ज़िंदगी
अवनीश कश्यप
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
मजबूरियाँ, दूरियाँ,
या फिर उनकी क़ीमत चुकाता मैं?
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
जाते हुए लम्हे, वो लोग,
या उनसे मिली यादों से
अकेले गले मिलता मैं?
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
दौलत, क़िस्मत,
या उनके न मिलने वाली
रातों के अँधेरों से लड़ता मैं?
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
भीड़, नीर,
या उन्हें साथ ले चल,
रास्तों पर मुस्काता मैं?
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
ख़्वाब, तुम,
या सपनों की उड़ान में
मुझसे मिलता मैं?
अब क्या कहें . . .
क्या है ज़िंदगी?