

समकालीन हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक उपन्यास एक जीवंत, गतिशील और निरंतर विकसित होती विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो रहा है। यह केवल अतीत का पुनर्पाठ नहीं करता, बल्कि वर्तमान की चेतना को समृद्ध करते हुए भविष्य के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधार भी निर्मित करता है। इस प्रकार ऐतिहासिक उपन्यास साहित्य, इतिहास और समाज के मध्य एक सशक्त सेतु का कार्य करता है, और दिनेश जी ने इस कृति के माध्यम से इस परंपरा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित किया है। नि:संदेह, अतीत मात्र बीत चुका समय नहीं, बल्कि वर्तमान की संरचना में सक्रिय एक जीवंत तत्त्व है।

भारतीय साहित्य की दीर्घ और बहुरंगी परंपरा में इतिहास, स्मृति और संघर्ष का जो त्रिवेणी-संगम निरंतर प्रवाहित होता रहा है, वह केवल अतीत के गौरवगान तक सीमित नहीं रहता, अपितु वर्तमान की संवेदनाओं को आलोकित करते हुए भविष्य के लिए एक सशक्त दिशाबोध का सृजन करता है। यह संगम कभी महाकाव्यों की विराटता में, कभी लोकगाथाओं की सहजता में और कभी आधुनिक उपन्यासों की वैचारिक जटिलता में अपनी विविध अभिव्यक्तियाँ पाता रहा है।

इसी सृजनधर्मी परंपरा के अंतर्गत दिनेश कुमार माली अपने इस द्वितीय ऐतिहासिक उपन्यास ‘भारत रत्न के दावेदार (तालचेर प्रजामण्डल आंदोलन के अमर नायक पबित्र मोहन प्रधान के क्रांतिकारी जीवन की अमर गाथा)’ के साथ एक महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट कड़ी के रूप में उपस्थित हुए हैं। यह कृति इस सत्य का सशक्त प्रतिपादन करती है कि साहित्य मात्र इतिहास का अनुकरण नहीं करता, अपितु उसका पुनर्सृजन करते हुए उसमें निहित मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों और स्वप्नों को नवीन अर्थवत्ता प्रदान करता है।

यह उपन्यास अपने संरचनात्मक स्वरूप में बहुस्तरीय है; एक ओर यह जीवनीपरक उपन्यास की विधा का सफल निर्वाह करता है, तो दूसरी ओर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस उपेक्षित एवं अपेक्षाकृत अल्पज्ञात अध्याय को उद्घाटित करता है, जिसे मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो सका। सामान्यतः स्वतंत्रता संग्राम का आख्यान राष्ट्रीय नेताओं, महानगरों और व्यापक राजनैतिक आंदोलनों तक सीमित कर दिया जाता है; किन्तु यह कृति उस भूगोल, उस समाज और उस संघर्ष को केंद्र में प्रतिष्ठित करती है, जहाँ स्वतंत्रता का अर्थ केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि सामन्ती शोषण, सामाजिक विषमता तथा आर्थिक अन्याय से मुक्ति भी है। इस प्रकार यह उपन्यास स्वतंत्रता की अवधारणा को व्यापक और बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करता है।

पबित्र मोहन प्रधान का जीवन इस कृति में मात्र एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व का जीवन-वृत्त न होकर एक समग्र युग-संघर्ष का सजीव प्रतीक बनकर उभरता है। वे न तो सत्ता-समर्थित नायक हैं और न ही किसी विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग के प्रतिनिधि; अपितु वे उस सामान्य जन के प्रवक्ता हैं, जिसकी पीड़ा और प्रतिरोध की गाथाएँ प्रायः इतिहास के औपचारिक अभिलेखों में उपेक्षित रह जाती हैं। उनके व्यक्तित्व में जननायक की वह गरिमा, प्रतिबद्धता और नैतिक दृढ़ता विद्यमान है, जो निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सामूहिक मुक्ति के आदर्श को आत्मसात करती है। इस प्रकार यह उपन्यास ‘नायक’ की परंपरागत अवधारणा का अतिक्रमण करते हुए उसे एक नवीन, जनोन्मुख और लोकतांत्रिक अर्थ प्रदान करता है।

कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका गहन सामाजिक यथार्थबोध है। दिनेश जी ने तालचेर प्रजामण्डल आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में न केवल राजनैतिक घटनाओं का चित्रण किया है, अपितु उस समय के सामाजिक ताने-बाने, आर्थिक विषमताओं तथा सांस्कृतिक परिवेश का भी अत्यंत संवेदनशील और सूक्ष्म अंकन किया है। सामन्ती अत्याचार, कर-प्रणाली की कठोरता, कारागारों की अमानवीय परिस्थितियाँ तथा जनसामान्य की दयनीय जीवनावस्था, ये सभी तत्व कथा को सशक्त यथार्थपरक आधार प्रदान करते हैं। यहाँ इतिहास केवल सत्ता-परिवर्तन की कथा नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य की गरिमा और अधिकारों के लिए संचालित सतत संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़ बन जाता है।

