पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
देश के अन्यतम विप्लवी व राष्ट्रवादी नेता पबित्र बाबू
जब मुझे हिन्दी भाषा के चर्चित रचनाकर दिनेश कुमार माली ने अपने अद्यतन उपन्यास “पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार” की पांडुलिपि देते हुए कहा कि मैं इसकी भूमिका लिखूँ तो मैंने उनके इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया। पबित्र मोहन प्रधान न केवल वह बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे, बल्कि हमारे देश के दिग्गज नेता थे। ऐसे वे मेरे दूर के रिश्तेदार भी थे। मेरी माँ अन्नपूर्णा का जन्म तालचेर के सोलड़ा गाँव में घनश्याम प्रधान और घृतरानी के घर हुआ था। मेरी नानी घृतरानी प्रधान, लक्ष्मीधर रायचौधुरी और साहिबाणी देवी की पुत्री थीं। लक्ष्मीधर रायचौधुरी की बहिन सौरी देवी की शादी बांकनिधि भक्त बल्लभ के साथ हुई थी, जो पबित्र बाबू के चाचा थे। इस तरह मैं मेरे माताजी की वंशावली की ओर से उनकी रिश्तेदार लगती हूँ। मेरी परनानी साहिबाणी और सौरी देवी ने हिजरात के दौरान कोशला कैंप में डिक्टेटर (मार्गदर्शक) की भूमिका निभाई थी। प्रजामंडल आंदोलन के दूसरे चरण में मेरी माँ के बड़े चाचा आनंद चंद्र प्रधान (सोलडा) ने उस आंदोलन की गोरिल्ला वाहिनी की बागडोर सँभाली थी। यहीं नहीं, पबित्र बाबू और मेरे दादा कविराज नरेंद्र साहू अच्छे मित्र थे। मैं अंगुल के बनरपाल ब्लॉक बंदा से आती हूँ और मेरे दादा ब्रिटिश शासित अंगुल ज़िले में हमारे गाँव बंदा के सरवराकार थे। यद्यपि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में खुल्लम-खुल्ला भाग नहीं लिया था, मगर वे इस संग्राम में सेनानियों की गुप्त रूप से मदद करते रहे। मेरे पिताजी अक़्सर कहा करते थे कि प्रजामंडल आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान पबित्र बाबू हमारे केले के घने बग़ीचे में छिपे थे। आज भी जब कभी मेरे गाँव के लोग इस बारे में बताते हैं तो मैं मन-ही-मन गर्व की अनुभूति करती हूँ। जब मैं बड़ी हुई तो पश्चिम ओड़िशा में अपनी नौकरी में व्यस्त रहने के कारण और अन्य परिस्थितिजन्य कारणों से पबित्र बाबू से नहीं मिल पाई, क्योंकि वे उस समय भुवनेश्वर रहने चले गए थे। लेकिन मेरे बचपन की दो स्मृतियाँ मेरे मानस पटल पर अभी भी तरोताज़ा हैं।
पहली स्मृति, जब मेरे पिताजी पाललहडा में कृषि अधिकारी के तौर पर कामकर रहे थे। उस समय वे मांकड़ा नदी के किनारे किसी बड़ी सरकारी फ़र्म के अधिकारी थे। उस फ़र्म द्वारा आवंटित क्वार्टर में हम सब रहते थे। वहाँ पर अलग-अलग फल, साग-सब्ज़ियों और जड़ी-बूटियों की खेती होती थी, जिसे बाहर अन्यत्र जगहों पर भेजा जाता था। उस समय मेरी उम्र चार-पाँच साल रही होगी। एक बार पबित्र बाबू, जब आदिवासी एवं ग्राम्य कल्याण मंत्री थे तो वे उस फ़ार्म को देखने आए थे। मेरी माँ, मेरे छोटे भाई और मैंने उन्हें प्रणाम किया था। मेरे पिताजी ने पबित्र बाबू के लिए किसी को टोकरी भर संतरे लाने के लिए कहा था। पबित्र बाबू ने उस टोकरी में से दो संतरे उठाकर हमें दे दिए। मैंने सिर हिलाकर उन्हें मना कर दिया, “नहीं, हम मुफ़्त की कोई चीज़ नहीं खाते हैं। मेरे पिताजी जो लाते हैं वहीं खाती हूँ।”
उन्होंने मुस्कुराते हए कहा, “क्यों?”
