27-12-2018

ऐसे-वैसे रिश्ते

डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

जब तृषा से अर्व का सामना पहली बार हुआ तो वह कुछ पल उसे एकटक देखकर यह सोचता रह गया कि इस जहान में ऐसी भी औरतें हैं जिनके पास न शक़्ल होती है, न सूरत; लेकिन, इतनी बन-ठन कर रहती हैं कि नज़र बार-बार उनके भड़कीले पहनावे और साज-शृंगार पर ठहर ही जाती है।

अर्व उस फ़्लैट में कोई डेढ़ साल पहले आया था। उसका पत्नी- रंभा से तलाक़ हो गया था क्योंकि उसने उसे अपने ही घर में एक ग़ैर-मर्द के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था। उस क्षण उसके बदन में ग़ुस्से की बिजली कौंध गई थी। उसके जी में आया कि वह बरामदे में पड़े बल्ले से दोनों के सिर फोड़कर उनका काम तमाम कर दे। उस पल पता नहीं, वह क्या कर बैठता? पर, उसकी सदबुद्धि ने ऐसी हिंसक हरकत करने के पहले उसे कुछ पल तक बुत बना दिया। तब, वह ग़ुस्से को पीते हुए तुरत-फुरत जीने से उतरकर नीचे आ गया। नीचे जाते हुए उसकी आँखें रंभा से मिलीं भी; पर, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और रंभा समझ चुकी थी कि उसकी इस हरकत का अंजाम क्या होगा।

अर्व उसी शाम अपने दोस्त तरुण के फ़्लैट पर आ गया। वह उससे दिल खोलकर बातें बता दिया करता था। पर, उस शाम वह चुप्पी ही साधे रहा। जबकि वह उसके चेहरे पर ग़ुस्से और तनाव की छाया देखकर बार-बार पूछे जा रहा था कि क्या आज भाभीजी से फिर तूं-तूं मैं-मैं हो गई है।

वह बनावटी मुस्कुराहट से अपने ग़ुस्से को बख़ूबी छिपाते हुए बोल पड़ा, "तुम्हारी भाभी यूएस के लिए वीज़ा बनवाने अपनी सहेली करीना के घर गई हुई है। बेटे पुत्तुल ने उसे बुला रखा है। वहाँ वह कोई छः महीने रहेगी।"

तब, तरुण ने अपनी नज़रें उसके सीने में चुभो दीं और शायद यह सोचने लगा कि “बच्चू, आज तो तुम्हारा सफ़ेद झूठ तुम्हारे आईने जैसे चेहरे में साफ़ झलक रहा है। कोई ख़ास बात ज़रूर है जिसे तुम बताना नहीं चाहते…”

अर्व ने बार-बार अपनी आँखें मिचमिचाई और अपने हावभाव में सहजता लाने का प्रयास किया। फिर, उसने उसके वन-बेडरूम फ़्लैट में चारों और नज़रें दौड़ाईं तो वह बोल पड़ा, “अर्व, कुछ लोगे क्या? इस समय तो तुम्हें सिर्फ़ चाय पिला सकता हूँ। गैस ख़त्म हो गई है; हाँ, इलेक्ट्रिक केतली में पानी गर्म करके डिपवाली चाय ही मिल पाएगी।”

पर, अनजाने में ही अर्व अपने पेट पर हाथ फेरने लगा तो तरुण उसका मतलब समझ गया। लेकिन, अर्व अगले ही पल बोल पड़ा, "नहीं-नहीं, मैं ख़ुद बाहर जाकर कोई चाइनीज़ नूडल्स टाइप चीज़ खा आता हूँ।"

तरुण भी साथ चलने को हुआ तो अर्व बोल पड़ा, "क्या तुमने भी अभी तक कुछ नहीं खाया है?"

