पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार

पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

दुर्लभ विप्लवी के प्रति हृदयोद्गार

 

हिन्दी के बहुचर्चित लेखक दिनेश कुमार माली का अद्यतन उपन्यास “पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार” एक दुर्लभ विप्लवी दूरद्रष्टा राजनेता स्वर्गीय पबित्र मोहन प्रधान के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने अपने गृहराज्य तालचेर के दुर्दांत शोषक राजा और उनके पृष्ठपोषक अँग्रेज़ औपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ लड़ाकू कृषक सेना तैयार करने में अहम भूमिका अदा की थी। अपने अनन्य आदर्श, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और जानलेवा ख़तरों में जूझने का अदम्य साहस रखने के कारण वे शक्तिशाली अँग्रेज़ों और सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरणा से लोकनाएक के रूप में उभरे।

लेखक ने अपनी इस साहित्यिक रचना में कल्पना-प्रसूत कहानियों और घटनाओं के नाटकीय वर्णन के माध्यम से वास्तविक पात्रों के चरित्र का विकास किया है, जिससे ऐतिहासिक घटनाओं और अतीत के पात्रों के चरित्र जीवंत हो उठे हैं। कालक्रम की जटिलता से परे जाकर लेखक ने ऐतिहासिक स्थानों और पात्रों को उभारने के लिए अपने वर्णन में पारस्परिक वार्तालाप में उनकी संवेदनशीलता के साथ-साथ सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को‌ यथार्थ धरातल पर उकेरा है।

ओड़िया भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार फ़क़ीर मोहन‌ सेनापति ने अपनी आत्म-जीवनी ‘आत्म-जीवन चरित’ लिखी थी; जो ओड़िशा साहित्य की पहली आत्म-जीवनी है। जिसके बारे में साहित्यिक आलोचकों का कहना है‌ कि इस तथ्यपूर्ण आत्म-जीवनी में अपने गहन आत्म-विश्लेषण के दौरान उन्होंने औपन्यासिक भाषा शैली का प्रयोग किया है‌। धारा-प्रवाह के सातत्य, विशुद्ध गद्य शैली और प्रस्तुति की अद्भुत कलात्मकता के कारण कुछ पाठक इसे फ़िक्शन मानने की ग़लती करते‌ हैं।

हिन्दी के ख्यातिलब्ध लेखक, समालोचक और अनुवादक श्री दिनेश कुमार माली ने तालचेर प्रजामंडल के प्रथम शहीद के जीवन पर आधारित अपने बहुप्रशंसित उपन्यास ‘शहीद बिका नाएक की खोज’ में इतिहास की सच्ची घटनाओं को सर्जनशील कलात्मक भाषा में प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास में श्री माली ने मिथकीय चरित्र विक्रम-वेताल के पारस्परिक वार्तालाप के माध्यम से उन घटनाओं को पाठकों के सम्मुख रखा है। महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं के कालक्रम की संरेखिकता की ओर ध्यान दिए बग़ैर वे उपन्यास के पात्रों को भूतकाल और वर्तमान कालखंड में बातचीत करते हुए दर्शाते हैं।