उपन्यास का एक अत्यंत आकर्षक और प्रभावकारी पक्ष इसका प्रकृति एवं लोकजीवन से गहरा संबंध भी है। ब्राह्मणी नदी का अविरल प्रवाह, ग्रामीण परिवेश की सहजता, वन्य जीवन की सजीवता तथा मनुष्य और प्रकृति के मध्य स्थापित आत्मीय संबंध,ये सभी तत्व कथा को मात्र ऐतिहासिक वृत्तांत न रहने देकर उसे संवेदनात्मक ऊष्मा से संपृक्त करते हैं। फलतः यहाँ इतिहास निर्जीव तथ्यों का संकलन न रहकर स्मृतियों, अनुभवों और सामूहिक चेतना के माध्यम से एक सजीव अनुभूति में रूपांतरित हो उठता है।

दिनेश जी ने सरल, प्रवाहमयी तथा संवादप्रधान शैली का अवलंबन करते हुए कथ्य को जिस प्रभावसंपन्न ढंग से प्रस्तुत किया है, वह उपन्यास को विशिष्ट गहनता प्रदान करता है। स्थान-स्थान पर भाषा में लोकभाषा की सुषमा तथा सांस्कृतिक संदर्भों की स्वाभाविक उपस्थिति इसे और अधिक प्रामाणिक एवं जीवन्त बनाती है। यह शैली पाठक को मात्र घटनाओं का निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देती, अपितु उसे कथा-प्रवाह के भीतर एक सक्रिय सहभागी के रूप में आत्मसात कर लेती है।

विशेषतः वर्तमान समय में, जब इतिहास के विविध पक्ष पुनर्व्याख्या और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रियाओं से गुज़र रहे हैं, ऐसी कृतियों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। यह उपन्यास न केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के साथ न्याय करने का प्रयास करता है, बल्कि उन असंख्य अनाम नायकों की स्मृति को भी पुनर्जीवित करता है, जिन्होंने स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। इस दृष्टि से यह कृति एक साहित्यिक सृजन मात्र नहीं, बल्कि एक सशक्त सांस्कृतिक और वैचारिक दस्तावेज़ भी है।

अतः प्रस्तुत भूमिका का उद्देश्य इस उपन्यास की साहित्यिक, ऐतिहासिक तथा वैचारिक महत्ता को रेखांकित करना है, ताकि पाठक इसके अध्ययन के दौरान केवल एक कथा का आस्वादन न करें, बल्कि उस व्यापक युगबोध, जन-संघर्ष और मानवीय संवेदना को भी समझ सकें, जो इसकी आत्मा में अंतर्निहित है। यह उपन्यास न केवल अतीत का पुनर्स्मरण है, अपितु वर्तमान के लिए प्रेरणा तथा भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी प्रदान करता है, जहाँ न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की प्रतिष्ठा ही अंतिम लक्ष्य के रूप में अभिव्यक्त होती है।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में यदि हिंदी के ऐतिहासिक उपन्यासों पर दृष्टिपात किया जाए, तो प्रायः अतीत को राजाओं, युद्धों और वीरगाथाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है; किन्तु यह कृति उस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे एक नवीन आयाम से समृद्ध करती है। यहाँ इतिहास का केंद्र राजमहलों से हटकर ग्राम्य जीवन की पगडंडियों, कृषक वर्ग के संघर्षों और सामान्य जन के जीवन-संघर्ष पर अवस्थित हो जाता है। यह परिवर्तन केवल विषयवस्तु का ही नहीं, अपितु दृष्टिकोण का भी द्योतक है।

इस कृति में निहित वैचारिक ऊर्जा भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह केवल घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन नहीं करती, बल्कि उनके अंतःस्थित सामाजिक शक्तियों, सत्ता-संरचनाओं तथा मानवीय मूल्यों की गंभीर पड़ताल करती है। सामन्ती व्यवस्था के अत्याचार, जनजीवन की विषमता, शिक्षा एवं जागरूकता का महत्व तथा संगठन की शक्ति, इन सभी पक्षों का सशक्त एवं गहन चित्रण कथा के माध्यम से किया गया है। यह कृति पाठक को केवल जानकारी प्रदान नहीं करती, बल्कि उसे विचार करने, प्रश्न उठाने तथा अपने समय की जटिलताओं को समझने के लिए प्रेरित भी करती है।

