पर्वत, जो मूक खड़े हैं
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
पर्वत एक विशाल तन लिये
एक अचल मन लिये
एक विश्वास के साथ
देता है हौसला हमको
मुसीबतों में
खिलखिलाकर हँसने की
एक चेतना देता है
कई थपेड़े सहकर
मूक खड़े हैं पर्वत
जो अविचलित है
जीवन की हर मार सहकर