वह मुस्कराया, "अरे अर्व, मैं तो ऑफ़िस से लौटते वक़्त ही रेस्तरां से खाते हुए आता हूँ। शाम को थका-माँदा होने के कारण फ़्लैट में आकर बस आराम करना चाहता हूँ।"

ख़ैर, अर्व ने बाहर जाकर एक फ़ुल प्लेट चाऊमिन खाया और वापस आकर तरुण के बगल वाले बेड पर सो गया। उसे यह सोचकर हैरानी हो रही थी कि रंभा ने उसे फोन करके अपनी सफ़ाई में कुछ कहा क्यों नहीं। उसे तो गिड़गिड़ाते हुए माफ़ी माँगनी चाहिए। बहरहाल, वह तो अपराध-बोध के समंदर में साबूत डूब-उतरा रही होगी।

अर्व ने पहले भी कॉलोनी में उस आदमी को उसके क़रीब आकर उससे हॉय-हैलो करते हुए देखा-सुना था; पर उसके दिमाग़ में ऐसा-वैसा कोई भी शक़ का कीड़ा नहीं रेंगा। अगर शाम को वह ऑफ़िस से ज़ल्दी नहीं लौटता तो शायद वह रंभा को रंगे-हाथ पकड़ भी नहीं पाता।

पचास साल की औरत को और वह भी शादीशुदा, जिसका बेटा अमरीका की एक मशहूर कंपनी में सीनियर एनालिस्ट है और बेटी ब्याहकर सिंगापुर में सैटल हो चुकी है, इस तरह ग़ैर-मर्द के साथ इश्क़ फ़रमाते हुए देखना भला किसे अच्छा लगेगा?

अर्व को नींद क़तई आने वाली नहीं थी। रात के दो बजे तक वह सन्नाटे की धमक सुनता रहा। उसके जी में आया कि वह फोन करके रंभा को हज़ार गालियाँ दे। लेकिन वह अपनी सारी उत्तेजना को पीता चला जा रहा था। बरदाश्त करने की सारी हदें पार करता जा रहा था! वह करवटें बदलते-बदलते उकताकर आहिस्ता से फ़्लैट के बाहर आ गया। तरुण को एक छोटा-सा खटका भी नहीं लगने दिया कि उसे नींद नहीं आ रही है और वह बाहर जा रहा है, उस समय तरुण बेतहाशा खर्राटे भर रहा था।

जीने से नीचे उतरकर उसने अपना सिर झटका। रात बहुत गर्म नहीं थी। वह अपार्टमेंट के नीचे एक पत्थर पर बैठ गया। सिर तनाव के कारण दर्द से फटा जा रहा था। इस तिरपन साल की उम्र में उसके मन में पत्नी रंभा के प्रति बेहद जुगुप्सा पैदा हो रही थी। वह योजना बना रहा था कि किस तरह से उस दुष्चरित्र औरत को सबक सिखाया जाए। बेशक़, उसके बारे में बेटे पुत्तुल को सारी बातें साफ़-साफ़ बता देनीं चाहिएँ। उसने उस देर रात को यूएस में बेटे का मोबाइल फोन घनघनाया तो उधर से बिना समय खोये प्रतिक्रिया मिली। जैसे कि वह अपने पिता के ही फोन का इंतज़ार कर रहा था। पुत्तुल बिना चौंके बोल पड़ा, "पापा, क्या नींद नहीं आ रही है? मॉम ने फिर कोई नया नाटक शुरू कर दिया क्या?"