साथ ही, इस उपन्यास में नैतिकता और आदर्शवाद का जो स्वर उभरता है, वह इसे मात्र ऐतिहासिक आख्यान से ऊपर उठाकर एक प्रेरणात्मक कृति का स्वरूप प्रदान करता है। पबित्र मोहन प्रधान का चरित्र त्याग, निष्ठा, ईमानदारी और संघर्षशीलता के आदर्शों का ऐसा सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो आज के संदर्भ में भी समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरणादायी है। उनके जीवन का यह पक्ष इस कृति को एक नैतिक दस्तावेज़ के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ इतिहास और मूल्यबोध का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

निःसंदेह, यह कृति भारतीय साहित्य में इतिहासाधारित उपन्यासों की परंपरा को न केवल समृद्ध करेगी, बल्कि उसे एक नवीन दिशा प्रदान करने में भी समर्थ सिद्ध होगी। यह इतिहास को जनसामान्य के जीवन से अभिन्न रूप में जोड़ते हुए उसे अधिक लोकतांत्रिक, संवेदनशील तथा जीवन-सापेक्ष स्वरूप प्रदान करती है।

इसे और अधिक संवेदनशील तथा समकालीन संदर्भों में अधिक प्रासंगिक बनाती है। इस दृष्टि से यह कृति मात्र एक साहित्यिक रचना न रहकर सामाजिक चेतना का सशक्त दस्तावेज़ बन जाती है, जो अतीत के आलोक में वर्तमान को समझने और भविष्य के निर्माण की प्रेरणा प्रदान करती है।

यह तथ्य पूर्ववर्ती कुछ प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ इसके तुलनात्मक अध्ययन से और अधिक स्पष्ट हो उठता है। उदाहरणार्थ ‘झाँसी की रानी’, ‘मृगनयनी’ तथा ‘गढ़ कुंडार’ जैसे उपन्यास इतिहास को मुख्यतः वीरगाथात्मक एवं रोमांचप्रधान दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं। वृंदावनलाल वर्मा के साहित्य में इतिहास केवल तथ्यात्मक पुनर्रचना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कल्पना के सौंदर्य से अनुप्राणित एक जीवंत आख्यान का रूप धारण कर लेता है, जिसमें शौर्य, पराक्रम, प्रेम तथा राजनैतिक संघर्ष समन्वित होकर एक महाकाव्यात्मक वातावरण की सृष्टि करते हैं। उनके पात्र प्रायः असाधारण होते हैं; वे इतिहास के नायक के रूप में उभरते हैं, जिनका उद्देश्य केवल अपने राज्य या स्वत्व की रक्षा करना नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतिष्ठा करना भी होता है।

इस संदर्भ में ‘झाँसी की रानी’ का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहाँ लक्ष्मीबाई का चरित्र केवल वीरता और त्याग का प्रतीक ही नहीं, अपितु औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध भारतीय आत्मसम्मान की सजीव प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार ‘मृगनयनी’ तथा ‘गढ़ कुंडार’ में भी इतिहास के साथ रोमांस और साहसिकता का ऐसा समन्वय दृष्टिगोचर होता है, जो पाठक को अतीत की एक गौरवमयी और आदर्शोन्मुख दुनिया में ले जाता है। यहाँ कल्पना इतिहास को विस्तार प्रदान करती है, उसे सौंदर्यबोध से संपन्न करती है और एक प्रकार का आदर्शवादी लोक रचती है।

किन्तु पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित यह कृति इस परंपरा से एक स्पष्ट एवं निर्णायक विचलन प्रस्तुत करती है। यहाँ इतिहास को किसी राजसी वैभव, युद्ध-वीरता या रोमांचकारी घटनाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि जनपदीय यथार्थ के धरातल पर प्रतिष्ठित किया गया है। कथा का केंद्र राजमहलों, क़िलों और दरबारों से हटकर गाँवों, खेतों, नदियों तथा सामान्य जनजीवन की ओर स्थानांतरित हो जाता है। यहाँ संघर्ष तलवारों का नहीं, बल्कि चेतना का है; यहाँ युद्ध रणभूमि में नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध लड़ा जाता है।