मैंने उत्तर दिया, “ये फल सरकार की संपत्ति हैं।”
यह सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने भी ये फल मुफ़्त में नहीं लिए हैं। इसके लिए मैंने पैसे दिए हैं।” फिर रुककर मेरे पिताजी की ओर इशारा करते हुए कहने लगे, “चाहो तो अपने पिताजी से पूछ लो।”
दूसरी स्मृति, जब वह हमारे विद्यालय में मुख्य अतिथि बनकर आए थे। उन्हें देखने के पाललहडा क़स्बे में बहुत भीड़ उमड़ पड़ी थी। उस समय मेरे पिताजी का वहाँ तबादला हो गया था। मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी। विद्यालय द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में गाँधीजी पर लिखे मेरे निबंध पर मुझे प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। जब पुरस्कार लेने के लिए मेरा नाम पुकारा गया तो पबित्र बाबू ने उठकर कहा, “अरे! यह तो मेरी पोती हैं। रत्नाकर की बेटी। उसे उठाकर पंडाल पर ले आओ।”
इनाम में मुझे लालटेन देते उन्होंने मेरी पीठ थपथपा कर कहा, “यह तुम्हारे लिए है। बहुत पढ़ाई करो और नरेंद्र भाई की तरह लेखक बनो।”
मेरे दादा नरेंद्र प्रधान आशु कवि थे। वे अधिकांश महिमा अलेख के भजन लिखा करते थे। उनकी बहुत सारी रचनाएँ खो गई हैं। बचपन में मुझे पबित्र मोहन प्रधान ने आशीर्वाद दिया था। आज जब उनके जीवन पर उपन्यास लिखा जा रहा है और मुझे उनकी भूमिका लिखने का अवसर मिल रहा है तो यह मेरे लिए किसी दिव्य-अनुकंपा से कम नहीं हैं।
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पबित्र मोहन प्रधान हमारे देश के अन्यतम राष्ट्रवादी नेता थे। आजीवन गाँधीवादी सिद्धांतों का पालन करते हुए वे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ते रहे। वे न केवल तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के संस्थापक थे, बल्कि उन्होंने ओड़िशा के अन्य गड़जात राज्यों के लिए उत्प्रेरक भूमिका निभाई। वे प्रकृति, साहित्य, कला प्रेमी होने के साथ-साथ सक्रिय राजनीति से जुड़े हुए इंसान थे। एक राजनेता के तौर पर वे न केवल राजनीति में सुधार लाना चाहते थे, बल्कि ओड़िशा की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक जीवन में भी सुधार लाना चाहते थे।
प्रसिद्ध लेखक, अनुवादक और आलोचक श्री दिनेश कुमार माली ने पबित्र मोहन प्रधान की आत्मजीवनी ‘मुक्तिपथे सैनिक’ पढ़ने के बाद उन्हें यह उपन्यास लिखने की प्रेरणा मिली। उनके जीवन चरित्र पर आधारित यह उपन्यास ‘पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार’ आगे जाकर कालजयी कृति सिद्ध होगी—ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास हैं। दिनेश कुमार माली वर्तमान में महानदी कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। वे मूलतः राजस्थान के निवासी हैं और तीन दशक से ओड़िशा में रह रहे हैं। वे ओड़िशा की भाषा, लोक-संस्कृति, साहित्य, इतिहास और ऐहित्य जानने की हार्दिक इच्छा रखते हैं। उनका संवेदनशील मस्तिष्क ओड़िशा के इतिहास के अद्वितीय और अविस्मरणीय पहलुओं की तरफ़ स्वतः खिंचा जाता है। रेढ़ाखोल के चौराहे पर स्थापित ओड़िशा के महिमा धर्म के आदि संत कवि भीम भोई की मूर्ति सबका ध्यान आकर्षित करती है तो दिनेश कुमार माली महिमा धर्म के रीति-रिवाज़ों के बारे में जानने के लिए इतने ज़्यादा प्रभावित हो जाते हैं कि उनके जीवन पर आधारित उपन्यास ‘रश्मि-लोचन’ लिख डालते हैं। इसी तरह 15 अगस्त 2023 को उनकी कंपनी द्वारा कणिहा क्षेत्र के अमृत वाटिका उद्यान