एसेट
अवनीश कश्यप
टर-टर, टर-टर, टोन बजा,
भल्ला जी,
टिपे कान में फोन,
जैसे हो ख़बर ख़जाने की,
फुसियाए ऐसे, जैसे
वापस न सुन सके उनका फोन।
“हाँ, हैलो पप्पा,
ग्रुप डी क्लियर हो गया।”
हो-हल्ला, हो-हल्ला
करते रहे भोगी भल्ला,
अपनी गुणगान, अपनी शान,
मूँछ तान बैठे बीच महल्ला।
भल्ला जी . . .
“लइका कब ब्याहेंगे?
कौने पार्टी से मानेंगे?
दस वाली या बीस वाली?”
अब सवाल है, और ज़िम्मेदारी
महल्ले की, फिर भल्ले परिवार की।
कभी चच्चा पूछे,
“पार्टी है इक दस लाख की?”
तो दादा बोले,
“धु . . . ससुर, दस में का होगा?
पन्द्रह-तीस तक ले जाओ,
मोटरगाड़ी होनी चाहिए मस्ट।
संग जो बिटिया को वो भेजे,
वो ख़ुद जाने, होगा का बस्ट।”
दस बीघा ज़मीन है,
घर-आँगन एतना बड़का,
लायक़ सबसे है ई लड़का।
भल्ला जी बैठे पैसा छापे,
अब इससे का होगा बात बड़का?
आख़िर सत्रह पर मानी पार्टी,
भल्ला जी मिमियाए,
रह गए दाँत पीस।
छूटा तीस का पहाड़ा,
पकड़े सत्रह छोर के तिस।
सर उठाए पहुँची बारात,
जैसे भल्ला जी थे सीएम।
यूपीएससी तो छोटका बात रहे,
ठुकराया हो कुर्सी पीएम।
मुख को जितना बनवा लेवे,
छलके टिप-टिप रहे शरम।
देख न पावे,
कहाँ देखे?
भल्ला-भल्ला ही तो थे गहमा-गहम।
आख़िर बजी शहनाई,
रोयी लईकी के माई
खाया, हँसा, नाचा समाज
बचा न घर लईकी के पाई।
भल्ला परिवार की नई बहुरिया
फँसी सवाल के घेरों में
और तेरह के माँग को लेकर
जला दी गई बीच द्वारिया।
केसम केस, कोरेट फोरट,
चक्कर-वक्कर से बच जाओ,
कान फूँक गई यही पुलिसिया।
पंच बैठा, समाज बैठा,
सेटलमेंट में बस भल्ला रूठा,
ढीला हुआ बस जेब ओ भइया।
न नपा समाज,
न नपे भल्ले,
दस–पंद्रह तक पार्टी खोजो,
नया डिमांड यही रहे हो भइया।