तुम्हारा न होना
अवनीश कश्यप
तुम्हारा न होना अच्छा लगता है,
चाय की चुस्कियाँ हों या घाट की शामें,
रात की सिसकियाँ हों या उस भीड़ वाला साथ,
तुम्हारा वहाँ न होना अच्छा लगता है।
सुकून है किसी और में भी,
जानकर भी अनजान अभी,
वही रिश्तों का डर—कहीं उसे खो न दूँ,
उन बातों में भी तुम्हारा वहाँ न होना अच्छा लगता है।
वो अश्क है, पर वो इश्क़ नहीं,
बिखरता ख़्वाब भी है, पर कोई रश्क नहीं,
बुन लूँ क्यों न नए ख़्वाब भी,
इन ख़्वाबों में उन यादों का न होना अच्छा लगता है।
और शायद यही सही—
तुम्हारा कहीं न होना अच्छा लगता है।