सखी
अवनीश कश्यप
चाँद तले,
अँधेरे–उजाले के बीच
बेख़ौफ़, बेबाक मन में
अचानक कुछ घटता है—
और हँसी
दुख की उँगली थाम लेती है।
सखी, क्या सच है
कि इक्कीसवीं सदी के
पच्चीस बरस यूँ ही ढल गए—
कि आठ बजे के बाद
शहर, शहर नहीं रहता?
या लोग रोक दिए गए
अपने ही आँगनों में,
भेड़ियों की आँखों के कारण?
कहते हैं,
पृथ्वी ऐसी ही है—
या उसका बस एक हिस्सा।
पर हमें क्या?
हम चाँदवासी हैं।
यहाँ न रात पर पहरा है,
न गलियों में दाँत।
यहाँ हम नापते हैं शहर
रात के बारह बजे भी,
मन के कपड़े पहने,
सिर आसमान की ओर,
बिना झुके, बिना बुझें—
सपनों के लिए,
अपनों के लिए।
तभी यह सुन
पेड़ से एक पत्ता टूटकर ज़मीं से लग जाता है,
जैसे ठीक नीचे वाली ज़मीं चाँद की हो।
नींद,
चाँद की सफ़ेद सड़क छोड़,
धीरे से
धरती की स्याह गलियों में
लौट जाती है—और शायद मैं भी।