पुत्तुल को अर्व ने सारी बातें खोलकर बता दीं। वह उसकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं कर पा रहा था। उसे जैसे पिता के कहे पर यक़ीन ही नहीं हो रहा हो। जब अर्व ने उससे पूछा कि अब मैं क्या करूँ तो वह रुआँसा हो उठा, "पापा, मैं क्या बताऊँ? आपके जो जी में आए, वही कीजिए।"

सुबह देर से उठने के बावज़ूद अर्व जल्दी ही तैयार होकर कोर्ट पहुँच गया और एक वकील से मशविरा करने के बाद एकतरफ़ा तलाक़नामा दाख़िल कर दिया। उसी दिन दोपहर को सिंगापुर से कामना बेटी का फोन आया और वह उनसे बग़ैर लाग-लपेट के बोल पड़ी, "पापा, आप मॉम से क्यों नाराज़ होकर चले गए? वापस घर लौट जाइए। मॉम बहुत परेशान हैं।"

निस्संदेह, रंभा ने उसे फोन किया होगा और बताया होगा कि किसी नाचीज़-से मुद्दे पर तुम्हारे पापा ने नाराज़ होकर घर छोड़ दिया है। पर, उसने तो ऐसा गुनाह किया है जो माफ़ी के क़ाबिल नहीं है। हाँ, उसके विश्वास को छला है। अर्व ने पलभर को सोचा कि कामना को इन बातों से दूर रखना ही मुनासिब होगा। तब, उसने "अच्छा, ठीक है" कहते हुए मोबाइल फोन बंद कर दिया। हाँ, स्विच ही ऑफ़ कर दिया कि कहीं कामना दोबारा ना फोन कर दे और उसे सब कुछ सच-सच बताना पड़े। अगर ये बातें दामाद, पल्लव को पता चलीं तो उसके दिमाग़ पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा?

उसी शाम अर्व ने कौशांबी के एक अपार्टमेंट में फ़्लैट किराए पर ले लिया। गुज़ारे के लिए गृहस्थी के लिए कुछ ज़रूरी सामान-असबाब भी जुटा लिए और अपने बलबूते पर दफ़्तर भी आने-जाने लगा। तब तक अपराधबोध से ग्रस्त रंभा ने भी उससे किसी तरह से संपर्क नहीं किया। वह ऐसा करती भी कैसे? क्योंकि सामने आकर आँख मिलाना तो दूर, उससे बातें भी कैसे कर सकती थी? कोई एक माह बाद, वकील ने कोर्ट में रंभा के साथ उसकी मुलाक़ात करवायी। उसने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं; अर्व बार-बार कहता जा रहा था कि वकील सा'ब, अब क्या बचा है? ये तो ख़ुद मान रही है कि उसने एक ग़ैर-मर्द के साथ जिस्मानी रिश्ते बनाए हैं तो अब तो तलाक़ तय है ना! तो भी वकील त्यागी ने दोनों को भरसक समझाने की कोशिश की। रंभा बार-बार कहती जा रही थी कि किसी शारीरिक संवेग में विवश होकर और बहकावे में आकर उसने वह ग़लत काम किया था; लेकिन भविष्य में वह ऐसा कभी नहीं करेगी। पर अर्व था कि किसी तरह भी अब समझौते के लिए तैयार नहीं हो रहा था।

कोई छः महीने बाद कोर्ट की सारी कार्रवाई पूरी होने पर दोनों के बीच तलाक़नामा लागू हो गया। उसके कुछ ही सप्ताह बाद, बेटा पुत्तुल दुर्गापूजा पर उससे मिलने आया। उसके चेहरे पर अजीबोग़रीब ख़ामोशी पसरी हुई थी, जैसे कि वह मन ही मन शिकायत कर रहा हो कि पापा, आपने जब इतना लंबा समय मम्मी के साथ गुज़ार ही लिया था तो उम्र की इस दहलीज़ पर मम्मी के साथ एक समझौता तो कर ही सकते थे। पर, अर्व को तो गर्व हो रहा था कि आख़िरकार उसने रंभा को एक यादग़ार सबक सिखा ही दिया जिसे वह मरते दम तक नहीं भुला पाएगी। बहरहाल, दामाद- पल्लव ने भी उनके बारे में सारी बातें पता चलने के बाद उससे मुलाक़ात की। उसके साथ तो वह कोई एक सप्ताह तक रहा; फिर रंभा के पास यह कहते हुए चला गया कि “मैं तो पुराने रिश्ते के साथ ही जीऊँगा, आप जैसे देवता-समान ससुर के साथ और आपकी भूतपूर्व पत्नी और अपनी सास के साथ।”

