अब तुम काफ़ी नहीं
अवनीश कश्यप
वीरान ये रास्ता है,
कहीं तुम हो, कहीं मैं हूँ।
न जाने कहाँ जाना है,
रास्ते अलग से दौड़ के,
पर चेहरा पहचाना है।
हाँ, बात वो रही नहीं,
जज़्बात भी बस तेरे जैसे।
सौ बात लिए भले फिरूँ,
एक बात है, बस तेरे जैसी।
नायाब सा वो सपना है,
बचा जो आख़िरी अपना है।
कैसे कहूँ, अब तुम काफ़ी नहीं,
बस वो सपना है जो अपना है।
बस फ़ख़्र है, कि फ़िक्र है।
फ़िक्र है तो साथ है।
फ़िक्र हटी, अगर ज़िक्र पर,
साथ फिर इक बात है।
कैसे कहूँ कि अब तुम काफ़ी नहीं,
अब मैं हूँ, और मेरी आख़िरी ये बात है।