इस कृति में कल्पना का प्रयोग भी एक भिन्न और विशिष्ट स्वरूप ग्रहण करता है। यह कल्पना इतिहास को अलंकृत करने के बजाय उसे अधिक सजीव, मानवीय और विश्वसनीय बनाने का कार्य करती है। ब्राह्मणी नदी के तट, ग्रामीण परिवेश तथा जनजीवन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ, ये सभी तत्व कथा को संवेदनात्मक गहराई से संपृक्त करते हैं। यहाँ कल्पना इतिहास के रिक्त स्थानों की पूर्ति अवश्य करती है, परंतु उसे अतिनाटकीय या अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं बनाती; अपितु वह इतिहास की आत्मा के अधिक समीप पहुँचने का माध्यम बन जाती है।

जहाँ ‘झाँसी की रानी’ में लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं, वहीं पबित्र मोहन प्रधान का चरित्र एक भिन्न प्रकार की नायक-परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। वे किसी राजसत्ता के उत्तराधिकारी नहीं, अपितु जनसामान्य के बीच से उदित एक साधारण व्यक्ति हैं, जो अपने संघर्ष, त्याग और प्रतिबद्धता के बल पर जननायक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। यह परिवर्तन हिंदी ऐतिहासिक उपन्यासों के विकासक्रम में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह ‘महान व्यक्तियों के इतिहास’ से ‘जनता के इतिहास’ की ओर संक्रमण का सशक्त संकेतक है।

इस दृष्टि से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि दिनेश जी का यह उपन्यास इतिहास और कल्पना के अंतःसंवाद को एक नवीन दिशा प्रदान करता है, जहाँ इतिहास का प्रयोजन केवल अतीत का पुनर्निर्माण भर नहीं रह जाता, अपितु वर्तमान के सामाजिक यथार्थ को समझने तथा उसे परिवर्तित करने की प्रेरणा देना भी बन जाता है।

यदि बंकिमचंद्र के ‘आनंदमठ’ की चर्चा की जाए, तो यह भारतीय उपन्यास-परंपरा की एक ऐसी महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसने राष्ट्रवाद के भावनात्मक एवं सांस्कृतिक आधार को गहन रूप से प्रभावित किया। संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में रचित इस उपन्यास में मातृभूमि को देवी के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए ‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से एक आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास किया गया है। यह कृति अपने समय में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का सशक्त स्वर बनकर उभरी तथा उसने भारतीय मानस में स्वतंत्रता की चेतना के बीज रोपे। यहाँ इतिहास का उपयोग प्रतीकात्मक एवं आदर्शवादी रूप में हुआ है, जहाँ पात्र और घटनाएँ यथार्थ से अधिक एक उच्चतर आदर्श की प्रतिष्ठा के लिए प्रयुक्त होती हैं।

इसके विपरीत, पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित दिनेश जी का यह उपन्यास एक जीवनीपरक ऐतिहासिक कृति के रूप में अभिव्यक्त होता है, जिसमें ओड़िशा के तालचेर प्रजामंडल आंदोलन तथा देशी रियासतों के विरुद्ध जनसंघर्ष का यथार्थपरक चित्रण किया गया है। इस उपन्यास में इतिहास केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कथानक का मूलाधार है। दिनेश जी ने दस्तावेज़ों, ऐतिहासिक घटनाओं और जनस्मृतियों के आधार पर एक ऐसे जननायक की जीवनगाथा का सृजन किया है, जिसने शोषण, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संगठित संघर्ष का नेतृत्व किया। यहाँ राष्ट्रवाद किसी देवी-आराधना या आध्यात्मिक आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि जनमुक्ति और अधिकारों की प्राप्ति के रूप में प्रतिपादित होता है।

इन दोनों कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन भारतीय राष्ट्रवाद की विकास-यात्रा को समझने का एक सशक्त माध्यम प्रदान करता है। एक ओर ‘आनंदमठ’ में राष्ट्र की परिकल्पना एक सांस्कृतिक-धार्मिक सत्ता के रूप में की गई है, तो दूसरी ओर दिनेश जी का यह उपन्यास राष्ट्र को जनजीवन, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं तथा सामाजिक न्याय के साथ अभिन्न रूप से जोड़ता है। जहाँ ‘आनंदमठ’ भावनात्मक एवं प्रतीकात्मक स्तर पर राष्ट्रचेतना को जागृत करता है, वहीं यह जीवनीपरक उपन्यास उस चेतना को ठोस सामाजिक एवं राजनैतिक धरातल पर मूर्त रूप प्रदान करता है।

साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भी दोनों कृतियाँ भिन्न-भिन्न शैलियों एवं अभिव्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ‘आनंदमठ’ की भाषा काव्यात्मक, अलंकारपूर्ण तथा भावप्रधान है, जिसमें प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से एक आदर्शलोक का सृजन किया गया है; इसके विपरीत, पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित यह उपन्यास सरल, संवादप्रधान तथा प्रलेखात्मक शैली में रचित है, जो पाठक को सीधे घटनाओं और परिस्थितियों से संबद्ध करता है। इस भिन्नता के माध्यम से यह भी स्पष्ट होता है कि समय के साथ साहित्य की भाषा और शिल्प में निरंतर परिवर्तन होता रहता है।