जहाँ विक्रम जिज्ञासु और बुध्दिमान लेखक हैं, वहाँ वेताल तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के प्रथम शहीद बिका नाएक की भटकती बेचैन आत्मा। जिस तरह विक्रम वेताल कहानी में वेताल राजा विक्रमादित्य को कहानी सुनाता है‌ और फिर कहानी के अंत में अगली कहानी जारी रखने के लिए प्रश्न पूछता है, ठीक उसी तरह इस उपन्यास में शहीद बिका नाएक वेताल बनकर अपनी जीवन गाथा, ज़मीनी स्तर पर प्रजामंडल में अपनी सक्रियता के कारण 21 सितंबर 1938 को अँग्रेज़ों की गोली से शहीद होने से लेकर देश‌ आज़ाद होने और फिर सन् 2023 के प्रजामंडल दिवस पर आयोजित प्रजामंडल समारोह के ओजस्वी भाषण और कवि सम्मेलन की कहानी सुनाता है। जब वह स्थानीय लोगों को शोषक शासक के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित कर रहा था, उस समय‌ राजा के अँग्रेज़ पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी। भारत सरकार द्वारा बनाई गई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947) के शहीदों के शब्दकोश में शहीद बिका नाएक का नाम आधिकारिक रूप से दर्ज है। उपन्यास में अपने कथोपकथन के दौरान बिका नाएक की आत्मा सामाजिक न्याय के सवाल विक्रम के सामने उठाती है। उपन्यासकार दिनेश माली द्वारा प्रयुक्त अभिनव शैली में अत्यंत ही मार्मिक ढंग से यह दर्शाया गया है कि किस तरह जातिगत विभेद के कारण हाशिए पर फेंके गए दलित शहीद को जनता की सामूहिक स्मृति और इतिहास की मुख्य धारा वाली पुस्तकों से विस्मृत कर पूरी तरह से मिटा दिया गया। साहित्यकार की यह सृजनशील तकनीक एक दलित शहीद को समाज द्वारा पूरी तरह विस्मृत करने पर करारा प्रहार करती है।

लेखक ने अपने अद्यतन उपन्यास में प्रजामंडल आंदोलन के प्रणेता पबित्र मोहन प्रधान और शहीद बिका नाएक की पृष्ठभूमि को एक साथ उकेरा है। शहीद बिका नाएक की खोज के दौरान लेखक ने अपने शोध और कलात्मक शैली में न केवल शहीद बिका नाएक को पुनर्जीवित किया है, बल्कि सामूहिक विस्मृति और इतिहासकारों द्वारा की गई बड़ी भूल की ओर भी पाठकों का ध्यानाकर्षण किया है।

प्रजामंडल आंदोलन की शुरूआत ओड़िशा के गडजात राज्यों में ज़मीनी स्तर पर किसानों द्वारा की गयी, जिसमें दोहरे अत्याचारों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी गई। पहली, अत्याचारी सामंती राजाओं के ख़िलाफ़ और दूसरी, अँग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़। पबित्र मोहन प्रधान तालचेर प्रजामंडल आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे। उनकी एक आवाज़ पर बिका नाएक ने अपनी जान न्योछावर कर दी।

पबित्र बाबू की सूझ-बूझ, प्रभावशाली नेतृत्व, राजनैतिक दृष्टिकोण और मुफ़्त कार्य करने पर इंकार‌ कर देने से तालचेर साम्राज्य की नींव हिल गई। इस उपन्यास में पबित्र मोहन प्रधान को योद्धा, भविष्य द्रष्टा, साहित्यकार और उच्च कोटि के मानदंडों और मूल्यों पर आधारित राजनीतिज्ञ के रूप में दर्शाया गया है।

“पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार” उपन्यास में लेखक ने अलग सर्जनशील तकनीक अपनाई है। वह जगह-जगह जाकर अलग-अलग जानकार लोगों से पबित्र बाबू के बहुआयामी प्रभावशाली व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से सूचनाएँ संगृहीत करता है। इस उपन्यास का मुख्यपात्र आनंद मानो धागे वाली फिरकी के दोनों किनारों को पकड़कर उन्मुक्त गगन में लोकनायक पबित्र बाबू रूपी पतंग उड़ाकर विपुल जनारण्य में उनके नाम की स्तुति कर रहा है, ताकि जनहित में किए गए उनके कार्यों की ओर वर्तमान और आने वाली पीढ़ी अवगत हो सके।

