पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
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ब्राह्मणी नदी के तट पर स्थित ओड़िशा का एक छोटा-सा गाँव है, पोइपाल।
इस गाँव में 8 फरवरी 1908 को तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के प्रणेता पबित्र मोहन प्रधान जी का जन्म हुआ था। पोइपाल से थोड़ी दूरी पर है एक अन्य गाँव ‘नालम’, जहाँ ओड़िशा में बीजेपी के प्रवर्तक डॉ. देवेंद्र प्रधान का 16 जुलाई 1941 को जन्म हुआ। इन दोनों गाँवों के नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
ब्राह्मणी नदी पबित्र बाबू को जितनी प्रिय थी, उतना ही ब्राह्मणी नदी से थोड़ी दूर स्थित माल्यगिरि पर्वत से भी उनका लगाव था। आज ख़ासकर हिंदी साहित्य में नदियों जैसे ‘महानदी’, ‘नर्मदा’ पर पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी आलोचना की नई विधा प्रचुर साहित्य में देखने को मिलता है, जबकि 1400 सौ वर्ष पूर्व जगतगुरु शंकराचार्य ने ‘नर्मदाष्टकम्’, ‘यमुनाष्टकम्’, ‘गंगाष्टकम्’ जैसी स्तुतिओं की रचना की थी। प्रसिद्ध हिंदी कवि प्रोफेसर आनंद सिंह की ‘सौंदर्य जल में नर्मदा’, शांति निकेतन के चित्रकला के प्रोफेसर अमृतलाल बेगड़ के यात्रा-संस्मरण ‘धीरे-धीरे नर्मदा’ आदि को आधुनिक हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर मानी जाती है, वैसे ही ओड़िया साहित्य में पबित्र मोहन प्रधान द्वारा नौ सर्गों में रचित ‘ब्राह्मणी काव्य’ का विशिष्ट स्थान है।
यह नदी पबित्र मोहन प्रधान को बहुत प्रिय थी। बारहमासा बहने वाली चिरस्रोता नदी ब्राह्मणी के तट पर बीते अपने बचपन के खेल, नदी में नहाना, धोना, पानी के बहाव को देखना, जीव-जंतुओं को पकड़ना जैसी बहुत सारी स्मृतियों ने उन्हें यह कालजयी काव्य लिखने के लिए प्रेरित किया।
बिहार के छोटानागपुर के लोहरदग्गा पहाड़ से दो नदियाँ निकलती हैं। एक शंख और दूसरी कोयल।ये दोनों नदियाँ ओड़िशा के सुंदरगढ़ जिले के पास राउरकेला के नजदीक रघुनाथपालि के पानपोष के वेदव्यास कुंड में मिलती हैं। दोनों शंख और कोयल के संगम से नई नदी बन जाती है, जो कहलाती है—‘ब्राह्मणी नदी’। यह नदी ओड़िशा के सुंदरगढ़, संबलपुर, देवगढ़, अंगुल, ढेंकानाल, जाजपुर, केन्द्रपाड़ा से प्रवाहित होती हुई धामारा के वैतरणी नदी के साथ मिलकर, अंत में धामरा फ्लैश पॉइंट (बत्तीघर) के नज़दीक बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। छोटा नागपुर से यह बत्ती घर 250 मील की दूरी पर है। धामरा का मुहाना ही ब्राह्मणी नदी का मुहाना है।
इस काव्य में पबित्र मोहन प्रधान ने ब्राह्मणी के नामकरण, पराशर मुनि के पुत्र वेदव्यास के ओड़िया होने के प्रमाण के साथ-साथ नदी के प्राकृतिक सौंदर्य, नदी का प्रवाह, स्नान घाट, नौकाघाट, वहाँ पाई जाने वाली अस्सी प्रकार से अधिक प्रजातियों की मछलियों का वर्णन, चक्रवर्ती की उपाधि से अलंकृत होने एवं बंदरगाह के ‘धामरा’ नामकरण आदि पर भी आलोकपात किया है। आगे वे लिखते हैं कि कलात्मक दरवाज़ों की दृष्टि से हमारे देश के लखनऊ जैसे कुछ शहरों को यदि छोड़ दिया जाए तो तालचेर के भास्कर्य-कला में निखूण नौ दरवाज़े इस नगर की शोभा बढ़ाते हुए नज़र आते हैं। तालचेर राजवाटी का सिंहद्वार अति मनोरम है, जिस पर अशोक चक्र जैसी एक कलाकृति खुदी हुई है। इटली के कारीगरों ने इसका निर्माण किया है।