उस पल, निस्संदेह! अर्व उसकी इस सुलझी सोच का कायल हो गया।

फ़्लैट में एकाकीपन के साथ जीते हुए अर्व का दिल दुनियावी बातों से उचटता जा रहा था। अगले सात सालों बाद उसका सरकारी सेवा से रिटायरमेंट होना था। लेकिन, उसकी इस अवस्था में यह एक नई कहानी शुरू हो गई थी। शाम को ऑफ़िस से लौटकर वह ज़्यादातर दरवाज़े पर ईज़ीचेयर लगाकर बैठ जाता था। उसके कुछ ही देर बाद तृषा ठीक उसके सामने वाले अपने फ़्लैट में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करती थी। गेट पर लगे ताले को खोलने से पहले वह उसे घूरकर देखती थी, जिसमें आत्मीयता का पुट ज़्यादा रहता था। फिर, कुछ इस तरह मुस्कराकर तेज़ी से अंदर चली जाती थी जैसे कि उसके किसी चहेते ब्वॉयफ़्रेंड ने उसे छेड़ दिया हो। यह क्रिया-क्रम कोई महीने भर चलता रहा; फिर, वह स्वयं अर्व को आते-जाते गुड-मॉर्निंग और गुड इवनिंग आदि भी करने लगी थी। उसने सोचा कि शायद, पड़ोसियों के संपर्क में रहने और आड़े दिनों में एक-दूसरे के काम आने के लिए किसी अकेली औरत के लिए ऐसी औपचारिकता आवश्यक होती होगी। बहरहाल, वह अधिकतर सोचता रहता कि क्या इन बातों का कोई निहिताशय भी हो सकता है।

उसे किसी उत्सव-त्योहार के दिन से बड़ी शिकायत रहती थी। उस होली के दिन भी वह अनमना-सा मायूस बना बैठा था; हालाँकि उसके पास सुबह से उसके दोस्तों के कई फोन आ चुके थे। रंभा से अलग होने के बाद यह उसकी तीसरी होली थी। पिछली होली को तो तरुण ने उसे बुला लिया था और खाना भी खिलाया था। लेकिन, इस बार उसका एक फोन तक नहीं आया। तरुण के साथ उसकी खूब छनती थी। वह उससे कोई चार साल छोटा था और एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार-पत्र में संपादक था। कोई ग्यारह साल पहले उसे किसी फ़्रेंच लड़की से फ़ेसबुक पर ही प्यार हो गया था। फ़ेसबुकिया चैटिंग करते हुए व उस बेहद ख़ूबसूरत एलीज़ाबेथ के लिए पागलपन और दीवानगी की सारी हदें पार कर गया था। उन पगलाए दिनों के पहले वह नीत्शे के दर्शन का जुझारु पाठक था। शोपेनहॉवर की तरह स्त्री-विरोधी था और शादी-विवाह जैसी बातों को ग़ैर-ज़रूरी मानता था। उसके मन में बौद्ध धर्म के प्रति ख़ास झुकाव था जबकि स्वामी विवेकानन्द की तरह आजीवन अविवाहित रहकर दुनिया को सर्वधर्म समभाव का संदेश देना चाहता था। उसने धर्म-दर्शन और राजनीतिक सिद्धांतों पर कुछ किताबें भी लिखी थीं। फिलहाल, वह इस्लामिक आतंकवाद के सूत्रधार यहूदियों के विश्वव्यापी प्रभाव पर एक पुस्तक भी लिख रहा था। एक कट्टर ब्राह्मण पुरोहित का बेटा होकर भी उसमें हिंदुत्व के प्रति कोई ख़ास आकर्षण नहीं था। उसका कहना था कि ईसामसीह मूल रूप से कश्मीरी ब्राह्मण थे जबकि मोहम्मद साहब शिवभक्त थे और व्यापार करने के लिए बंबई के आसपास के बंदरगाहों से होकर हिंदुस्तान के सांस्कृतिक नगरों में भी आया करते थे; जहाँ से वे हिंदू धर्मग्रंथों और वेदों को उठाकर अरब ले गए। ईसामसीह और मोहम्मद साहब दोनों ने वेदों का अध्ययन करके ही अपने-अपने पंथों की नींव डाली थी। उसका मानना था कि अगर वैश्विक मंच पर हज़ारों साल पहले हिंदुत्व का जन्म नहीं हुआ होता तो दुनियाभर में इतने धर्म, मज़हब और रिलिजन कभी नहीं होते क्योंकि हिंदूधर्म ही इतने सारे पंथों का जनक है। पर, उसके इस तर्क में यह बात समझ में नहीं आती थी कि वह हिंदू धर्म को महिमामंडित कर रहा है या इसकी लीपापोती।