लेखक ने भौगोलिक दृष्टि से यहाँ के पर्वतों और नदियों का सुंदर वर्णन किया है, जिससे स्थानीय अस्मिता की सुवास चारों ओर फैल सके; उदाहरण के तौर पर ब्राह्मणी, लिंगरा, बौली, सिंगड़ा, और नंदिरा जैसी नदियों का इतना प्रभावशाली वर्णन किया गया है कि कोई भी पाठक पढ़ते समय स्वतः उन जगहों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाएँगे। यही नहीं, लेखक ने उन स्थलों के चित्र बनाने में अपनी अद्भुत काव्यिक क्षमता और गौण कल्पना शक्ति का परिचय दिया है मानो किसी परिपक्व चित्रशिल्पी या शब्दों के जादूगर ने अपनी जादुई कलाकारी दिखाई हो। लेखक ने पबित्र बाबू के गाँव पोइपाल से दिखने वाले माल्यगिरि पहाड़ और एक अन्य बारूआं पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य का भी आकर्षक शैली में वर्णन किया है। 31 अगस्त 1942 को तालचेर जेल की दीवार फाँदकर रहस्यमयी ढंग से भाग जाने के दौरान बारूआं पहाड़ में छिपे थे। मानव पिरामिड पर चढ़कर जेल की ऊँची दीवार को बाँधने वाली अभूतपूर्व साहसिक घटना का ज़िक्र पबित्र बाबू ने अपनी आत्मकथा “मुक्तिपथे सैनिक” में किया है। लेखक द्वारा विभिन्न जगहों पर विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी का सजीव वर्णन पाठकों को पबित्र बाबू के बारे में उनकी राय से अवगत कराता है।

लेखक ने इस उपन्यास में मुख्य पात्र आनंद के माध्यम से तृतीय पुरुष वाली वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है, जिसमें उसका व्यक्तित्व ‘पेरिपेटेटिक’ है अर्थात् वह विभिन्न स्थान-काल-पात्रों से सूचनाएँ एकत्रित कर आधिकारिक संदर्भों से सत्यापित करता है ताकि पाठक बहुआयामी पबित्र बाबू के जीवन पर अपनी स्वतंत्र राय स्थापित कर सकें। यह उपन्यास घटना बहुल है जिसे लेखक ने सावयविक रूप से जोड़ा है।

इस उपन्यास के प्रथम अध्याय में आनंद अपने मित्र बिजय प्रधान के साथ नाविक राजेश माँझी की नौका में ब्राहमणी नदी में विहार करता है, जिसमें उनके पारस्परिक वार्तालाप से हमें पबित्र बाबू के जन्म-स्थान, शिक्षा और तत्कालीन वैमनस्यपूर्ण वातावरण की जानकारी मिलती है। यही नहीं, इस अध्याय में उनके साहस, दृढ़ निश्चय और समर्पण की भावना से भी पाठक अवगत होते हैं, जो उन्हें किंवदंती पुरुष पबित्र मोहन प्रधान बनाती है। नौका विहार के दौरान उनके द्वारा शादी के प्रस्तावों को ठुकरा देना, यहाँ तक कि राजा के प्रस्तावों को भी साहस पूर्वक मना करने के बारे में पाठकों को जानकारी मिलती है। वे अपनी आत्मकथा में कहते हैं कि उन्होंने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि प्रजा की पूरे समर्पण और एकाग्रता के साथ सेवा की जा सके। बारुआं पर्वत की तलहटी में रहने वाले सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक सुधाकर साहू कहते हैं कि पबित्र बाबू धार्मिक इंसान थे और उन्हें भागवत, गीता, पुराण, रामायण महाभारत आदि के अनेक अंश कंठस्थ थे। अपनी अनेक कविताओं में जैसे ‘चंद्रमा’, ‘भरत का अभिशाप’, ‘महाप्रयाण’ आदि में पबित्र बाबू ने मिथकीय पात्रों का सहारा लिया है। वे उच्च कोटि के कवि थे। उन्हें प्रचुर वनस्पतियों और प्राणियों को नाम याद थे। शब्दों को सटीक चयन, छंदों के प्रयोग और भाषा के माधुर्य के बारे में सिद्ध हस्त थे। साथ ही, वे एक अच्छे निबंधकार भी थे। उन्होंने समाजवाद, साम्यवाद तथा देश के अनेक मुद्दों पर आलोचनात्मक आलेख लिखे। वे महान चिंतक भी थे, जो अपनी प्रचंड बुद्धिमता और दुर्लभ अंतर्दृष्टि से देश की समस्याओं पर विचार-विमर्श करते थे।

