मन- फ़क़ीर का कासा

01-01-2020

मन- फ़क़ीर का कासा

अनुजीत 'इकबाल’

मेरी आकाशगंगा में
केवल एक नक्षत्र प्रदीप्त था,
असंख्य तारागणों की रोशनी लिए हुए।
पर, धीरे धीरे वो रोशनी
मद्धिम पड़ने लगी तो 
रतजगों में डूबी मैं
अपने हताश और तमसावृत कक्ष से
उड़ा रही हूँ
दुआओं के परिंदे


परिंदे फड़फड़ा रहे हैं अब
सुदूर बगदाद की
ग़ौस-ए-पाक नीली दरगाह पर
शायद, सूफ़ियों के दर पर
दुआएँ ऐसे ही
पंख झटकारती हैं।


दरगाह के बाहर
अनहद बाजा लिए
एक फ़क़ीर बैठा है
दुआओं के परिंदे देख
वो अपना ख़ाली कासा देख
मंद मंद मुस्कुराता है
लोबान की सुगंध
वायु में घुल जाती है और
परिंदे स्वतः अदृश्य हो जाते हैं


सूफ़ी उठ खड़ा हुआ
और वर्तुल नृत्य कर रहा है
बाएँ हाथ से ब्रह्मांड और दाएँ से
पृथ्वी घुमा रहा है
अब, असंख्य आकाशगंगाएँ 
दिखने लगीं, और मैं
एक नक्षत्र के लिए उद्वेलित थी


अनबूझे जज़्बात लिए
खड़ी हूँ अपनी समग्रता लिए
मानो चित्त ने विस्तार लिया
मन सूफ़ी का ख़ाली कासा हुआ
अज्ञानतिमिर का निदान हुआ

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