में आयोजित ‘मेरा देश मेरी माटी’ कार्यक्रम के तहत तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के शहीदों के सम्मानार्थ समारोह उन्हें “शहीद बिका नाएक की खोज” उपन्यास लिखने के लिए प्रेरणा-स्रोत बन जाता है। सिर्फ़ इतना ही नहीं, जब लेखक दिनेश कुमार माली 6 सितंबर 2023 को कणिहा खुली खदान के 86वें प्रजामंडल दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते हैं और वहाँ उन्हें प्रजामंडल के नेताओं जैसे पबित्र मोहन प्रधान आदि के जीवन-संघर्षों और दुख-दर्दों की जानकारी मिलती है तो वे इतना विचलित हो जाते हैं कि अपने हृदय के भीतर उमड़ रहे दुख से छुटकारा पाने के लिए उनके जीवन पर आधारित अपना उपन्यास लिखने की सोचने लगते हैं।
भीम भोई के जीवन पर आधारित उनके उपन्यास ‘रश्मि-लोचन’ और बिका नाएक के जीवन पर विक्रम-बेताल की शैली में लिखे हुए उपन्यास ‘शहीद बिका नाएक की खोज’ का अंग्रेज़ी और ओड़िया भाषा में भी अनुवाद हो चुका है। पबित्र मोहन प्रधान उपन्यास का मुख्य नायक आनंद सहृदय, संवेदनशील, जिज्ञासु, और ऊर्जावान चरित्र वाला व्यक्ति है, जो लेखक के व्यक्तित्व से मेल खाता है। इस उपन्यास का कथानक धीरे-धीरे आगे बढ़ता हैं, मगर ब्राह्मणी नदी के प्रवाह की तरह तरलता से पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। उनकी जिज्ञासा क्षुधा मिटाने वाले ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित इस उपन्यास में प्रजामंडल आंदोलन की उत्पत्ति और पतन के साथ-साथ पबित्र मोहन प्रधान की जीवनी एवं उनकी उपलब्धियों का उल्लेख है। यद्यपि यह जीवन चरित्र आधारित उपन्यास है, लेकिन हम इसे 'फ़िक्शन' की श्रेणी में नहीं ले सकते है, क्योंकि यह एक वास्तविक कहानी है। इस कहानी के सारे पात्र वास्तविक हैं और दिनांक, घटनाओं, स्थानों के नाम आदि की पृष्ठभूमि यथार्थ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं। दूसरे शब्दों में, यह एक जीता जागता इतिहास है, क्योंकि लेखक ने अनेक साक्षात्कारों, प्रमुख संस्मरणों, पबित्र बाबू की आत्मजीवनी और आस-पास के गाँवों में मौजूद प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों के आधार पर एक कालजयी खड़ को लेखक ने अपने उपन्यास का हिस्सा बनाया है।
यही नहीं, पबित्र मोहन प्रधान की आत्म जीवनी ‘मुक्तिपथे सैनिक’, स्वर्गीय विभूति भूषण साहू की इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘तालचेर गणसग्रांम’, पबित्र मोहन प्रधान के कविताओं का संग्रह ‘पबित्र ग्रंथावली’, प्रोफ़ेसर डी.पी. मिश्रा की ‘पीपल्स रिवाल्ट इन ओड़िशा: ए केस स्टडी ऑफ़ तालचेर’, तालचेर फ़्रीडम फ़ाइटर्स मेमोरियल, कणिहा द्वारा प्रकाशित सोवेनियर ‘आमे संग्रामी’, राजाराव का उपन्यास ‘कंधापुर’, फ़क़ीर मोहन सेनापति का उपन्यास ‘छह मण आठ गूंठ’, खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ जैसी अनेक पुस्तकों के गहन अध्ययन से उन्हें हमारे देश की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर पैदा हो रहे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और गाँधीजी के विचारों को सर्जनात्मक-कलात्मक ढंग से क़लमबद्ध करने में मदद मिली है, जिससे न केवल सामूहिक चेतना का; बल्कि सामाजिक, राजनैतिक जागरूकता का विकास हुआ है; जिससे गाँव वालों में अदम्य साहस और सेनानी के रूप में नेतृत्व देने का जज़्बा पैदा हुआ।