दरवाज़े पर दस्तक ने अर्व के ख़्यालों को विराम दे दिया। उसने उठकर दरवाज़ा खोला तो हैरान रह हो गया। दरवाज़ा खुलते ही तृषा अंदर तक आ गई और बोल पड़ी, "मिस्टर, आज होली के दिन भी इतने गुमसुम क्यों बैठे हुए हो? आओ, मेरे फ़्लैट में। साथ खाएँगे-पीएँगे और मस्ती करेंगे।"

तृषा का अचानक यह रूप देखकर अर्व विस्मित हो गया। लेकिन जब उसने उसके ईज़ीचेयर के हत्थे पर हाथ रखकर दोबारा अपने साथ चलने का आग्रह किया तो वह चिहुंक उठा, क्योंकि उसे लगा कि जैसे उसने उसके बदन को छू लिया हो। इतने वर्षों से स्त्री-स्पर्श न हो पाने के कारण मन में उसके प्रति एक अजीब-सा खिंचाव होने लगा था। तृषा ने फिर कहा, "ना-नुकुर करने से मैं नहीं मानने वाली। तुम्हें आज मेरे फ़्लैट में आना ही होगा। अजी, तुम मर्द होकर इतना शर्माते हो? कैसा ग़ज़ब ज़माना आ गया है?"

अर्व ने कहा, "तृषा, तुम चलो। मैं कपड़े बदलकर और ताला लगाकर आता हूँ।"

वह वापस चली गई तो अर्व उसके स्त्री-सुलभ स्वभाव के प्रति आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सका। काश! ऐसा ही मान-मनौव्वल और ख़ुशामद रंभा ने की होती तो न तो वह उसकी इतनी उपेक्षा करता और न ही वह किसी अजनबी की तलाश में उसके साथ संबंध बनाती। औरत को मन और व्यवहार से औरत होना चाहिए, न कि लिपिस्टिक-क्रीम लगाकर और रंग-रोगन करके शरीर से। रंभा सारे दिन बनी-ठनी रहती थी और जब अर्व उसके पास आने की ज़ुर्रत करता था तो वह अनियंत्रित रूप से शिकायतों और उसके हर आचरण पर झिड़कियों का पिटारा खोल देती थी। बस, उसके प्रति उसकी जुगुप्सा की यही एक वजह थी।

वह तृषा के ड्राइंगरूम में बैठकर स्वयं को बिल्कुल अजनबी या अटपटा-सा अनुभव नहीं कर रहा था। उसके ड्राइंगरूम में बैठकर उसे यह अनुमान लगाने में तनिक भी देर नहीं लगी कि वह उसकी ही तरह साहित्य और दर्शन की जुझारु पढ़ाकू है। किताबों के जो तीन रैक लगे हुए थे, उनमें साहित्य और दर्शन की पुस्तकों के अलावा राजनीतिक विचारकों और ललित कला की किताबें भी थीं। बिलाशक़, तृषा में कला के प्रति भी ख़ास रुझान था क्योंकि दीवारों पर टँगी हुई तस्वीरें उसी की बनाई हुई लगती थीं। रैकों के बीच टेबल पर रखे हुए रंग और ब्रशों से ऐसा अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता था।