यह तुलनात्मक विवेचन इस तथ्य को भी रेखांकित करता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एकरेखीय या एकरूप नहीं था, बल्कि उसमें विविध विचारधाराएँ, संघर्ष-प्रणालियाँ और दृष्टिकोण समानांतर रूप से सक्रिय थे। ‘आनंदमठ’ उस आंदोलन के भावनात्मक एवं सांस्कृतिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित यह उपन्यास उसके जनवादी, यथार्थपरक तथा सामाजिक न्यायोन्मुख लोकतांत्रिक स्वरूप को उद्घाटित करता है।

इस प्रकार दोनों कृतियाँ संयुक्त रूप से भारतीय राष्ट्रवाद के बहुआयामी चरित्र को उजागर करती हैं। इन दोनों उपन्यासों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इतिहास, राष्ट्र और समाज के प्रति उनकी दृष्टियाँ किस प्रकार भिन्न होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक सिद्ध होती हैं। प्रस्तुत भूमिका का उद्देश्य इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट करना है, जिससे आगे के अध्ययन में इन कृतियों की तुलनात्मक समीक्षा अधिक सार्थक, सुविस्तृत और गहन रूप में संपन्न हो सके।

विषय को और विस्तार प्रदान करते हुए यदि अन्य ऐतिहासिक उपन्यासों की ओर दृष्टिपात किया जाए, तो आचार्य चतुरसेन शास्त्री ‘वैशाली की नगरवधू’, ‘सोमनाथ’ तथा ‘वयं रक्षामः’ जैसे उपन्यासों में इतिहास को एक गहन वैचारिक एवं दार्शनिक दृष्टि से निरूपित करते हैं। उनके यहाँ इतिहास मात्र घटनाओं का अनुक्रम नहीं, अपितु विचारों का संघर्ष, सभ्यताओं का अंतर्द्वंद्व तथा धर्म और संस्कृति की जटिल संरचनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण है।

‘वैशाली की नगरवधू’ में सामाजिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्त्री की स्थिति के प्रश्नों का गहन अन्वेषण किया गया है; ‘सोमनाथ’ में धार्मिक आस्था, आक्रमण और सांस्कृतिक अस्मिता के द्वंद्व का प्रभावपूर्ण चित्रण मिलता है; और ‘वयं रक्षामः’ में प्राचीन आर्य-अनार्य संघर्ष के माध्यम से सभ्यता के विकास की जटिल प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास किया गया है। इन उपन्यासों में रचनाकार इतिहास के अंतर्निहित वैचारिक सूत्रों को उद्घाटित करते हुए पाठक को एक गहन बौद्धिक विमर्श की ओर उन्मुख करता है।

इसके विपरीत, पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित दिनेश जी का यह उपन्यास वैचारिकता को किसी सैद्धांतिक अथवा दार्शनिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसे प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ और जीवन-संघर्ष के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। उनके यहाँ विचार कोई अमूर्त सत्ता न होकर जीवन की ठोस परिस्थितियों से उद्भूत अनुभव है। सामन्ती अत्याचार, आर्थिक विषमता तथा सामाजिक अन्याय, ये सभी तत्व विचारधारा को जन्म देते हैं और उसी के आधार पर संघर्ष की दिशा निर्धारित होती है।

यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं रह जाता कि सभ्यता का उत्थान-पतन किन ऐतिहासिक कारणों से हुआ, बल्कि यह है कि एक साधारण मनुष्य अपने परिवेश में व्याप्त अन्याय के प्रति किस प्रकार जागरूक होता है, कैसे संगठित होता है और अंततः परिवर्तन का वाहक बनता है। इस दृष्टि से यह कृति इतिहास को ‘जीवंत सामाजिक क्रिया’ के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ प्रत्येक घटना किसी व्यापक सामाजिक प्रक्रिया से संबद्ध होती है और प्रत्येक संघर्ष एक गहन परिवर्तन की ओर संकेत करता है।

इसके अतिरिक्त, जहाँ आचार्य चतुरसेन के उपन्यासों में पात्र प्रायः किसी विशिष्ट विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में उभरते हैं, वहीं इस कृति में पात्र अपने पूर्ण मानवीय स्वरूप में उपस्थित होते हैं, उनकी कमज़ोरियाँ, दुविधाएँ, संवेदनाएँ और संघर्ष, सभी कथा के अभिन्न अंग बनकर सामने आते हैं। परिणामतः यह कृति अधिक यथार्थपरक, विश्वसनीय और जीवन-समीप प्रतीत होती है।

