चाहत

अवनीश कश्यप (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कभी तो मिलेंगे हम
ऐसे बाग़ों में, एक शाम—
चहारदीवारी से परे, 
जहाँ हर दिशा ही द्वार होगी। 
 
हर भाषा में पक्षियों की चहचहाहट, 
नदी के प्रवाह से निकलती, 
टकराती मद्धम, मधुर ध्वनियाँ—
और कहीं से आती फूलों की सुगंध। 
 
हवाओं के संग
बालों को सहलाती, मुझे मोहती, 
पत्तों से लड़ जाएँगी, 
और मेरे घर-वापसी को जैसे
विभोर उठा देंगे पत्ते—
हर वेग पर अलग-अलग नृत्य कर, 
गले मिलने को टूट पड़ेंगे। 
 
ज़मीं पर सिर टिका, 
घास की चादर पर, 
सुकून की एक झप्पी लूँगा। 
आसमाँ को एकटक घूरता, 
बाँहें फैलाकर, 
एक पहर तक, जी भर की साँसें लूँगा। 
 
और जब बादल छा जाएँगे आसमाँ पर, 
हाथ फैलाकर बारिश को
ख़ुद को सौंप दूँगा। 
टिप-टिप गिरती बूँदें
कई यादों को समेट लाएँगी, शायद। 
 
मैं रो पड़ूँगा—
आसमाँ से बिन नज़रें चुराए। 
 
और जब ख़ालीपन का एहसास छाने लगेगा, 
एक और सपने की शाम ढलने लगेगी, 
मैं फिर अधूरा उसे वहीं छोड़, 
दूर जाने को साथी ढूँढ़ लाऊँगा। 
 
चलते हुए फिर राहों में, 
शामिल होगी कुछ और यादें। 
जैसे ज़िक्र अपनापन का होगा, 
मैं नींद ही तोड़ जाऊँगा, 
मैं घर ही छोड़ जाऊँगा। 

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