ड्राइंगरूम में चाय पीते हुए उसके साथ तृषा कितनी अंतरंग होती जा रही थी! अर्व जो कुछ भी उससे पूछता, उसका उत्तर 'हाँ' में ही होता था। क्या पुरुष मनोविज्ञान में उसकी इतनी पैठ थी कि वह अर्व से भूलकर भी 'ना' कहकर उसके पुरुष अहं को चोट नहीं पहुँचाना चाहती थी? पुरुषों को स्त्री से 'ना' सुनने की आदत नहीं होती क्योंकि पुरुष कितना भी पढ़-लिख जाए या ज़िंदगी के अनुभव ले ले और ऊँचे ख़यालात का होने का दावा कर ले, उसका अहंकार औरत की 'ना' कभी बरदाश्त नहीं कर सकता।

तदनन्तर, तृषा ने थोड़ी देर में खाना लगा दिया तो अर्व अपनी जिज्ञासा को दबाए नहीं रख सका।

"तृषा, तुम्हें ये कैसे पता है कि आज मैं तुम्हारे साथ खाना भी खा लूँगा? इतने ढेर-सारे व्यंजन तुमने अपने लिए तो नहीं बनाये होंगे। अकेले के लिए तो खिचड़ी, ब्रेड-बटर या दूध-रोटी ही पर्याप्त होती है। क्या तुमने यह पहले से ही सोच रखा था कि तुम मुझे खाने पर बुलाओगी और मैं बेझिझक तुम जैसी अकेली औरत के कमरे में जम जाऊँगा और चटखारे ले लेकर तुम्हारे स्वादिष्ट व्यंजनों पर टूट पड़ूँगा?"

बेशक़, तृषा ने उससे ऐसी सपाटबयानी की अपेक्षा कदापि नहीं की होगी।

वह बोली, "क्या तुम्हें मुझसे सिर्फ़ इसलिए दिक्क़त हो रही है क्योंकि मैं अकेली औरत हूँ? क्या मेरा कोई अपना ईगो नहीं हो सकता कि मैं हक़ से जिस पुरुष को पसंद करती हूँ, उसे बुला सकूँ? क्या यह हक़ भी केवल पुरुष समाज को ही है? हाँ, मैं तुम्हें छेड़ने की ग़ुस्ताख़ी भी कर सकती हूँ जिसका कोई बेजा मायना नहीं हो सकता?"

अर्व झेंप उठा।

"नहीं-नहीं। ऐसी बात क़तई नहीं है। मेरा उद्देश्य तुम्हारे जज़्बात को बिल्कुल ठेस पहुँचाना नहीं था। तुम एक बौद्धिक महिला हो और मुझे तुम्हारे सबऑर्डिनेशन में रहना अच्छा लगेगा।"

वह चुप रही। फिर, दोनों ने चुपचाप खाना खाया। उस वक़्त लज़ीज़ खाने की तारीफ़ करने की हिम्मत भी अर्व नहीं बटोर पा रहा था। खाना खाने के बाद, तृषा ने उसे छत पर चलकर मोहल्ले में खेली जाने वाली होली के हुड़दंग का नज़ारा करने का आमंत्रण दिया तो उसने ख़ुद आगे-आगे चलकर लिफ़्ट से रास्ता तय किया और छत पर आ गया। उसके मन के किसी कोने में कुछ ऐसा अहसास हो रहा था कि तृषा के साथ इस अनौपचारिक मुलाक़ात में पहलक़दमी वह स्वयं कर रही थी जबकि वह सिर्फ़ उसका साथ दे रहा था। बहरहाल, अपार्टमेंट के नीचे जो होली खेली जा रही थी, वैसा कुछ-कुछ उन दोनों के मन में भी चल रहा था।