ब्राह्मणी नदी जब तालचेर से प्रवाहित होती है, तो जिन स्थानों पर गहरे गह्वर—जिसे स्थानीय भाषा में गंड भी कहते हैं, जिसमें दो-तीन हाथी डूब जाते है, उनमें रेंगाली के पास छतादरह, नालम, गहम, बारुआँ, तुंबगोला डंगरबेड़ा, घासिआ, दरहमान और टाउन के पास ताबड़ा प्रमुख हैं। जब यह नदी ढेंकानाल से गुज़रती है, उसके प्रवाह-पथ में जटिआ, मंगलपुर, चंडी-नाधरा, काशीपुर,गोरड़ापाल,दलरा आदि गंड आते हैं। जबकि कटक में खंडितेरा, पतरपुर; बणई में बणेश्वर, देवदर, देवगढ़ के गोगुआ गाँव में अंचलाकोलि, नईकुलग्राम में नईकूल आदि प्रमुख हैं।
पहले राजा इन गंडों के नज़दीक नर बलि देते थे। तालचेर का राजा भी ताबड़ा दरह पर नरबलि देते थे। रात को तालचेर राजा के लोग यहाँ नाव बाँध कर रखते थे। यदि रात में कोई अकेले घाट पर जाता था तो वे उसे पकड़ कर राजा को भेंट कर देते थे।
पुरानी हिन्दी फ़िल्मों में ऐसे कई दृश्य देखने को मिलते हैं। ऐसे ही तालचेर के बुरकुना गाँव के सुरेंद्र प्रधान की ताबडा गंड के तट से उठाकर राजा के लोगों ने देवी पीठ पर नरबलि दी थी। इसी तरह के नरबलि केंद्र बणई एवं बामंडा के दोसामालि जगह पर सिंगशाल घाटी, बामंडा-बारकोट जगह पर बलिता घाटी, देवगढ़ सबडिवीज़न के जुआलिमंगा पर छेलिडिआ घाटी, रेंगाली, शिलिंग डंगरबड़ा, माकरचुआ आदि घाटियाँ, तालचेर की जटिआ घाटी तालचेर-ढेंकानाल सीमा पर अवस्थित थे।
खंडाधार जलप्रपात सुंदरगढ़ ज़िले के पूर्व बणई राज्य के खंडाधार पहाड़ में निर्गत होता है। यह जलप्रपात 900 फीट की ऊंचाई से गिरता है, जिसके जल-धारा की श्वेतरेखा दूर से दर्शकों को आकर्षित करती है। इस प्रपात के तल से दो नदियाँ हंसराडि और कुराडि निकलती हैं, जो ब्राह्मणी नदी में मिल जाती है।
देवगढ़ के बड़रमा पहाड़ में निर्गत गोहिरा नदी, माल्यगिरि में निर्गत माकंडा नदी और ब्राह्मणी की उपनदी टिकरा (जिसका उद्गम स्थल सम्बलपुर का रेढ़ाखोल है), अंगुल के जंगलों से निर्गत सिंगड़ा और नंदिरा, टिकरपड़ा पहाड़ से लिंगरा और बऊली-जो ढेंकानाल के खड़गप्रसाद के पास ब्राह्मणी में मिलती हैं, कपिलास से निकालने वाली नदियाँ कुआंरी, ऊअंरी, धनेई; ढेंकानाल-केंदुझर सीमा से रामिआल गिरिनदी सुकिंदा से निर्गत होने वाली तमशाल जोर के इस अंचल में ब्राह्मणी की शाखा नदियों में खरस्रोता और खरसुआं प्रमुख हैं। इस तरह ब्राह्मणी नदी के इर्द-गिर्द अनेक नदियाँ बहती हैं।
नदियों से अगाध प्रेम रखने वाले आनंद ने दस साल पहले सावन महीने के पहले सोमवार को राऊरकेला के पास ब्राह्मणी नदी के पानपोष के वेदव्यास कुंड से ‘बोल बम’ के दौरान प्लास्टिक डिब्बों में जल भरकर घोघर शिवमंदिर में शिव भगवान का जलाभिषेक किया था। इस साल पोइपाल के नज़दीक बारुआं पहाड़ के पास आनंद को अपने मित्र बिजय प्रधान के साथ नौका विहार करने का अवसर मिला तो बातचीत के दौरान आनंद ने अनुभव किया कि नौका चलाने वाले मछुआरों-मल्लाहों के मन में पबित्र मोहन प्रधान के प्रति जितना सम्मान और श्रद्धा है, यह देखते हुए ‘नर्मदा पुत्र’ अमृत लाल बेगड की तरह अगर उन्हें ‘ब्राह्मणी पुत्र’ कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आनंद ने नाविक राजेश मांझी से ब्राह्मणी नदी में नौका विहार करते समय उनके जन्म-शिक्षा और विवाह प्रसंगों के बारे में कुछ सवाल पूछे तो राजेश मांझी कहने लगा, “कभी ढेंकानाल अविभाजित था। तालचेर और अंगुल ढेंकानाल ज़िले में आते थे। तालचेर उपखंड में ब्राह्मणी नदी के तट पर तालपदा के पास पोइपाल गाँव में क्षत्रिय किसान परिवार में पबित्र बाबू का जन्म हुआ था। उनके माता-पिता के नाम तो मुझे मालूम नहीं है।”
यह सुनकर बिजय प्रधान कहने लगे, “राजेश भाई ! आपने उनके जन्म स्थान के बारे में सही बताया है। हाँ , बहुत पहले खोर्धा से रघु और चेमा प्रधान ढेंकानाल आए थे। पहले वे वहाँ के नाधरा रामचंडी में रहे। लेकिन ज़मीन की व्यवस्था नहीं होने के कारण रघु प्रधान पोइपाल आ गए और चेमा प्रधान तालपदा में। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सन् 1776 से 1846 के बीच पोइपाल-तालपदा सरवराकार रघुनाथ प्रधान ने तालचेर राजा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी। उन्हीं के प्रपौत्र सुबुद्धि राय के परिवार में 8 फरवरी 1908 के दिन उत्तराफागुनी कन्याराशि तुलालग्न में पबित्र बाबू का जन्म हुआ था। पोइपाल पबित्र बाबू की जन्मभूमि है। रघु प्रधान के पाँच पुत्र थे। खग, कन्हाई, लक्ष्मण, श्रीपति और श्याम धन। श्रीपति प्रधान के पुत्र हुए, भरत प्रधान—जिसे कन्हाई प्रधान ने गोद लिया, क्योंकि उनके कोई लड़का नहीं था। केवल एक लड़की थी। भरत प्रधान और उनकी पत्नी शांति (सांता) के दो बेटे हुए—माँगता प्रधान और पबित्र मोहन प्रधान और दो बेटियाँ—कदली प्रधान (शिलिंग) और बोईता प्रधान (टिटिरिमा)। माँगता प्रधान के हुए करुणाकर प्रधान। जिनके दो बेटे बसंत और हेमंत जो भुवनेश्वर में पबित्र बाबू के साथ रहे। उनकी तीन बेटियाँ भी हैं। प्रेम, मंजुलता एवं गीतांजलि। अभी हेमंत और बसंत दिल्ली में रह रहे हैं। पबित्र बाबू ने शादी नहीं की, आजीवन ब्रह्मचारी रहे।”
नाविक राजेश मांझी चप्पू से चुपचाप बुलाझार की ओर नाव खे रहा था। ब्राह्मणी नदी की जल-उर्मियों पर अस्ताचल को अग्रसर हो रहे सूर्य-रश्मियों को दत्तचित्त होकर देखने के कुछ समय बाद बिजय प्रधान ने कहना शुरू किया, “जब पबित्र बाबू साढ़े तीन महीने के थे, उनके पिता की हैजा से मृत्यु हो गई और कुछ ही वर्षों बाद माँ की भी। इस तरह उनका बचपन मातृ-पितृ विहीन रहा। उस समय पोइपाल गाँव में कोई सरकारी स्कूल नहीं था। गाँव के किसी पढ़े-लिखे आदमी से उन्होंने स्लेट पर अक्षर और अंक लिखना सीखा। लगभग डेढ़ वर्ष की उम्र में मधु वर्णबोध और ‘शिशु बोध’ सीख लिया। फिर एक साल तक कुछ नहीं पढ़े। फिर पोइपाल में निम्न प्राथमिक विद्यालय खुला, जहाँ वे पढ़ने लगे। 1918 में पोइपाल में अकाल पड़ा तो वह स्कूल बंद हो गया तीन साल के लिए। इसलिए 1922 में उन्होंने लोअर प्राइमरी यानी तीसरी कक्षा पास की और अपर प्राइमरी में पढ़ने के लिए ब्राह्मणी नदी के उस पार शिपुर चले गए।” हाथ उठाकर दक्षिण दिशा में पेड़ों के झुरमुटों के शिपुर के विद्यालय की ओर संकेत करते हुए बिजय प्रधान ने स्पष्ट किया।
“पबित्र मोहन प्रधान जी के माता-पिता दोनों की बचपन में मृत्यु हो गई थी, तो उनकी पढ़ाई का ख़र्च किसने उठायाख?”
