ज़िंदगी

01-01-2026

ज़िंदगी

अवनीश कश्यप (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
मजबूरियाँ, दूरियाँ, 
या फिर उनकी क़ीमत चुकाता मैं? 
 
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
जाते हुए लम्हे, वो लोग, 
या उनसे मिली यादों से
अकेले गले मिलता मैं? 
 
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
दौलत, क़िस्मत, 
या उनके न मिलने वाली
रातों के अँधेरों से लड़ता मैं? 
 
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
भीड़, नीर, 
या उन्हें साथ ले चल, 
रास्तों पर मुस्काता मैं? 
 
क्या कहें . . . क्या है ज़िंदगी—
ख़्वाब, तुम, 
या सपनों की उड़ान में
मुझसे मिलता मैं? 
 
अब क्या कहें . . . 
क्या है ज़िंदगी? 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें