दिन धीरे-धीरे ढल रहा था... ख़ुशी इस बात की थी कि बदतर हालत की वज़ह से लगा मजमा ख़त्म हो जाएगा। अँधेरा ऐसे बढ़ रहा था मानो आग़ोश में भर लेना चाहता हो। ख़्याल आया पापी पेट का... निहायत बेतुका सवाल... रोज़ की तरह आज भी ख़ानाबदोशी की परछाईं मानो मुझे चिढ़ा रही हो। मेरे सामने एक कुत्ता खाने का थैला लिए भाग रहा था, मन तो किया कि थैला छीनकर परछाई को दे मारूँ, तभी दौड़ने की आहट हुई... ज़रूर कोई रईस अपने कुत्ते को थैला देकर दौड़ाने का खेल खेल रहा होगा... मेरे उदास मन की उपज!

साहब ऐसे ही होता है... रईस खाने से खेलते हैं और हम ज़िन्दगी का पूरा खेल ही खाने पर खपा देते हैं। लगा मन और भूख का आपसी मतभेद चल रहा है। लेकिन नहीं! सच ही तो है। बताते चलूँ वह कुत्ता सच में मेरे जैसे भिखारी के खाने का थैला लिए भाग रहा था। भूख ने ललकारा और डार्विन के सिद्धांत की पुष्टि की। मरता क्या न करता... कुत्ता...पीछे एक भिखारी... उसके पीछे मैं, सही अर्थों में एक और भिखारी..! आज पहली दफ़ा रोटी के लिए ऐसे दौड़ लगा रहा था मानो उसैन बोल्ट नामक विश्व का सर्वश्रेष्ठ धावक मेरा प्रतियोगी हो। मेरे विचार से भूख उसैन बोल्ट जैसे प्रतियोगी से भी कहीं ऊपर है। 

दौड़ते-दौड़ते ऐसा दृश्य देखा, मानो पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो...! एक दूसरा रईसज़ादा कुत्ता थैला छीन गाड़ी में जा बैठा, अब तो थैले के तरफ उँगली उठाना भी किसी संगीन अपराध से कम नहीं था। रात की काली घटा का मैं स्वयं इस बात का चश्मदीद। भूख के लिए भूख पहली दफ़ा बलवती नज़र आ रही थी। वास्तविक अर्थों में भूख संसार को जीवंतता प्रदान करती है - आज पता चला। एक ऐसा दृश्य जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया... वो था खाने का थैला जिसे रईस मालिक ने चलती गाड़ी से एक गटर में फेंका जहाँ से उस पुरस्कार को पाना हम तीनों प्रतियोगियों के लिए असंभव।

ऐसे ही होता है साहब! जिसके लिए हम जैसे विशेष समुदाय संघर्ष करते नज़र आते हैं। रईसज़ादों का समुदाय बिना किसी आत्ममंथन के चकनाचूर कर देते हैं हमारे सपने। बड़ी बात तो यह कि उनको इसका कोई मलाल भी नहीं होता है। ऐसा दिखाते हैं मानो ग़लती के जगह उपलब्धि की कोई बड़ी इबारत लिखी दी हो। 

आगे बढ़ा तो ख़ुदा का घर दिखाई दिया ...सोचा चलो यहाँ तो पक्का मेरी भूख को बोलने का मौक़ा नहीं मिलेगा..। देखा तो वही साहब अपना कुत्ता गाड़ी में छोड़कर ख़ुदा के घर में दाख़िल होने की जद्दोजेहद कर रहे थे। उनके हाथ में दूध से भरा बर्तन... और मेरी नज़रें उस पर एक टक लगाए देख रही थीं। तभी साहब की नज़र मुझ पर पड़ी। उन्होंने ऐसे देखा मानो मैंने कोई संगीन ज़ुर्म कर दिया दूध की तरफ़ देखकर...। फिर भी मैंने झूठी तस्सली देकर भूख को शांत कराया। हैरानी तो तब हुई जब इबादत के बाद ज़नाब के हाथ मे केवल बर्तन था- दूध ग़ायब! ...एक पल लगा मानो ख़ुदा को बहुत प्यास लगी थी... परन्तु उस सृष्टिकर्ता को भूख और प्यास कहाँ? मेरी अंतरात्मा ने धीरे से कहा- उस सृष्टिकर्ता को भूख और प्यास कहाँ?  नाकामयाबी ने मानो मेरे हौसले को शमशान घाट पहुँचा दिया हो। निराश मन से ज़मीन पर बैठा ख़ुदा से दरख़्वास्त कर रहा था। लगा... क्या पता ख़ुदा का कोई दूत मानव के वेश में आ जाये मदद के लिए।

आँखें बंद करने के बावजूद भी मेरा ध्यान खाने पर जा रहा था। ...वर्षों से चला आ रहा प्रचलित वाक्य भूखे पेट न होय भजन गोपाला... समझ आ गया था और यह भी कि लोग अन्न की इबादत क्यों करते हैं? किसी के आने की आहट पाकर आँखें खोलीं तो देखा एक आदमी हाथ में ख़ाना लिए आगे बढ़ रहा था। अपनी तरफ़ आते देख लगा कोई दूत है... ख़ुदा ने दुआ क़बूल कर ली हो। मेरे पास आने से पहले ही उसने मुड़कर बग़ल में रखी कूड़ेदान में पूरी और सब्ज़ी का थैला, जो उसके हाथ में था, फेंका। मैंने सोचा मना करूँ फेंकने से... पर पता था ज़नाब मेरे ऊपर हिरोशिमा और नागासाकी जैसा पर वैचारिक बम फोड़ देंगे। फेंकते वक़्त कुछ पूरियाँ और सब्ज़ी बाहर ही गिर गयी। मानो उनको मेरे पर तरस आ गया हो। मेरी भूख ने मुझे ज़ोर से डाँटा, मानो थोड़ी दूर पर खड़े कुत्तों की तरफ़ इशारा कर रही हो। उनको देखकर लग रहा था उनका पेट भरा हुआ है। मैंने खाना उठाया, छूने से लगा अभी ताज़ा था पर पेट भर जाने की वज़ह से जनाब ने फेंका था। सवाल करने का वक़्त कहाँ? वक़्त ज़ाया किये बग़ैर खाने में मशगूल हो गया... पापी पेट के वास्ते! इस तरह मशक़्क़त भरा सफ़र आख़िर क़ामयाबी में तब्दील हो गया और मैं... नई सुबह की उम्मीद लेकर नींद की बाँहों में लिपट गया।

 

2 Comments

  • 2 Jun, 2019 02:02 AM

    Hurt touching.....very nice ...and thanks for sharing this one.

  • 1 Jun, 2019 05:16 PM

    बहुत सुन्दर ज़ाहिर

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