आनंद ने जिज्ञासावश बिजय प्रधान से जानना चाहा तो मुस्कराते हुए उन्होंने अपने स्मार्ट फोन में प्रसिद्ध साहित्यकार एफ़.ए. बैले के पबित्र मोहन प्रधान जी के साथ हुए साक्षात्कार पर आधारित आलेख ‘द मैन फ़्रॉम तालचेर’, जो सन् 1998 में कोर्नेल यूनिवर्सिटी ऑफ़ प्रेस से प्रकाशित हुआ था, खोलकर उसे पढ़ते हुए आलेख के मुख्य बिंदुओं के बारे में बताने लगे, “उस ज़माने में स्कूल फ़ीस की जगह चावल दाल देने से काम चल जाता था। शिपुर से पढ़ाई पूरी करने के बाद माइनर की पढ़ाई के लिए पोइपाल से 26 मील दूर तालचेर के युवराज मिडिल इंग्लिश स्कूल में दाख़िला लिया। वहाँ पढ़ते समय उन्हें ₹3 की छात्रवृत्ति मिलती थी। वहाँ उन्होंने 2 साल पढ़ाई की। दोनों साल प्रथम श्रेणी से उतीर्ण हुए। उस समय एक रुपए में 16 आना होते थे और मेस की फ़ीस जमा करनी पड़ती थी बारह आना। कई बार तो वे नाश्ता नहीं करके सीधा लंच करते थे। 1930 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। तब उन्हें ₹10 प्रतिभा छात्रवृत्ति मिलती थी और ₹10 प्रतिमाह वे लोन लेते थे। उन्होंने इंटरमीडिएट में दाख़िला हेतु 68 आदमियों से 64 रुपए का लोन लिया था। उस समय एक रुपए में 30-40 सेर चावल मिलता था। इंटरमीडिएट में उनके विषय थे इतिहास, तर्कशास्त्र संस्कृत एवं ओड़िया। प्राइवेट ट्यूशन करने से उन्हें ₹6 प्रतिमाह मिलते थे। जबकि फ़ीस के लिए उन्हें ₹7 प्रति माह देने पड़ते थे। तालचेर की राजा ने प्रतिमाह ₹10 देने का आश्वासन् दिया था, मगर उन्होंने कभी नहीं दिए। बीए पढ़ते समय पबित्र बाबू ने हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट से भेंट कर ग़रीब बच्चों के लिए मेस (केंटीन) बनाने के लिए आवेदन पत्र दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।”
“मैट्रिक के बाद की पढ़ाई उनकी कैसे हुई?” आनंद ने फिर से सवाल पूछा।
“पबित्र बाबू के चाचा बांकनिधि भक्तबल्लभ ने एक रुपए प्रति माह के हिसाब से 4 साल तक 48 रुपए, और एक बार छब्बीस और दूसरी बार तीस रुपए पढ़ाई के लिए दिए थे। 1930 में मैट्रिक के बाद उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति मिलती थी दस रुपए प्रतिमाह और दस रुपए छात्रवृत्ति निधि से। मगर आगे ऋण लेकर 1932 में कटक के रेवेन्सा कॉलेज से आई.ए. पास कर ली, बी.ए.(अर्थनीति एवं इतिहास) पढ़ने के लिए पैसे नहीं थे। इसलिए उनके पास ट्यूशन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। शिक्षक प्रफुल्ल चंद्र महापात्र एवं मौसेरे भाई मदन मोहन प्रधान ने कुछ आर्थिक सहायता अवश्य की। 1934 में उन्होंने बी.ए. (ऑनर्स) पास की। विषय थे इतिहास, इंग्लिश और ओड़िआ। उसके बाद वह तालचेर राजा के घर ट्यूशन पढ़ाने जाते थे। बाद में 1934 में तालचेर हाई स्कूल में उन्हें जॉब मिल गई। उसके एक साल बाद 1935-36 में राधानाथ ट्रेनिंग कॉलेज से D.Ed. (Diploma in Education) की परीक्षा पास की और फिर 1936 से जुलाई 1938 तक तालचेर में शिक्षक रहे।”
