तुम्हारा न होना

01-01-2026

तुम्हारा न होना

अवनीश कश्यप (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

तुम्हारा न होना अच्छा लगता है, 
 
चाय की चुस्कियाँ हों या घाट की शामें, 
रात की सिसकियाँ हों या उस भीड़ वाला साथ, 
तुम्हारा वहाँ न होना अच्छा लगता है।  
 
सुकून है किसी और में भी, 
जानकर भी अनजान अभी, 
वही रिश्तों का डर—कहीं उसे खो न दूँ, 
उन बातों में भी तुम्हारा वहाँ न होना अच्छा लगता है। 
 
वो अश्क है, पर वो इश्क़ नहीं, 
बिखरता ख़्वाब भी है, पर कोई रश्क नहीं, 
बुन लूँ क्यों न नए ख़्वाब भी, 
इन ख़्वाबों में उन यादों का न होना अच्छा लगता है। 
 
और शायद यही सही—
तुम्हारा कहीं न होना अच्छा लगता है। 

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