अपराजिता
अवनीश कश्यप
अब अधूरा है क्या?
मैं तो रस्ते चला,
भुला–बिसरा तुम्हें,
पराजित करने अपराजिता।
मुमकिन–मुश्किल के तिलक को ओढ़,
मंज़र पुराने सब रस्ते को छोड़,
घर को घर से ले उस मोड़।
संशय–संजय, साहिल–साहिर—
ना लौटने की मन की इस होड़।
मैं जीवन को लिखने चला,
भुला–बिसरा तुम्हें,
पराजित करने अपराजिता . . .