कोई घंटे भर बाद, दोनों अपने-अपने फ़्लैट में आ गए। उसी शाम तृषा ने फिर अर्व के दरवाज़े पर दस्तक दी और दरवाज़ा खुलते ही वह अंदर दाख़िल होती चली गई और अधिकारपूर्वक बोल पड़ी, "हुज़ूर, सुबह का काफ़ी खाना बचा हुआ है। कहो तो गरम करके तुम्हारे पास पहुँचा दूँ या तुम मेरे ही कमरे में आ जाओ। तसल्ली से बनाया हुआ ऐसा खाना मैं तो क़तई कुत्तों को खिलाने वाली नहीं हूँ।"

अर्व को तृषा की आवाज़ में दिन वाली गर्मजोशी का अहसास नहीं हो रहा था। वह चिंतित हो गया- क्या सुबह वाली उसकी साफ़गोई से वह इतनी आहत हुई थी?

उसने कहा, "हाँ, तुम चलो। मैं अभी हाथ-मुँह धोकर आ रहा हूँ।"

दोनों दिन-ब-दिन निकट आते गए। अर्व ने उसकी निजी ज़िंदगी के बारे में भी काफ़ी-कुछ जानकारी ले ली। कोई पंद्रह साल पहले, उसने जिस युवक से अपने माँ-बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी की थी, वह उसके साथ कोई दो वर्ष तक ही रहा और जब वह अपनी कंपनी की तरफ़ से जर्मनी चला गया तो, न तो फिर कभी वापस आया, न ही उसने तृषा से किसी भी प्रकार से संपर्क साधा। एक दिन तृषा ने अर्व को बताया, "इसमें मेरा क्या दोष था? दिवाकर विदेश गया तो उसने अपनी लीगल वाइफ़ को पूछा तक नहीं। जाते समय मुझे कई-कई वादों का लॉलीपॉप थमा गया था। मुझे पिछले साल ही पता चला कि उसने वहाँ किसी जर्मन लड़की से शादी कर ली है। हाँ, उसने मुझसे तलाक़ तक नहीं लिया था। बहरहाल, इतने सालों बाद तो अब डायवोर्स का कोई सवाल ही नहीं उठता।"

एक दिन आधी रात को तृषा के कमरे से उसी के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी तो अर्व बनियान-अंडरवियर में ही लाँघता-फाँदता उसके फ़्लैट में दाख़िल हो गया। वह अर्व के दस्तक पर दरवाज़ा खोलने के बाद बेडरूम में जाकर एक कोने में खड़ी होकर डर के मारे बुरी तरह काँप रही थी। उस हालत में उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि उसके बदन पर सिर्फ़ अंडरगार्मेंट्स ही हैं। तभी वह अचानक दौड़कर फफकते हुए अर्व से लिपट गई, "अर्व, मुझे इतना डर कभी नहीं लगा, जितना कि आज।"

उस पल इतने सालों बाद औरत की छुवन से संयम और अनुशासन के सारे बंधन टूट गए।

अगली सुबह थोड़ी-बहुत आपसी विचार-विमर्श के बाद, दोनों ने अदालत जाकर कोर्टशिप के लिए अर्ज़ी दे दी। वहाँ से बाहर निकलते हुए अर्व ने तृषा के चेहरे को ग़ौर से देखा तो उसके पिचके गाल, मोटे-मोटे नथुने और ज़रूरत से ज़्यादा उठी हुई ठुड्डी, सभी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। तभी अर्व ने पाया कि उस जैसे अधेड़ आदमी के साथ तृषा चिपक-चिपक कर कुछ ऐसे चल रही थी जैसेकि वह दांपत्य का स्वाद अभी-अभी चख रही हो।

