मेरी दृष्टि
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
मेरी दृष्टि
वहाँ तक जाती है
उन बस्तियों तक
जिन बस्तियों में
झेलता ग़रीब का तन
विवशता से लड़ता
लाचारी का दूध पी रहा है
पूरा कुनबा
सिर्फ़ वहाँ रहती है
एक रोटी की तलाश
क्षुधा शान्त करने की
सुबह से शाम तक
तरकीब निकाली जाती है
अगले दिन का
जिनके पास
कोई भविष्य नहीं होता है
एक जहाँ अनवरत
संघर्ष का दौर होता है . . .।