उन दिनों में गाँधीजी द्वारा प्रेरित भारत की सभी श्रेणियों द्वारा चुना गया सामूहिक आंदोलन ब्रिटिश राज के उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ था। गड़जात राज्यों के दमनकारी राजाओं को औपनिवेशिक सत्ता का वरदहस्त प्राप्त था, ताकि वे भारतीय राष्ट्रवादी एवं लोकतांत्रिक आंदोलनों को कुचल सकें। इस ‘लेजे फेयरे’ नीति के कारण स्थानीय शासक और ज़्यादा निरंकुश एवं ग़ैर ज़िम्मेदार बन गए। उस समय भारत में 600 राजाओं द्वारा शासित राज्य थे, जिसमें से ओड़िशा में 26 गड़जात राज्य थे। ओड़िशा के इन गड़जात राज्यों में सबसे ज़्यादा दमन और अत्याचार था। पबित्र मोहन प्रधान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि गड़जात राजा अपने आपको भगवान द्वारा भेजा हुआ शासक मानकर राज करते हैं, जिसमें राजा को न केवल सर्वोच्च माना जाता था, बल्कि उसे क़ानून से ऊपर समझा जाता था। गड़जात राजाओं की यह सामंतवादी सोच मानवाधिकारों के लिए हानिकारक थी। तालचेर जैसे राज्य में ‘स्टेट मैनुअल’ क़ानून का वास्तविक दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि राजनैतिक विभाग को दिखाने के लिए मात्र खानापूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता था। धार्मिक मामलों को निपटाने वाली कचहरी भी निराशाजनक एवं घृण्य थी, जो जाति पर आधारित फ़ैसले सुनाती थी, प्रजा की संपत्ति ज़ब्त करती थी, उनके साथ मार-पीट करती थी और प्रजा पर क़हर बरपाती थी। प्रजा के साथ हाथापाई, गिरफ़्तारी आम बात थी। राज्य प्रशासन उन्हें बिना सुनवाई के क़ैद करता था और अपने आदमियों द्वारा प्रताड़ित करता था। लगान वसूलने का तरीक़ा बहुत जटिल था। जब मन चाहे, तब अतिरिक्त कर लगा दिए जाते थे और प्रजा से उन्हें बर्बरतापूर्वक वसूला जाता था।
दिनेश कुमार माली ने अपने उपन्यास में राजेश माँझी, बिजय कुमार प्रधान, यशोवंत मिश्रा, कमल लोचन बेहेरा, सुदर्शन मोहंती, विभूति भूषण साहू, प्रद्युम्न नाएक सुधाकर साहू, सुधाकर प्रधान, सिद्धि प्रसाद साहू, प्रो. शांतनु कुमार सर, डॉ. धरणीधर नाथ, श्रीमती कृष्णा मोहंती, सदानंद प्रधान, भुवनानंद प्रधान, धनेश्वर साहू, बिश्वरंजन प्रधान, लिपिका महापात्र और ऐसे अनेक पात्रों का ज़िक्र किया है, जिन्होंने अलग-अलग कालखंड में प्रजामंडल आंदोलन की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। जिसके विश्लेषण से पाठकों के सामने पबित्र मोहन प्रधान एक योद्धा और लोकप्रिय नेता के रूप में उभरकर सामने आते हैं। इस उपन्यास का मुख्य पात्र आनंद उनसे तत्कालीन जटिल ऐतिहासिक गतिविधियों एवं परिस्थितियों का ब्योरा एकत्रित करता है।
सन् 1931 में ओड़िशा गड़जात प्रजा सम्मेलन की स्थापना के बाद राज्य में नागरिक स्वतंत्रता बेठी, बेगारी, रसद आदि के उन्मूलन के साथ-साथ उत्तरदायी सरकार की माँग बढ़ती है, लेकिन कुछ ही समय बाद यह जन आंदोलन सुषुप्तावस्था में चला जाता है। 23 और 24 जून 1937 को कटक में फिर से ये माँगें उठने लगती हैं और देखते-देखते ओड़िशा के सभी गड़जात राज्यों में प्रजामंडल की स्थापना हो जाती है। ब्रिटिश ज़िला अंगुल को अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण प्रजामंडल आंदोलन की गतिविधियों के लिए केंद्र-बिंदु के रूप में चयन किया जाता है। यहाँ से तालचेर पाललहडा, बामरा, आठमलिक, हिंदोल और ढेंकानाल राज्यों के प्रजामंडल आंदोलन की गतिविधियों पर नज़र रखी जाती है।
