इंतज़ार
अवनीश कश्यप
मैंने देखा,
तेरे जाने पर—
गुम होना,
लफ़्ज़ खोना,
चेहरे पर उदासी को,
सवालों को,
जो लाज़मी थी, ख़ास थी।
की आख़िर—
तुम आ कर हर मर्तबा
ठहर क्यों नहीं जाते . . .?
मैंने देखा,
तेरे जाने पर—
गुम होना,
लफ़्ज़ खोना,
चेहरे पर उदासी को,
सवालों को,
जो लाज़मी थी, ख़ास थी।
की आख़िर—
तुम आ कर हर मर्तबा
ठहर क्यों नहीं जाते . . .?