एक उत्कृष्ट संगठक के तौर पर पबित्र बाबू की विशेष उपलब्धि तालचेर का हिजरात आंदोलन है, जिसमें 9 नवंबर 1938 को औपनिवेशिक पृष्ठभूमि में पल्लवित हो रहे सामंती शोषण के ख़िलाफ़ तालचेर से साठ हज़ार लोगों का सामूहिक पलायन था। यह पलायन राजा के द्वारा लगाए गए असहनीय करों और लगान के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के लिए किया गया था। इस शांतिपूर्वक पलायन का नेतृत्व पबित्र बाबू द्वारा किया गया था, क्योंकि किसानों ने राजा के ज़ुल्मों के सामने सिर झुकाना स्वीकार नहीं किया। वे नज़दीक वाले राज्य अंगुल में चले गए, जो कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आता था। वहाँ वे अनेक शरणार्थी शिविर लगाकर रहने लगे थे। महात्मा गाँधी ने प्रजा की न्याय-संगत माँगों को जायज़ ठहराते हुए हृदय से संबल प्रदान किया और ठक्कर बापा को उनके दुःख-दर्द की प्रत्यक्ष जानकारी लेने के लिए वहाँ भेजा। इस अहिंसक सामूहिक पलायन ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी का ध्यानाकर्षण किया। परिस्थिति की गंभीरता को भॉंपते हुए ब्रिटिश सांसद मिस अगाथा हैरिसन शरणार्थी शिविरों का मुआयना करने के लिए अंगुल में चार महीने का रुकी रही। पबित्र बाबू ने उन्हें तालचेर राजा के दुर्दांत शोषण के बारे में अवगत कराया, जिसमें ब्रिटिश संसद में बहस शुरू हुई। लगभग आठ महीने के बाद जून 1939 में प्रजा अपने घर जीतकर लौटी। राजा ने उनकी अनेक माँगों को मान लिया था और कृषि क्षेत्र में सुधार का आश्वासन दिया था। 21 मार्च 1939 को हैंसी-महताब संधि हुई, जिसमें ब्रिटिश शासित अंगुल के शरणार्थी शिविरों से अपने घर तालचेर लौटने के बाद सुरक्षा मुहैया करने की प्रतिश्रुति दी गई थी। इस उपन्यास में उन ऐतिहासिक घटनाओं का विश्वसनीय ब्योरा दिया गया है। लेखक को अपने इतिहासज्ञ मित्र स्व. विभूति भूषण साहू से इस संदर्भ में विशिष्ट जानकारी उपलब्ध हुईं।
विश्व के इतिहास में इस प्रकार का सामूहिक पलायन अद्वितीय है क्योंकि जितनी संख्या में लोगों ने पलायन किया था और इस पलायन ‌का नेतृत्व की सफलता ने लोकतांत्रिक ढांचे की नींव को मज़बूत किया। पबित्र बाबू के व्यक्तित्व का सबसे महत्त्वपूर्ण पहेलू उनका एक तरफ़ कट्टर गाँधीवादी होना है जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा “मुक्तिपथे सैनिक” में स्वीकार किया है, यह कहते हुए कि गाँधीजी इस आंदोलन के कमांडर थे और वह उनके समर्पित सैनिक, दूसरी तरफ़ वे सुभाष चन्द्र बोस की नीतियों और गतिविधियों से भी बेहद प्रभावित थे।

सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज जैसी सशस्त्र सेना के माध्यम से हमारे देश को अँग्रेज़ों की चंगुल से आज़ाद करने की पहल रखी। कट्टर गाँधीवादी पबित्र मोहन प्रधान ने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि हमारा देश शांतिपूर्ण अहिंसक तरीक़ों से आज़ाद नहीं हो सकता है, इसलिए सुभाष चन्द्र बोस की सशस्त्र सेना द्वारा युद्ध छेड़ने की योजना की ओर उनका झुकाव होना स्वाभाविक था। सुभाष चंद्र बोस का उन पर सम्मोहन इस क़द्र था कि उन्होंने उनसे मिलने के लिए जानलेवा ख़तरों से जूझते हुए बर्मा में तीन बार मिलने का प्रयास किया, वह भी तरह-तरह की छद्म वेशभूषा धारण कर। देशभक्त पबित्र बाबू ने सुभाष चन्द्र बोस के आत्मघाती दस्ते में दाख़िला लिया था। उनका साहस हमें ब्रिटिश सरकार की ऑंखो में धूल झोंककर भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत से होते हुए जर्मनी पहुँचने वाले सुभाष चन्द्र बोस के नाटकीय और रहस्यमयी तरीक़ों से 17 जनवरी 1941 को किए गये पलायन की भी याद दिलाता है कि किस तरह वे पेशावर पहुँचे और वहाँ से ख़तरनाक घाटियों से पार होते हुए काबुल पहुँचे और एक इटालियन पासपोर्ट बनाकर पहले सोवियत रूस पहुँचे और फिर वहाँ से 2 अप्रैल 1941 को बर्लिन पहुँचे।

उनकी ही तरह पबित्र मोहन प्रधान की यात्रा भी कम ख़तरनाक नहीं थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की नीति को अपनाया और किसानों को इस युद्ध में पारंगत होने का प्रशिक्षण दिया, जिसकी वजह से भीतर-ही-भीतर प्रजामंडल आंदोलन की लपटें चारों ओर भभक उठीं। यहाँ तक कि उन्होंने संगठित सशस्त्र गुरिल्ला सैनिकों के माध्यम से ‘चाषी-मूलिया राज’ (किसान मज़दूर सरकार) वाली समांतर सरकार की नींव रखी।

सामाजिक मूल्यों में अप्रतिम विश्वास रखने वाले राजनीतिज्ञ नबकृष्ण चौधुरी, प्रमुख गाँधीवादी नेता का भी लेखक ने आदरपूर्वक उल्लेख किया है, जिन्होंने नागभूषण पटनायक जैसे कुख्यात नक्सलवादी नेता के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील करने के लिए राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को पत्र लिखा था। उनके इस तरह के क्रियाकलापों से बहुत लोगों की भृकुटियाँ तनी थीं, लेकिन उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि नागभूषण पटनायक की प्रगाढ़ देशभक्ति और ग़रीबों के हितार्थ किए गए आंदोलन से वह बेहद प्रभावित हुए हैं। श्रीमाली ने अपने उपन्यास में बाजीराऊत छात्रावास का उल्लेख कर नया स्वरूप दिया है, जिसका नामकरण देश के सबसे छोटे शहीद के नाम पर किया गया है। इस छात्रावास की स्थापना नब कृष्ण चौधुरी और मालती चौधुरी के द्वारा की गई, जिन पर महात्मा गाँधी और रवीन्द्र नाथ टैगोर दोनों का प्रभाव था, क्योंकि वे चाहते थे दीर्घावधि तक जेल में रहने के कारण प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं के बच्चों की शिक्षा देने के लिए ऐसे छात्रावास की महती आवश्यकता थी। पबित्र बाबू भी इस छात्रावास में कभी-कभी आते थे क्योंकि यह स्थल स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ‘थिंक टैंक’ और प्रजामंडल आंदोलन का ‘नर्व सेंटर’ था। इसके अतिरिक्त, गड़जात गाँधी सारंगधर दास इस छात्रावास में बहुधा रुकते थे। लेखक की अंतरात्मा (अल्टर ईगो) के रूप में उपन्यास का मुख्य पात्र आनंद बाजीराऊत छात्रावास में नबकृष्ण चौधुरी और मालती चौधुरी की बेटी श्रीमती कृष्णा मोहंती, गाँधीवादी कार्यकर्ता से मिलने जाते है। जहाँ श्रीमती कृष्णा मोहंती और इंजीनियर धनेश्वर साहू आनंद के प्रश्नों का उत्तर देकर उसकी उत्सुकता को और बढ़ा देते हैं।