तालचेर राज्य का प्रशासन राज परिवार के हाथों में पूरी तरह से था। राजा किशोर चंद्र देव के कुशासन के दौरान सन् 1930 और 1938 के बीच में तालचेर के लोगों को पबित्र बाबू छिपकर राजा के ख़िलाफ़ जागरूक कर रहे थे। बाद में, पबित्र बाबू शिक्षक की नौकरी छोड़कर राजनैतिक आंदोलन में भाग लेने हेतु कूद पड़े। तालचेर प्रजामंडल का ऑफ़िस तत्कालीन विधायक गिरिजा भूषण दत्त की मदद से अंगुल में खोला गया। राजा के प्रताड़णा से दुखी भयभीत लोगों ने तालचेर छोड़कर तालचेर-अंगुल की सीमावर्ती इलाक़ों जैसे पानीओला, नतडा, कोशला, कंपसला आदि जगहों पर शरणार्थीं शिविरों में शरण ली। 6 सितंबर 1938 को हज़ारों शरणार्थियों की उपस्थिति में कोशला में औपचारिक प्रजामंडल का गठन किया गया और जिसके अध्यक्ष पबित्र मोहन प्रधान को बनाया गया। अंगुल के लोगों ने ख़ासकर कोशला की प्रजा ने शरणार्थियों को न केवल खाने-पीने और रहने की सुविधा मुहैया कार्रवाई, बल्कि उन्हें नैतिक संबल प्रदान किया। कोशला शिविर का प्रभार गाँधीजी के अनुयायी गिरिजा भूषण दत्त, अंगुल के तत्कालीन एमएलए, समाजसेवी लक्ष्मीधर रायचौधुरी और साहिबाणी देवी को सौंपा गया था। प्रजामंडल की माँगों जैसे नागरिक अधिकार, सामंती करों का उन्मूलन वाला माँग-पत्र दरबार को भेजा गया। मगर राजा ने उस माँग-पत्र को अवैध क़रार देते हुए मानने से मना कर दिया, इसलिए प्रजामंडल ने सामूहिक विरोध जताने हेतु हर प्रकार से असहयोग, सभी प्रकार के प्रचलित करों को देने और राज्य के क़ानून का मानने से इंकार करने हेतु गाँधीवादी तौर-तरीक़ों को अपनाने का निश्चय किया। उपन्यास के मुख्य पात्र आनंद को विभूतिभूषण साहू और सुदर्शन मोहंती से यह जानकारी मिलने से वह प्रजामंडल आंदोलन के बारे में जानने के लिए और ज़्यादा उत्सुक हो जाता हैं। वह तालचेर-प्रजा के साहसिक कार्यों से काफ़ी प्रभावित हो जाता है और ख़ासकर प्रजामंडल आंदोलन के प्रथम शहीद बिका नाएक से, क्योंकि वह उनकी रेत में धँसी जीप को धक्का मारने से खुला मना कर देता है। इस असहयोग और अवज्ञा के कारण उसे अँग्रेज़ सैनिक की गोली का शिकार होना पड़ता है। बिका नाएक की यह शहादत तत्कालीन नेताओं और जनसाधारण में तीव्र आक्रोश की भावना पैदा करती है।
4 अक्टूबर 1938 को पबित्र बाबू अपने हस्तलिखित पत्र “मुक्तिपथ” के माध्यम से प्रजा से राजा को किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं करने की अपील करते हैं, जब तक कि राजा द्वारा उनकी माँगे नहीं मानी जाती हैं। वहीं से प्रजामंडल आंदोलन में राजा के ख़िलाफ़ सत्याग्रह की रणनीति शुरू हो जाती है। आनंद को यह जानकर बहुत आश्चर्य होता है कि किसी तरह सीधी-सादी, भोली-भाली नि:शस्त्र जनता अहिंसक तरीक़ों को अपनाते हुए अपने घर-परिवार को छोड़कर तालचेर के सीमावर्ती इलाक़ों में लगे नौ शिविरों में रहने चले जाती है, जिसमें कोशला का शिविर सबसे बड़ा होता है। इस वजह से गाँधी जी के साथ-साथ प्रजामंडल के नेताओं, कांग्रेस मंत्रालय, स्वयंसेवकों और ओड़िशा के स्थानीय नेताओं की ज़िम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती हैं। इस समस्या से नजात पाने के लिए सबसे बड़ा शरणार्थीं शिविर कोशला उनके लिए तीर्थ स्थान बन जाता हैं। जहाँ पर देश-विदेश के विभिन्न स्थलों से ब्रिटिश सांसद अगाथा हैरीसन, मानवतावादी पत्रकार सी.एफ़. एंड्रूज़, प्रोफ़ेसर एन.