फलतः यह कृति आचार्य चतुरसेन की वैचारिक ऐतिहासिकता से भिन्न होते हुए भी उसे एक नवीन दिशा में विकसित करती है। यह दर्शन को जीवन में अवतरित करती है, विचार को क्रिया में रूपांतरित करती है और इतिहास को एक सक्रिय सामाजिक प्रक्रिया के रूप में प्रतिष्ठित करती है,यही इसकी मौलिकता और साहित्यिक महत्ता का मूलाधार है।

इसी क्रम में यदि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की कृतियों पर दृष्टिपात किया जाए, तो हिंदी साहित्य में ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘चारु चंद्रलेख’ इस तथ्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं कि इतिहास को केवल घटनाओं के अनुक्रम के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के व्यापक परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार देखा जा सकता है। द्विवेदी जी के यहाँ इतिहास एक जीवंत सांस्कृतिक धारा के रूप में प्रवाहित होता है, जिसमें अतीत के व्यक्ति, विचार, परम्पराएँ और भावनाएँ काव्यात्मक भाषा के माध्यम से पुनर्सृजित होती हैं। उनकी रचनाओं में भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि एक विशिष्ट सौंदर्यबोध का सृजन करती है, ऐसा सौंदर्यबोध, जो पाठक को इतिहास के अंतरंग में प्रवेश करने के लिए आमंत्रित करता है।

उनके उपन्यासों में पात्र अपने-अपने समय की सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि के रूप में उभरते हैं। वे इतिहास को पुनर्जीवित करते हुए उसमें मानवीय करुणा, प्रेम, सौंदर्य और बौद्धिक जिज्ञासा के तत्त्वों का समावेश करते हैं। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में बाण का आत्मसंवाद केवल एक व्यक्ति का जीवन-वृत्तांत नहीं, बल्कि उस युग की सांस्कृतिक आत्मा का अन्वेषण बन जाता है। इसी प्रकार ‘चारु चंद्रलेख’ में प्रेम, सौंदर्य और सांस्कृतिक विमर्श का जो समन्वय दिखाई देता है, वह इतिहास को एक कलात्मक ऊँचाई प्रदान करता है।

इसके विपरीत, पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित दिनेश जी का यह उपन्यास सांस्कृतिक तत्त्वों से संपन्न होते हुए भी अपनी अभिव्यक्ति में अधिक यथार्थपरक और धरातलीय है। यहाँ प्रकृति, विशेषतः ब्राह्मणी नदी, के साथ मनुष्य का आत्मीय संबंध, ग्राम्य जीवन की सहजता, लोकसंस्कृति की लयात्मकता तथा जनजीवन की स्वाभाविक गति कथा के अभिन्न अंग बनकर उपस्थित होते हैं; तथापि यह सौंदर्य किसी बाह्य अलंकरण के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की प्रामाणिक सच्चाई के रूप में अभिव्यक्त होता है। यहाँ भाषा में काव्यात्मकता की अपेक्षा सादगी और प्रामाणिकता का अधिक महत्व है, जो जनजीवन के अधिक समीप प्रतीत होती है।

द्विवेदी जी जहाँ इतिहास को सौंदर्य और सांस्कृतिक बोध के माध्यम से पुनर्सृजित करते हैं, वहीं यह कृति इतिहास को संघर्ष, प्रतिरोध और परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में सजीव बनाती है। यहाँ सौंदर्य भी विद्यमान है, पर वह संघर्ष से पृथक नहीं; अपितु उसी के भीतर से प्रस्फुटित होता है। इस प्रकार यह कृति द्विवेदी की परंपरा का विस्तार करते हुए उसे एक नवीन सामाजिक आयाम से जोड़ती है, जहाँ संस्कृति केवल अतीत की स्मृति न रहकर वर्तमान के संघर्षों में सक्रिय शक्ति के रूप में अभिव्यक्त होती है।

इसी संदर्भ में हिंदी के प्रगतिशील उपन्यासकार यशपाल की कृतियों, ‘अमिता’ तथा ‘झूठा सच’, की चर्चा भी समीचीन है। यशपाल इन उपन्यासों के माध्यम से इतिहास को सामाजिक यथार्थ, वैचारिक संघर्ष और मानवीय त्रासदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। विशेषतः ‘झूठा सच’ में विभाजन की पृष्ठभूमि में मनुष्य की विखंडित होती पहचान, विस्थापन की पीड़ा तथा सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन की गहन अनुभूति अत्यंत मार्मिक रूप में उभरकर सामने आती है।