पबित्र बाबू के व्यक्तित्व का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, साहस और जुझारूपन है। जब महात्मा गाँधी, हरे कृष्ण महताब और दूसरे बड़े कांग्रेसी नेता उन्हें सुझाव देते हैं कि वह तालचेर राजा के सम्मुख सर्मपण कर दें, तो वे पूरी तरह से मना कर देते हैं क्योंकि उनके अनुसार यह समर्पण गाँधीजी के आह्वान ‘करो या मरो’ के विरुद्ध है और अपनी दलील देते हैं कि वह तालचेर राजा के पास या तो स्वतंत्र नागरिक की तरह जाएगा या फिर शासक की तरह; न कि शासित की तरह। इससे बढ़कर देशभक्ति और आत्म-सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है! 
देश की आज़ादी के बाद भी प्रजामंडल और पबित्र बाबू की भूमिका समाप्त नहीं होती है। अपनी सूझ-बूझ और दूरदर्शिता से उन्हें इस बात का अहसास होता है कि ओड़िशा के राजा-महाराजा अपने अधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। इस कारण पूर्वांचल राज्यों के राजा अपना अलग संगठन बना रहे हैं ताकि देश आज़ाद होने के बाद उन्हें सत्ता हस्तांतरण हो सके। यह जानकार पबित्र बाबू प्रजामंडल को संगठित कर राजाओं पर सशस्त्र धावा बोलने की योजना बनाते हैं, जिसे भाँपकर वे राजा ओड़िशा राज्य में मिल जाते हैं। अपने साहस और जनता को स्थानीय राजाओं के ख़िलाफ़ एकजुट करने में समर्थ होने के कारण पबित्र बाबू गड़जात राजाओं की राजनैतिक शक्ति को छुड़वाने में सफल रहे। ज़मीनी स्तर पर हो रहे अनवरत विरोध के कारण उन राजाओं के पास और कोई विकल्प नहीं था, सिवाय “इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ असेशन” पर हस्ताक्षर करने के।

तत्कालीन ओड़िशा के प्रधानमंत्री हरे कृष्ण महताब द्वारा 1 जनवरी 1948 को 25 राज्यों के ऐतिहासिक विलय के बाद पबित्र बाबू को अधिशासी पार्षद (1948-49) नियुक्त किए गया, ताकि प्रशासनिक गड़बड़ियों से प्रभावित राज-रजवाड़ों से मिलकर बने राज्य को प्रमुखता से ठीक किए जा सके।