जी. रंगा, गाँधीजी के प्रतिनिधि ठक्कर बापा, हरे कृष्ण महताब, ओड़िशा के प्रधानमंत्री विश्वनाथ दास, रमा देवी, गोपबंधु चौधुरी, सारंगधर दास, नबकृष्ण चौधुरी और मालती चौधुरी जैसी महान हस्तियों के अतिरिक्त अखिल भारतीय मारवाड़ी रिलीफ़ फ़ंड के कार्यकर्ता, अखिल भारतीय मिशनरी के कार्यकर्ता, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादक और अनेक अख़बारों के संवाददाताओं ने अलग-अलग समय पर दौरा किया था। कहते हैं कि महात्मा गाँधी के सचिव महादेव देसाई ने भी यहाँ का दौरा किया था। आनंद यह जानकर बहुत प्रभावित होता है कि नौ महीने के दीर्घ पलायन के दौरान अत्यंत दयनीय अवस्था में होने के बावजूद तालचेरवासियों ने धैर्य नहीं खोया और अंत में भारी दबाव में आकर तालचेर के राजा को अपनी प्रजा की माँगें माननी पड़ीं।
यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि अगस्त क्रांति 1942 के दौरान सर्वोच्च नेता होने के कारण पबित्र बाबू की भूमिका और ज़्यादा ख़तरों से खेलने वाली होती चली गई। वे जेल गए, जेल से भागे; पहले टाटानगर गए और फिर छद्म वेश में कोलकाता गए। उन्होंने प्रजामंडल आंदोलन को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने का प्रयास किया। कितना सुंदर विचार था! नि:स्तब्ध होकर आनंद पबित्र बाबू के साहसिक कारनामों के बारे में सुनने लगा। यहाँ तक कि पबित्र बाबू ने गड़जात राजाओं के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सुभाष चंद्र बोस से मिलने के प्रयासों के दौरान उनके आत्मघाती दस्तों में शामिल होकर अपनी जान-जोखिम में डालते हुए अनेक ख़तरे उठाए। अपनी विप्लवी सक्रियता के कारण वह ब्रिटिश सरकार और तालचेर राजा के आँखों की किरकिरी बन गए। भूमिगत होने के बाद उन्होंने अपने अज्ञातवास के दौरान नेपाल, तिब्बत, भूटान और भारत के अन्य जगहों की यात्रा की।
स्वाधीनता मिलने के पश्चात भी उन्होंने ओड़िशा-राज्यों के विलय प्रक्रिया में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद प्रजामंडल आंदोलन का द्वितीय चरण भी घटना बहुल था। इस चरण में यह आंदोलन भारत छोड़ो आंदोलन अर्थात् गाँधीजी के आह्वान “करो या मरो” के साथ जुड़ गया। सभी शीर्षस्थ नेता गिरफ़्तार हो गए और उनकी जगह पर आ गए नवोदित नेतागण। आनंद अपने मित्र विभूतिभूषण साहू और धनेश्वर साहू के मुँह से पबित्र बाबू के तालचेर जेल से भागकर टाटानगर, कोलकाता, दिल्ली आदि जगहों पर भटकने की गाथा सुनकर हतप्रभ रह जाता है। इससे पूर्व तालचेर की कृषक सेना ने तालचेर के राजमहल पर धावा बोलकर तख़्ता पलटने का प्रयास किया था। 7 सितंबर 1942 को तालचेर के राजमहल पर प्रजामण्डल के आक्रमण की घटना आनंद को फ्रांसीसी क्रांति के बेस्टाइल दुर्ग गिराने (14 जुलाई 1789) और रूसी विपल्व के ख़ूनी रविवार (9 जनवरी 1905) की याद दिलाती है।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में पाँच जगहों पर बमवर्षक विमानों से गोले बरसाए थे, उसमें तालचेर भी एक है। पबित्र बाबू और उनके समर्थकों को अपने राज्य में न केवल अपने राजा, बल्कि ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। राजनीति में पबित्र बाबू एक दूरद्रष्टा के रूप में सामने आए और ग़रीबों के मसीहा बने। एक नागरिक, एक मंत्री और एक सांसद के तौर पर वह न्याय के पक्ष में रहकर उन्होंने हमेशा भ्रष्टाचार मुक्त शासन की वकालत की। यह दूसरी बात है कि अपने अडिग रवैये के कारण उनकी बहुत जगह आलोचना हुई, यहाँ तक कि उन्हें अपने पार्टी-सदस्यों के तिरस्कार को भी झेलना पड़ा। इस वजह से उन्होंने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी ‘जन कांग्रेस’ बनाई।