शिक्षा के संघर्ष के बाद उनकी शादी के बारे में आनंद ने पूछा तो प्रत्युत्तर में बिजय प्रधान कहने लगे, “उस समय हमारे देश में हर जगह बाल विवाह का प्रचलन था। इसलिए हाई स्कूल और कॉलेज पढ़ते समय उनके शादी के रिश्ते आने शुरू हो गए थे। कोई-कोई तो विवाह के लिए राज़ी होने पर पढ़ने के लिए उन्हें आर्थिक मदद देने के लिए भी तैयार थे। मगर वे आर्थिक मदद लेकर घर-जमाई नहीं बनना चाहते थे। उनके चाचा बांकनिधि भक्तबल्लभ किसी बंगाली लकड़ी-व्यापारी की लड़की से शादी करवाना चाहते थे। यहाँ तक कि उन्हें देखने के लिए मेदिनीपुर वीर भूमि भी बुलाया। B.A., D.Ed होने के बाद 1937 में तालचेर युवराज हाई स्कूल में शिक्षक और कुछ दिन तालचेर के राजा की लड़की अंश की नाती कुरूपम राजकुमार के निजी शिक्षक नियुक्त हुए। इसलिए बंगाली उन्हें दामाद बनाने के लिए तत्पर रहते थे। ओड़िशा में एक कहावत है—किसान ऊपर उठने से क्षत्रिय बनता है और क्षत्रिय नीचे गिरने से किसान होता है।”
“पबित्र बाबू ने पढ़ाई की। नौकरी करने लगे। फिर उनके घर वाले विवाह के लिए उन पर अवश्य दबाव डालते होंगे?”
बिजय प्रधान की सारी बातें सुनने के बाद आनंद का यह सवाल पूछना स्वाभाविक था।
एक सुलझे हुए समाजशास्त्री की तरह बिजय प्रधान कहने लगे, “बिलकुल सही कह रहे हैं आप। ब्रिटिश ज़माने में पढ़े-लिखे लोग कहाँ मिलते थे। उनके घर में भी उनकी भाभी और चाची शादी का दबाव हमेशा डालती थीं। अपने-अपने स्तर पर वे लड़कियाँ तलाशतीं थीं और खाना खाते समय कहती थीं, कभी भी क्षत्रिय या बंगाली लड़की से शादी मत करना। ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से भी नहीं। कभी इज़्ज़त नहीं करेगी। चाची और भाभी द्वारा देखी गई दो लड़कियों में से उनके भरोसे इंतज़ार करते-करते एक की मृत्यु हो गई थी। दूसरी ने बड़ी बहन की मृत्यु के बाद बहनोई से शादी कर ली। अंत में तंग आकर उनके परिजन उन्हें कांट्रैक्ट मैरिज का भी प्रस्ताव देते थे, लेकिन पबित्र बाबू उस विवाह में स्नेह, ममता, प्रेम, मित्रता, और दांपत्य गुणों का अभाव मानते हुए मना कर देते थे। इस वजह से वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आत्मघाती दस्तों में न केवल शामिल हुए, बल्कि उनकी ‘युगाँतर गोष्ठी’ की असहनीय परीक्षाएँ पास कर कर्तव्य निर्वहन में कोई कसर नहीं छोड़ी।''
“साहब, एक बात आपको मैं बताना चाहूँगा,” बिजय प्रधान की बात को बीच में काटते हुए राजेश मांझी चप्पू मारते-मारते ज़ोर-ज़ोर से साँस लेते हुए कहने लगा, “हमारे इलाक़े में पबित्र बाबू की तालचेर की राजकुमारी से प्रेम-कहानी बहुत प्रचलित है।”
“पबित्र बाबू और प्रेम?” आश्चर्यचकित होकर आनंद ने पूछा।
राजेश मांझी अपनी नाव को नदी के किनारे ले जाकर आनंद की ओर देखकर हँसते हुए कहने लगा, “क्यों? इसमें आश्चर्य की क्या बात है! वे भी तो इंसान थे अस्थि-मज्जा से बने हुए। हमारे बिजिगोल गाँव में उनके राजकुमारी से प्रेम के बारे में एक प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। राजकुमारी गड़जात के किसी राजा की धर्म बेटी थी। वह राजा अपनी उस धर्म बेटी की किसी पढ़े-लिखे आदमी से शादी कराना चाहते थे। इसलिए तेलीसिंहा के कंदर्प सुबुद्धि के हाथों ख़बर भिजवाई पबित्र बाबू के पास, उससे शादी के बारे में। यहाँ तक कि वह राजा उनके लिए विलायत में बैरिस्टरी पढ़ने का ख़र्च उठाने और बाद में उन्हें अपने राज्य में क़ानून विशेषज्ञ की नौकरी देने के लिए भी तैयार था। मगर जैसे ही पबित्र बाबू को पता चला कि वह राजा उस उम्रदराज लड़की का ग़लत इस्तेमाल कर रहा है,उसके साथ राजा के पाप सम्बन्ध हैं, तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया। शुरू में प्रलोभन में आने के कारण पबित्र बाबू अपने आपको मन ही मन धिक्कारने लगे।''
राजेश मांझी की बात पूर्ण होने से पहले ही आनंद ने उसे टोक दिया। और कहने लगा, “इसका मतलब पढ़ते समय भी उनका किसी से कुछ चक्कर था?'’