उन्होंने राज्यों के विलय की संक्रमण अवस्था में बिगड़े नियम-क़ानून, तत्कालीन परिस्थितियों को सँभालते हुए सामंती सिद्धांतों को लोकतांत्रिक ढाँचे में बदलने हेतु महत्त्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने लोकतांत्रिक ढाँचे के निर्माण में दक्षता से कार्य किया और अनेक बार एमएलए, कैबिनेट मंत्री बने और 1967 से 1970 में उपमुख्यमंत्री बने। मंत्री के तौर पर उन्होंने अनेक विकासधर्मी पदक्षेप लिए, जैसे पाठ्य-पुस्तकों का राष्ट्रीयकरण और अधिक से अधिक विद्यालय खोलना, ताकि आम जनता की शिक्षा तक पहुँच हो सके। वे सामाजिक मूल्यों और माप-दंडों में विश्वास रखने वाले राजनेता थे। उन्होंने राजनीति हेतु भ्रष्ट तौर तरीक़ों को नकारा और विचलित हुए बिना वे अपने पथ पर लगातार बढ़ते गए। उन्होंने सरकार में और सरकारी जगहों पर हो रहे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ रखा। जीवन में ईमानदारी, त्याग के मूल्यों पर आधारित राजनीति में उनका प्रगाढ़ विश्वास था। आधुनिक युग के पाखंड, दिखावा, चारों तरफ़ भ्रष्टाचार एवं अपराध जनित राजनीति में अगर कोई पबित्र बाबू की ओर देखता है तो उन्हें उनमें आशा की किरणों वाला उज्जवल नक्षत्र नज़र आता है।

अपने इस उपन्यास में दिनेश कुमार माली ने दुर्लभ विप्लवी के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाने का प्रयास किया है। जिसके लिए ग़रीबों और हाशिए पर रह रहे लोगों के विकास हेतु राजनीति माध्यम बनती है। वे ग़रीबों के मसीहा थे और एक सच्चे गाँधीवादी भी; मगर आगे चलकर महान सुभाषचंद्र बोस की हिंसक रणनीति के साथ घुल-मिल गए‌। तकनीकी तौर पर यदि देखा जाए तो यह ‘टेस्टीमोनियल’ उपन्यास है। जिसमें पबित्र बाबू के जीवन के विभिन्न बिंदुओं पर और उनके तौर-तरीक़ों पर ग़ौर किया गया है। इस उपन्यास के मुख्य स्वर व अंतर्वस्तु ‘पोलीफोनी’ है, जिसमें अनेक स्वतंत्र और उतनी ही वैध आवाज़ों और पहलुओं पर आलोकपात किया गया है।

श्रीमाली का नैरेटिव विभिन्न पात्रों और विषयों के बीच भाव सागर की उर्मियों की तरह उछल-कूद करता हुआ नज़र आता है। सामान्यतया पारंपरिक उपन्यास में केवल सर्वज्ञात बिन्दुओं पर विचार किया जाता है, जबकि ‘पोलीफोनिक’ उपन्यास अपने पात्रों को अपनी बात, पक्ष और विचार रखने की खुली छूट देता है। इस उपन्यास में एकल संरचना की रेखा खींचने की जगह बहुल संरचनात्मक विचार-विमर्श के स्वर और अंतराल को पाटते हुए अर्थ का अनुसंधान किया गया है।

उपन्यास का शीर्षक ‘पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार’ पाठकों का तुरंत अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता है कि लेखक ने अपनी तरफ़ से जनता और सरकार के समक्ष उनके लिए ‘भारत रत्न’ दिए जाने की जो माँग रखी है, वह पूरी तरह से न्याय-संगत है। जिससे भारत के एक महान सपूत, महकाव्यिक धीरोदात्त व्यक्तित्व को भारत के सबसे बड़े पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा जा सके। वह भारत का नगीना था, जो विप्लवी होने के साथ-साथ संत जैसे गरिमामय अपवादस्वरूप राजनीतिज्ञ थे। यह उपन्यास भूतकाल और वर्तमान के बीच संवाद करता है ताकि राष्ट्र के सुनहरे भविष्य के लिए अतीत में हुई ग़लतियों की पुनरावृत्ति नहीं हो।

सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर शांतनु सर 
अंगुल स्वयंशासित महाविद्यालय 
अंगुल (ओड़िशा)

<< पीछे : विचार क्रमशः

लेखक की कृतियाँ

साहित्यिक आलेख
पुस्तक समीक्षा
व्यक्ति चित्र
अनूदित कहानी
बात-चीत
ऐतिहासिक
कार्यक्रम रिपोर्ट
अनूदित कविता
यात्रा-संस्मरण
रिपोर्ताज
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में