इस उपन्यास में ब्राह्मणी नदी का सुंदर वर्णन है। इस नदी के किनारे पोइपाल गाँव में पबित्र बाबू का जन्म हुआ था। ब्राह्मणी नदी और उनके गाँव से दिखने वाले पहाड़ ‘माल्यगिरि’ पर पबित्र बाबू ने कविताएँ लिखी हैं, अपने उपन्यास में इसके बारे में विस्तार से लेखक ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को जोड़ते हुए उल्लेख किया है। यहाँ उपन्यास इतिहास की बोझिल दिनांकों, पात्रों या तथ्यों की नीरसता से परे जाकर काव्यिक भाषा में ओड़िशा के अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों जैसे राधामोहन गडनायक की प्रेरक कविताओं पर भी आलोकपात करता है।
पबित्र बाबू पक्के गाँधीवादी थे। वे उनके दर्शन ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ में विश्वास रखते थे। उनके घर में केवल आवश्यक सामान ही होते थे। वे अपने कार्य जैसे सफ़ाई करना, रसोई करना, बाग़वानी करना आदि अपने हाथों से करते थे। इस वजह से वह अपने समकालीन नेताओं के लिए आदर्श व्यक्तित्व बन गए। उन्होंने अपने जीवन में अपरिग्रह को अपनाया। आजीवन उन्होंने अपने जीवन में उच्च कोटि के नैतिक और राजनैतिक मूल्यों का पालन किया था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ब्रह्मचारी संत की तरह गुज़ारा। वह अतिथि-वत्सल भी थे।
इस उपन्यास में तालचेर के राजाओं का इतिहास विस्तारपूर्वक दिया गया है। उपन्यास का समापन सौहार्द्रपूर्ण ढंग से होता है। जब आनंद की मुलाक़ात एक समाजसेवी दंपती बालकृष्ण साहू और रंजीता रानी से होती हैं, जो पबित्र मोहन प्रधान स्मृति संरक्षण कमेटी के तहत भुवनेश्वर में पबित्र बाबू की प्रतिमा लगवाने के लिए सरकारी संस्थानों से अभियान के तौर पर मुलाक़ात कर उन्हें अपना उद्देश्य बताते हैं तो आनंद उनसे कहता हैं, “आपका यह अभियान केवल प्रतिमा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ‘भारत रत्न’ का सम्मान दिलवाने के लिए भी आपको क़वायद छेड़नी पड़ेगी।”
निस्संदेह यह उपन्यास पबित्र बाबू के लिए ‘भारत रत्न’ की दावेदारी को न्यायसंगत ठहराता है। पबित्र बाबू की कट्टर ईमानदारी, नैतिक मूल्यों का अनुपालन हर अवस्था में, चाहे वह साधारण नागरिक हो, एमएलए या एमपी हो और देश के निर्माण में अपने जीवन उदाहरण को सामने रखकर जितने भी उन्होंने संघर्ष किए.; वे सब कल्पनातीत हैं। उपन्यास में एक जगह पबित्र बाबू कहते हैं, “अगर तुम मुझे इंद्र का पद दे दो तो भी मैं तुम्हारी पार्टी ज्वाइन नहीं करूँगा।”
जब उन्हें कांग्रेस पार्टी भ्रष्ट लगने लगी, तब उन्होंने वह दल छोड़ दिया। भ्रष्ट तरीक़ों से धनार्जन करने के वे सख़्त ख़िलाफ़ थे। सादा जीवन और उच्च विचार ही उनके जीवन का मूलमंत्र था। मैं पबित्र बाबू जैसे महान नायक के चरणों में शत-शत नमन करती हूँ और इस उपन्यास के शीर्षक को सही ठहराते हुए यह मानती हूँ उपन्यासकार की मेहनत तब सार्थक होगी, जब उन्हें देश का सबसे बड़ा सम्मान ‘भारत रत्न’ प्राप्त हो; ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अनन्य देशप्रेमी, आत्म-स्वाभिमानी, स्वतन्त्रता-सेनानी और स्वच्छ राजनीतिज्ञ पर गर्व अनुभव कर सकें।
प्रोफ़ेसर रमामंजरी साहू
सेवानिवृत्त इतिहास आँचार्य
सरकारी स्वयं शासित महाविद्यालय, अंगुल
विषय सूची
लेखक की कृतियाँ
- साहित्यिक आलेख
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- अमेरिकन जीवन-शैली को खंगालती कहानियाँ
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘विज्ञान-वार्ता’
- आधी दुनिया के सवाल : जवाब हैं किसके पास?