दोनों को पैदल चलना ही रास आ रहा था। अर्व ने घर से चलते हुए तृषा से कहा था कि हम अपनी गाड़ी से चलते हैं। पर, गैराज में खड़ी गाड़ी को देखकर वह ठिठक गया। अगले पहिये से हवा निकली हुई थी- शायद पंक्चर था। अर्व ने टैक्सी बुला ली। इस तरह, वापस जाने के लिए भी दोनों को कुछ इसी तरह का जुगाड़ करना था। लेकिन, तृषा ने कहा, "अर्व, कुछ दूर यूँ ही पैदल चलते हैं। आगे चौराहे से टैक्सी हायर कर लेंगे।"

तृषा की रज़ामंदी में अर्व की भी रज़ा थी। तभी चलते-चलते ब्लाइंड स्कूल के पास आकर अर्व के क़दम एकदम से ठहर गए। उसने इतने वर्षों बाद, रंभा को स्कूल के गेट से अंदर दाख़िल होते हुए देखा था। अर्व सोच में पड़ गया कि आख़िर रंभा का उस ब्लाइंड स्कूल से क्या लेना-देना है? रंभा के अंदर जाने के बाद उससे रहा नहीं गया। वह तृषा से कहते हुए कि 'यहीं ठहरो, मैं अभी आया', स्कूल के रिसेप्शन काउंटर पर गया और रिसेप्शनशिस्ट से पूछा, "ये महिला जो अभी-अभी अंदर गई है, कौन है?"

रिसेप्शनिस्ट ने पलभर के लिए अर्व को देखा, फिर निश्चिंत होकर बोल पड़ा, "ये रंभा मैडम इस स्कूल की प्रिंसिपल हैं। अभी पिछले साल ही तो आई हैं। बेचारी क़िस्मत की मारी हैं। बताया जाता है कि किसी सड़क-छाप आदमी के बहकावे में आने के बाद, इनके पति ने इनसे तलाक़ ले लिया। वो सड़क-छाप आदमी भी अपना मतलब साधकर चलता बना। ऐसे में ये बेचारी करती क्या? बेसहारा तो हो ही गई थी। अब भला, ये बताओ कि हम जैसे कितने ही लंपट मर्द अपनी सारी ज़िंदगी दर्जनों औरतों की इज़्ज़त-आबरू से खेलते रहते हैं। झूठे वादे करके उनसे रिश्ते बनाते हैं। लेकिन, हमारी बीवियाँ हमारे छिछोरेपन के बारे में सब कुछ जानकर भी हमसे कोई शिकवा-गिला नहीं करतीं और मरते दम तक हमारा साथ निभाती रहती हैं। लेकिन जब कोई औरत ग़लती से या भूलवश किसी पुरुष से रिश्ता बना लेती है तो उसका पति उसे तत्काल छोड़ देता है। वह तो उसकी बेगुनाही के बारे में एक भी दलील उससे नहीं सुनना चाहता।"

अर्व को उसकी बातें सुनते हुए गश-सा आने लगा। वापस आकर वह तृषा के साथ बुझा-बुझा सा चलने लगा। तृषा ने उसकी हालत देखकर बार-बार इसकी वज़ह जाननी चाही तो वह टाल गया। फिर उसने एक टैक्सी वाले को आवाज़ लगाई और उसमें सवार होकर दोनों घर आ गए।

अब वह अपराधबोध का एक जीता-जागता पुतला बनकर रह गया है। वह इसकी वज़ह बताता भी किसे? तृषा के साथ भी जिस तरह उसका संबंध बना था, वह भी तो एक अप्रत्याशित घटना जैसी थी। पर, उसने यह तो अच्छा किया कि उसने उससे शादी कर ली। अन्यथा, तृषा की भी हालत रंभा जैसी ही होती।

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