“कटक की राधानाथ ट्रेनिंग कॉलेज में पढ़ने के दौरान एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने अपनी सुंदर बेटी के लिए उन्हें निजी शिक्षक नियुक्त किया। मगर बाद में साज़िश का पता चलने पर इंकार कर दिया। यहाँ तक कि कॉलेज के प्रिंसिपल महेश चंद्र प्रधान की बात भी उन्होंने टाल दी थी।'’ बिजय प्रधान ने राजेश मांझी के गाँव में प्रचलित पबित्र बाबू के प्रेम कहानी पर सहमति जताते हुए अपनी बात समाप्त की।
बातचीत के दौरान आनंद को पता चला कि तालचेर का राजा भी चाहता था कि पबित्र बाबू जल्दी से जल्दी शादी करें। उसे संदेह हो रहा था कि अगर वे अविवाहित रहे तो जनांदोलन खड़ा कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने पंडित मुकुंद काव्यतीर्थ का सहारा लिया। वह जयदेव के ‘गीत गोविंद’ कालिदास के ‘कुमार संभव’ आदि के कामोद्दीपक श्लोकों पर व्याख्या कर उन्हें समझाते थे, मगर स्कूल के प्रधानाध्यापक शंकर त्रिपाठी ने उन्हें उसके पीछे की मंशा बता दी तो उन्होंने इस विषय पर आलोचना करने से इंकार कर दिया।
यही नहीं, 1938 में प्रजामंडल के अध्यक्ष बनने से उनकी ख्याति चारों तरफ फैल गई। कई लोग उनके पास शादी का प्रस्ताव लेकर आते थे, मगर वे मना कर देते थे। यह कहकर कि जब तक देश आज़ाद नहीं हो जाता वह शादी नहीं करेंगे।
“एक बात और कहूँ, देश आज़ाद हो गया। गड़जात रजवाड़े ओड़िशा में और ओड़िशा भारत में मिल गया। वे मंत्री, उप-मुख्यमंत्री बने तो फिर बड़े-बड़े घरों से शादी का प्रस्ताव आने लग गए। उस समय उनकी उम्र 40 से 50 के बीच में रही होगी। वे हाथ जोड़कर मना कर देते थे कि अब वह तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे। इस उम्र में शादी करना न केवल असभ्य और अमानवीय है, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हानिकारक है।” ब्राह्मणी नदी के तट पर नाव से उतरते समय बिजय प्रधान के इस रहस्योद्घाटन से अचानक आनंद की तंद्रावस्था टूट गई हो।
बिजिगोल के शिव मंदिर के पास नाविक ने अपनी नाव का लंगर डाला। ब्राह्मणी नदी में नौका विहार पूरी तरह से सफल रहा। सूरज बिजिगोल को दोनों तरफ स्थित बाराचल पर्वतमाला की चिमनीघाटी के शिखर पर डूबने की तैयारी में था।
आनंद और बिजय प्रधान कणिहा महाप्रबंधक कार्यालय की ओर रवाना हो गए।
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- कुछ स्मृतियाँ: डॉ. दिनेश्वर प्रसाद जी के साथ
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