अनसुईया
अवनीश कश्यप
जनम हुआ,
जुड़वाँ आया—
एक धनजय्या,
एक अनसुईया।
एक पहर में दोनों आए,
एक को देखा—
जैसे हो सोना,
दूसरी को देखा—
बस आया रोना।
चाचा–चाची,
दादा–दादी,
सवाल ले दौड़े
बाप के पास—
“ई कुलझोसी,
ई का लाई?”
जैसे माँ के बस की थी ये बात।
फिर बीते कुछ छह गो साल,
छोटकी थी जब अनसुईया—
दुबरी, पतरी,
दो फुटिया।
कहलाई गई,
समझाई गई—
धन है, वो पराया।
भले न समझी,
पर सींची गई—
कोमल से कठोर तक,
डूबी, बही और आख़िर सूखी,
चित्रों के संग बनी दरिया।
पराया धन हो
ऐसे नहीं रहते,
पराया धन हो
ऐसे नहीं करते।
ये कहते–कहते,
जहाँ थामना था
क़लम हाथों में,
जहाँ घुलना था
किताबों के रंग में—
थमा दिया झाड़ू–पोछा।
पहले उलझी,
फिर बुझ सी गई,
और आख़िर
मिटने लगे
सपने और बर्तन–बासन के रंग।
उमर हुआ, ऐसे हुआ—
पंद्रह, अठारह,
और फिर इक्कीस।
लड़के देखे गए
क़रीब छत्तीस।
सरकारी बाबू आए,
ले गए
पराए घर से
पराए घर को।
फिर वही चकरी दोहराई—
अब तो उमर थी उसकी छब्बीस,
दो हज़ार के बदले अब की,
साल रही दो हज़ार छब्बीस।