माया 

अवनीश कश्यप (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

हासिल करने पायदारी, 
कितनों ने की तैयारी, 
घर से लेकर, 
घर से देकर, 
घर से चोरी, चित्त से चोरी। 
 
उर धड़के, 
देह सिहरे, 
आग़ाज़ से, 
अवसान तक। 
जब सब मिला, 
नयन भोगे, 
तबक़े-तबक़े फिर, 
ख़ूब भभके। 
 
फिर एक दिन आया, इक शाम आई, 
उसके बीच लेटी थी तन्हाई। 
सोना था, चाँदी थी, 
सोना भी था, पर नींद न थी। 
 
जब रोना चाहा, 
आँखें सूखी। 
जब राग चाहा, 
चेहरा रूखा। 
फिर गुज़री साँसें धीरे-धीरे, 
खींचती तन को, 
जैसे चुभती रहती हो मक्कारी, 
खींचती मन को, 
जैसे खो जाती हो हिस्सेदारी। 
 
हक़ को तरसे, मन पे बरसे, 
आख़िर मिटी यादों की परछाईं। 
 
फिर क्या था—
सब मौन हुए, 
पल के ख़ातिर, कल के ख़ातिर। 
पलकें खुलते ही मुख से निकला—
किसके हिस्से, 
किसके बस्ते, 
किसने पाई असली हिस्सेदारी? 

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