- इंसानियत तलाशता अनवर सुहैल का उपन्यास ’पहचान’
- कुछ स्मृतियाँ: डॉ. दिनेश्वर प्रसाद जी के साथ
- गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथा’ की यथार्थ गाथा
- डॉ. विमला भण्डारी का काव्य-संसार
- दुनिया की आधी आबादी को चुनौती देती हुई कविताएँ: प्रोफ़ेसर असीम रंजन पारही का कविता—संग्रह ‘पिताओं और पुत्रों की’
- धर्म के नाम पर ख़तरे में मानवता: ‘जेहादन एवम् अन्य कहानियाँ’
- प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
- प्रोफ़ेसर प्रभा पंत के बाल साहित्य से गुज़रते हुए . . .
- भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन
- भारत के उत्तर से दक्षिण तक एकता के सूत्र तलाशता डॉ. नीता चौबीसा का यात्रा-वृत्तान्त: ‘सप्तरथी का प्रवास’
- मुकम्मल इश्क़ की अधूरी दास्तान: एक सम्यक विवेचन
- मुस्लिम परिवार की दुर्दशा को दर्शाता अनवर सुहैल का उपन्यास ‘मेरे दुःख की दवा करे कोई’
- मेरी नज़रों में ‘राजस्थान के साहित्य साधक’
- रेत समाधि : कथानक, भाषा-शिल्प एवं अनुवाद
- वृत्तीय विवेचन ‘अथर्वा’ का
- समकालीन भारतीय साहित्य में प्रो. मीन केतन प्रधान के ‘पिता’ की सार्वभौमिकता
- समकालीन यथार्थवाद को उजागर करता प्रो. मीनकेतन प्रधान का काव्य-संग्रह ‘दुनिया ऐसी’
- सात समुंदर पार से तोतों के गणतांत्रिक देश की पड़ताल
- सोद्देश्यपरक दीर्घ कहानियों के प्रमुख स्तम्भ: श्री हरिचरण प्रकाश
- पुस्तक समीक्षा
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- उद्भ्रांत के पत्रों का संसार: ‘हम गवाह चिट्ठियों के उस सुनहरे दौर के’
- डॉ. आर.डी. सैनी का उपन्यास ‘प्रिय ओलिव’: जैव-मैत्री का अद्वितीय उदाहरण
- डॉ. आर.डी. सैनी के शैक्षिक-उपन्यास ‘किताब’ पर सम्यक दृष्टि
- नारी-विमर्श और नारी उद्यमिता के नए आयाम गढ़ता उपन्यास: ‘बेनज़ीर: दरिया किनारे का ख़्वाब’
- प्रवासी जीवन-संघर्षों पर आधारित धर्मपाल महेंद्र जैन का बहुचर्चित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’
- प्रवासी लेखक श्री सुमन कुमार घई के कहानी-संग्रह ‘वह लावारिस नहीं थी’ से गुज़रते हुए
- प्रोफ़ेसर नरेश भार्गव की ‘काक-दृष्टि’ पर एक दृष्टि
- मानव-मनोविज्ञान के महासागर से मोती चुनते उपन्यासकार प्रदीप श्रीवास्तव
- वसुधैव कुटुंबकम् का नाद-घोष करती हुई कहानियाँ: प्रवासी कथाकार शैलजा सक्सेना का कहानी-संग्रह ‘लेबनान की वो रात और अन्य कहानियाँ’
- सपनें, कामुकता और पुरुषों के मनोविज्ञान की टोह लेता दिव्या माथुर का अद्यतन उपन्यास ‘तिलिस्म’
- व्यक्ति चित्र
- अनूदित कहानी
- बात-चीत
- ऐतिहासिक
- कार्यक्रम रिपोर्ट
- अनूदित कविता
- यात्रा-संस्मरण
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- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 1
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 2
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 3
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 4
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 5
- रिपोर्ताज
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