सामाजिक विघटन का अत्यंत मार्मिक और यथार्थपरक चित्रण यहाँ प्राप्त होता है। यशपाल के साहित्य में इतिहास किसी गौरवगाथा का विषय नहीं, अपितु एक कठोर यथार्थ के रूप में उपस्थित होता है, जिसमें मनुष्य अपनी परिस्थितियों से संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है।

यशपाल की दृष्टि में समाज निरंतर द्वंद्व और संघर्ष की अवस्था में स्थित है; वर्गीय विषमताएँ, राजनैतिक षड्यंत्र तथा नैतिक संकट,ये सभी उनके उपन्यासों के प्रमुख तत्त्व हैं। उनके पात्र आदर्शोन्मुख कम, यथार्थ से टकराने वाले अधिक हैं; वे टूटते हैं, बिखरते हैं, और इसी प्रक्रिया में अपने अस्तित्व की पहचान करने का प्रयत्न करते हैं।

इसी संदर्भ में पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित यह उपन्यास भी यथार्थवादी परंपरा का एक सशक्त विस्तार प्रतीत होता है। यहाँ भी समाज का विघटन, शोषण, अन्याय और संघर्ष स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं, सामन्ती अत्याचार, आर्थिक विषमता तथा जनजीवन की कठिनाइयाँ अत्यंत प्रभावपूर्ण ढंग से उभरती हैं। किन्तु इस कृति की विशिष्टता यह है कि यह केवल विघटन का चित्रण करके रुकती नहीं, बल्कि उससे उबरने की दिशा भी उद्घाटित करती है।

जहाँ यशपाल के यहाँ विभाजन की त्रासदी के कारण निराशा और विखंडन का स्वर अधिक मुखर हो उठता है, वहीं इस उपन्यास में संघर्ष के मध्य आशा, संगठन और परिवर्तन की संभावनाएँ सतत सक्रिय रहती हैं। पबित्र मोहन प्रधान का चरित्र इसी संभावना का सशक्त प्रतीक है; वे परिस्थितियों से पराजित नहीं होते, अपितु उन्हें परिवर्तित करने का संकल्प धारण करते हैं। इस प्रकार यह कृति यथार्थवाद को केवल ‘वेदना की अभिव्यक्ति’ तक सीमित न रखकर उसे ‘परिवर्तन की प्रेरणा’ में रूपांतरित करती है।

इसी क्रम में कमलेश्वर के ‘कितने पाकिस्तान’ का उल्लेख भी समीचीन है, जिसमें इतिहास को एक अभिनव संरचना,‘इतिहास की अदालत’, के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास में विभिन्न कालखंडों के पात्र अपने-अपने समय के निर्णयों और अपराधों के लिए एक काल्पनिक न्यायालय में उपस्थित होते हैं। यह संरचना इतिहास की परंपरागत अवधारणाओं को चुनौती देती है और यह प्रश्न उपस्थित करती है कि विभाजन केवल भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि मानसिक एवं वैचारिक प्रक्रिया भी है।

कमलेश्वर का मूल आग्रह यह है कि मनुष्य की विभाजनकारी प्रवृत्ति ही इतिहास की अनेक त्रासदियों का कारण रही है। धर्म, जाति, सत्ता और विचारधाराओं के नाम पर किए गए विभाजन मानवता को बार-बार आहत करते रहे हैं। ‘कितने पाकिस्तान’ इस प्रवृत्ति पर तीव्र प्रश्नचिह्न अंकित करता है और पाठक को आत्मालोचन की ओर प्रेरित करता है।

पबित्र मोहन प्रधान पर केंद्रित यह उपन्यास इस दृष्टि से भिन्न होते हुए भी उससे गहन स्तर पर संबद्ध है। यहाँ भी सत्ता, शोषण और अन्याय के प्रश्न उठाए गए हैं तथा इतिहास के अंतःस्थित संघर्षों को उद्घाटित किया गया है; किन्तु जहाँ कमलेश्वर का उपन्यास प्रश्नों के माध्यम से चेतना को झकझोरता है, वहीं यह कृति उन प्रश्नों के समाधान की दिशा में सक्रिय रूप से अग्रसर होती है।

यहाँ समाधान मात्र ‘आत्मालोचना’ में नहीं, अपितु ‘सक्रिय प्रतिरोध’ में निहित है। पबित्र मोहन प्रधान केवल प्रश्नोन्मुख नहीं रहते, बल्कि संगठन का निर्माण करते हैं, आंदोलन का सूत्रपात करते हैं और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार यह कृति इतिहास की पुनर्व्याख्या को एक व्यावहारिक धरातल प्रदान करती है, जहाँ विचार क्रिया में परिणत होता है और इतिहास सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उपकरण बन जाता है।

