लुढ़कती बूँदें

01-08-2020

लुढ़कती बूँदें

वेदित कुमार धीरज

स्याही आसमानों से 
लुढ़कती बूँदें और बूँदों की आवाज़ें 
जो पत्तों से सरककर 
खेतों में बिछ जाती हैं 
और जनती हैं मिट्टी की सुंगंध 
मंत्रमुग्ध करती हैं मन 
और समा जाती हैं 
प्रकृति की हर दिन बदलती 
अनंत रंगीन किताब में 
और मिटा देती हैं 
अंदर की कलुषा 
जैसे कवक-फफूँदें मिला देते हैं 
मिट्टी में गिरी हुए हर अवशेष को 
बिना परहेज़ के। 


मैं और मेरा सारा वजूद 
मज़हब के कुछ चंद रंगों में  
उलझ के रह जाता है 
शहर की दीवारों, छज्जों और इश्तिहारों में 
गर कोई निकाल दे इन्हें
शायद ही पहचान पाए 
आसमान का इंद्रधनुष के रंग
मेरी बदली हुई ये दुनिया है 


जिसमें इतनी तपन है 
ये सिर्फ़ गर्मी नहीं 
अंधाधुंध बेतरतीब 
दौड़ते घोड़ों के नथुनों से 
निकलती भाप है 
जो सारी हवाएँ सोख ले 
नदिया पी गए 
प्यास न बुझी 
तो समुन्दर पी रहे हैं 
इनके उत्सर्ग इतने विषैले 
कि कवक-फफूंदें भी नहीं 
मिला सकते मिट्टी में 


विकास के ये पैमाने जो 
गढ़े गए थे महामहिमों ने टेबल पर 
थोप दी थीं सारी बेढंग क़वायदें
भर लिए नोट 
बेच दी महकती साँसें 
बदल दिए उसूल 
काटे जंगल 
ख़त्म कीं सैकड़ों नदियाँ 
बाँट दिए लाखों तालाब
निगल लिए कई समूचे पहाड़ 
लालसा न रुकी फिर भी 


महसूस किया मैंने 
महीनों की कोरोना-क़ैद 
बेसहारा और बेघर होना भी
हरपल मौत का साया 
जब अतरिक्त विकल्प सारे हथियार 
और तैयारियाँ 
सारा विकास
मानो कम पड़ गए  
"मैं" ही जो सर्वश्रेष्ठ 
भ्रम टूटा 
या अभी भी है शेष?

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