पहली मुलाक़ात
अवनीश कश्यप
कभी गुज़र के राह से,
न मिल सका उससे भला,
क्या ख़ूब था सफ़र भी वो
क्या ख़ूब था मंज़र भला।
ले आए संग दीवानगी,
रवानगी, वो इस क़द्र,
मैं ढूँढ़ता रहा मुझे,
भले ही घर को घर मिला।
सवाल था जब दर्द का,
हर्ज था और क़र्ज़ था,
मिटा के भर ले आया वैसा,
महँगा पड़ा बस्ता भला।
जज़ीबियत से भरी,
किताब थी या जान थी,
मिल कर ऐसा घुल गई,
जैसे मिलती, रूह को प्रेम भला।