इन समस्त उपन्यासों की तुलना में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक अंतर ‘नायक’ की अवधारणा में दृष्टिगोचर होता है। हिंदी उपन्यास-परंपरा में नायक का स्वरूप कालक्रमानुसार निरंतर परिवर्तित होता रहा है, और यही परिवर्तन साहित्यिक विकास का द्योतक भी है।

वृंदावनलाल वर्मा के यहाँ नायक प्रायः राजसी एवं वीरगाथात्मक स्वरूप में उपस्थित होता है; वह सत्ता, शौर्य और पराक्रम का प्रतिनिधि है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के यहाँ नायक वैचारिक एवं दार्शनिक धरातल पर संघर्षशील है; वह विचारों और सिद्धांतों के स्तर पर जूझता हुआ दिखाई देता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के यहाँ नायक सांस्कृतिक एवं सौंदर्यपरक चेतना का संवाहक है, जो ज्ञान, संवेदना और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।

इसके विपरीत, यशपाल के यहाँ नायक संघर्षशील होने पर भी जीवन-स्थितियों से त्रस्त और विखंडित है; वह परिस्थितियों से जूझता है और अनेक बार उनसे पराजित भी होता है। कमलेश्वर के यहाँ नायक प्रश्नाकुल एवं आत्मसंघर्षरत है, जो इतिहास और समाज के प्रति निरंतर प्रश्नोन्मुख बना रहता है।

किन्तु दिनेश कुमार माली की कृति ‘पबित्र मोहन प्रधान… भारत रत्न के दावेदार’ में नायक इन सभी स्वरूपों से भिन्न एक ‘जननायक’ के रूप में उभरता है। वह न तो किसी विशिष्ट वर्ग का प्रतिनिधि है और न ही किसी सत्तात्मक संरचना का अंग; अपितु वह जनसामान्य के मध्य से उदित होता है, उसी के लिए संघर्ष करता है और अंततः स्वयं को उसी जनसमूह में विलीन कर देता है।

यह जननायक केवल स्वयं संघर्षरत नहीं रहता, बल्कि दूसरों को भी संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। वह नेतृत्व करता है, किन्तु सत्ता और संपदा के प्रति अनासक्त रहता है; वह त्याग करता है, किन्तु उसका उद्देश्य व्यक्तिगत यश की प्राप्ति नहीं, अपितु सामूहिक मुक्ति का संकल्प होता है। इस प्रकार यह कृति नायक की अवधारणा को लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान करती है, जहाँ नायक कोई असाधारण, अलौकिक व्यक्तित्व न होकर जनचेतना का सजीव प्रतिरूप बन जाता है।

इस परिप्रेक्ष्य में ‘पबित्र मोहन प्रधान… भारत रत्न के दावेदार’ केवल एक ऐतिहासिक या जीवनीपरक उपन्यास नहीं रह जाता, बल्कि हिंदी उपन्यास-परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रतिष्ठित होता है, जो इतिहास को जनसंघर्ष के परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करता है। यह कृति परंपरा का अनुसरण करते हुए भी उससे आगे बढ़ती है और उसे एक नवीन दिशा प्रदान करती है।

यह न तो मात्र अतीत का स्मरण है और न ही केवल प्रेरणात्मक आख्यान; अपितु यह इतिहास, समाज और मनुष्य के अंतर्संबंधों को नए सिरे से समझने का एक सशक्त प्रयास है। इसमें अतीत वर्तमान से संवाद करता है और वर्तमान भविष्य की संभावनाओं का निर्माण करता है।

यहाँ इतिहास ‘राजाओं की कथा’ से आगे बढ़कर ‘जनता की वाणी’ बन जाता है। यह वाणी केवल प्रतिरोध की ही नहीं, अपितु निर्माण की भी है,एक ऐसे समाज के निर्माण की, जहाँ न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के मूल्य प्रतिष्ठित हो सकें।

अतः इस कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक एवं वैचारिक उपलब्धि यही है कि यह इतिहास को लोकतांत्रिक बनाती है, उसे जनजीवन से अभिन्न रूप में जोड़ती है तथा पाठक के भीतर यह विश्वास जागृत करती है कि परिवर्तन संभव है,यदि जनता जागरूक, संगठित और संघर्ष के लिए तत्पर हो। निस्संदेह, इस उत्कृष्ट कृति के लिए दिनेश कुमार माली साधुवाद के पात्र हैं। 
                               
प्रदीप श्रीवास्तव
कथाकार सम्पादक
 

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