ख़्याल
अवनीश कश्यप
अँधेरा है शहर,
शोर भी कहीं गुम है।
बाक़ी है रात पूरी,
लोग भी कहाँ कम हैं।
सब्र है, वही बातें हैं,
तुम न हो, तुम्हारी बातें हैं।
फिर क्या ग़म है?
क्यों ग़म है?
तुम कहीं हो भला,
फिर ये आँखें क्यों यूँ नम हैं।